पांच से 15 वर्ष के बच्चों की प्रतिभा पहचानने के लिए चलेगा बड़ा अभियान। नए खेलों में भारत की मजबूत चुनौती तैयार करने पर प्रधानमंत्री ने दिया जोर

नई दिल्ली : ओलंपिक की पदक तालिका में भारत को बड़ी छलांग लगानी है तो केवल उन खेलों पर निर्भर रहने से काम नहीं चलेगा, जिनमें भारतीय खिलाड़ी वर्षों से उतरते रहे हैं। उन खेलों के मैदान में भी उतरना होगा, जहां पदक तो दांव पर होते हैं, लेकिन भारत की चुनौती ही मौजूद नहीं रहती। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसी कमी की ओर देश का ध्यान खींचते हुए गुरुवार को कहा कि ओलंपिक में शामिल करीब आधे खेलों में भारत की टीमें हिस्सा ही नहीं लेतीं। ऐसे में पदक तालिका के बड़े हिस्से के लिए भारत प्रतिस्पर्धा शुरू होने से पहले ही दौड़ से बाहर हो जाता है। उन्होंने 2036 ओलंपिक को ध्यान में रखते हुए पांच से 15 वर्ष की उम्र से प्रतिभाशाली बच्चों की पहचान और प्रशिक्षण शुरू करने पर जोर दिया।

वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से 'खेलो इंडिया डायलॉग' को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने देश के सामने भारत के खेल भविष्य का खाका रखा। कार्यक्रम में केंद्रीय मंत्रिमंडल के सदस्य, मुख्यमंत्री, राज्यों के मंत्री, सांसद, माई भारत के लाखों स्वयंसेवक, खिलाड़ी और खेल जगत से जुड़े लोग शामिल हुए। प्रधानमंत्री ने 29 अगस्त को मनाए जाने वाले राष्ट्रीय खेल दिवस की अग्रिम शुभकामनाएं दीं और हॉकी के महान खिलाड़ी मेजर ध्यानचंद को याद किया।

प्रधानमंत्री ने कहा कि 100 वर्ष पहले भारतीय सेना की हॉकी टीम न्यूजीलैंड के दौरे पर गई थी और उस टीम में मेजर ध्यानचंद भी शामिल थे। उस दौरे ने भारत और न्यूजीलैंड के खेल संबंधों के 100 वर्ष पूरे होने का आधार तैयार किया। उन्होंने कहा कि हाल में न्यूजीलैंड की यात्रा के दौरान भी उन्होंने मेजर ध्यानचंद को याद किया था। भारत आज उन रिश्तों को और समृद्ध करने की दिशा में काम कर रहा है।

प्रधानमंत्री ने स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले से रखे गए भारत के खेल दृष्टिकोण का उल्लेख करते हुए कहा कि खेलों की बात केवल पदक जीतने तक सीमित नहीं है। यह विकसित भारत के निर्माण में देश की खेल शक्ति और युवा शक्ति को एक साथ जोड़ने का अभियान है। उन्होंने अपने संदेश 'जो खेले, वो खिले' को दोहराते हुए कहा कि खेल में खिलने का मतलब केवल मैदान पर जीतना नहीं है। इससे व्यक्तित्व निखरता है, परिवार की पहचान बढ़ती है और देश का गौरव भी बढ़ता है।उन्होंने कहा कि जब कोई खिलाड़ी सफल होता है तो उपलब्धि केवल उसकी नहीं रहती। उसके परिवार, स्कूल, कॉलेज, जिले और राज्य की प्रतिष्ठा भी बढ़ती है। कई बार दुनिया किसी खिलाड़ी के नाम से उसके शहर या राज्य को पहचानने लगती है। देश के प्रत्येक जिले में वैश्विक खेल मानचित्र पर चमकने की क्षमता है और इस ताकत को पहचानकर आगे बढ़ाने की जरूरत है।ओलंपिक में भारत की सीमित भागीदारी को प्रधानमंत्री ने बड़ी चुनौती बताया। 

उन्होंने कहा कि 2012 के ओलंपिक में भारत ने केवल 13 खेलों में हिस्सा लिया था, जबकि 20 से अधिक खेलों में भारतीय भागीदारी नहीं थी। इनमें कई ऐसे खेल भी हैं, जिनका नाम तक देश में बहुत से लोगों ने शायद नहीं सुना होगा। दुनिया के दूसरे देश इन खेलों में पदक जीत रहे हैं, जबकि भारत उनमें प्रतिस्पर्धा ही नहीं कर रहा। पदक तालिका में आगे बढ़ने के लिए इस स्थिति को बदलना होगा।

उन्होंने सर्फिंग और स्पोर्ट्स क्लाइंबिंग का उदाहरण देते हुए कहा कि भारत के पास विशाल समुद्री तट और बड़ा पर्वतीय क्षेत्र है। वाटर स्पोर्ट्स से लेकर विंटर स्पोर्ट्स तक के लिए देश के पास अनुकूल भौगोलिक परिस्थितियां और जनसांख्यिकीय क्षमता मौजूद है। इसके बावजूद कई ऐसे खेलों में भारत दुनिया में दिखाई नहीं देता। अलग-अलग जिलों में ऐसी संभावनाओं को तलाशना होगा, जहां किसी खास खेल का मजबूत पारिस्थितिकी तंत्र विकसित किया जा सके।

प्रधानमंत्री ने 2036 ओलंपिक की तैयारियों को दीर्घकालिक योजना से जोड़ते हुए कहा कि उस समय विभिन्न खेलों में भारत के लिए क्वालीफाई और प्रतिस्पर्धा करने वाले खिलाड़ी आज के बच्चे होंगे। इसी उद्देश्य से पांच से 15 वर्ष की उम्र के बच्चों की पहचान के लिए बड़े प्रतिभा खोज अभियान की घोषणा की गई है। इसमें केवल यह नहीं देखा जाएगा कि बच्चे की रुचि किस खेल में है, बल्कि यह भी परखा जाएगा कि कौन-सा बच्चा किस खेल के लिए शारीरिक और स्वाभाविक रूप से अधिक उपयुक्त है। उसी आधार पर प्रशिक्षण दिया जाएगा। उन्होंने भरोसा दिलाया कि केंद्र सरकार आवश्यक सहयोग में राज्यों और खेल संस्थाओं के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलेगी।

प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत में 21वीं सदी का आधुनिक खेल तंत्र तैयार किया जा रहा है। खेल विश्वविद्यालयों से लेकर आधुनिक प्रशिक्षण केंद्रों तक ऐसी व्यवस्था विकसित की जा रही है, जिसमें प्रतिभा की पहचान से लेकर उसे विश्व मंच तक पहुंचाने में हर स्तर पर सहयोग मिले। खेल विज्ञान, प्रशिक्षण, कोचिंग और अनुभव साझा करने के लिए दूसरे देशों के साथ सहयोग भी बढ़ाया जा रहा है।

उन्होंने कहा कि खेलो इंडिया डायलॉग केवल खेलों पर चर्चा करने का कार्यक्रम नहीं है। यहां से निकलने वाला एक-एक विचार भारत के खेल दृष्टिकोण को नई दिशा दे सकता है। खेल पारिस्थितिकी तंत्र, प्रतिभा विकास, शासन व्यवस्था और विकसित भारत को लेकर युवाओं के सुझाव सुने जाएंगे और उपयोगी विचारों को नीति प्रक्रिया में शामिल किया जाएगा। उन्होंने युवाओं से इस मंच का अधिकतम उपयोग करते हुए खुलकर नए विचार सामने रखने का आग्रह किया।

खेलों को व्यक्तित्व और जीवन निर्माण से जोड़ते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि खेल केवल चैंपियन बनना नहीं सिखाता, बल्कि बेहतर प्रतिस्पर्धी भी बनाता है। मैदान में गिरना, फिर उठना और दोबारा पूरी ताकत से मुकाबला करना जीवन की कठिन परिस्थितियों का सामना करने का जज्बा पैदा करता है। स्वस्थ समाज, बेहतर पारिवारिक व्यवस्था और अच्छी कार्य संस्कृति के लिए खेल भावना को उन्होंने जरूरी बताया।

प्रधानमंत्री ने पैरा खिलाड़ियों का विशेष उल्लेख करते हुए कहा कि उनका संघर्ष और सफलता जीवन को देखने का नजरिया बदल देती है। उन्होंने तीरंदाजी में शीतल, अवनि लेखरा, सुमित अंतिल और नितेश कुमार सहित पैरा खिलाड़ियों की उपलब्धियों को प्रेरणादायक बताया। उनका कहना था कि किसी पैरा खिलाड़ी की सफलता केवल उसकी जिंदगी नहीं बदलती, बल्कि संघर्ष में साथ खड़े माता-पिता और पूरे परिवार के सपनों तथा हौसलों को भी नई ऊंचाई देती है।

उन्होंने खेल, फिटनेस और बेहतर जीवन के संबंध का उल्लेख करते हुए फौजा सिंह का उदाहरण भी दिया। प्रधानमंत्री ने कहा कि खेल बेहतर जीवन जीने के लिए शरीर को फिट रखता है और जीवन की गुणवत्ता बेहतर करता है। फौजा सिंह का जीवन इस बात की प्रेरणा रहा कि खेल और फिटनेस से जुड़ाव जीवनभर कायम रखा जा सकता है।

युवाओं में बढ़ती नशे की चुनौती का जिक्र करते हुए प्रधानमंत्री ने खेल को इससे मुकाबले का प्रभावी माध्यम बताया। उन्होंने कहा कि वास्तविक खिलाड़ियों में ड्रग्स और नशे से दूर रहने की इच्छाशक्ति भी विकसित होती है। ऐसे समय में जब नशा युवाओं के सामने गंभीर चुनौती है, खेल इसमें सार्थक भूमिका निभा सकता है।

प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत में खेल अब बेहतरीन पेशे के रूप में भी उभर रहा है और समाज का नजरिया बदल रहा है। लोग ट्रायथलॉन, पांच और दस किलोमीटर की दौड़ जैसी गतिविधियों में हिस्सा ले रहे हैं। पिकलबॉल और बैडमिंटन जैसे खेल परिवार और दोस्तों की दिनचर्या का हिस्सा बन रहे हैं। पढ़ाई और करियर के साथ दैनिक जीवन में भी खेल को जगह मिलने लगी है। यही बदलाव भारत के खेल भविष्य को लेकर भरोसा बढ़ा रहा है।

उन्होंने कहा कि देश में वास्तविक खेल संस्कृति तभी विकसित होगी, जब सामान्य लोग इससे जुड़ेंगे और स्कूल खेल के पीरियड को केवल सह-पाठ्यक्रम गतिविधि नहीं, बल्कि जीवन का हिस्सा मानेंगे। इससे प्रतिभाओं का दायरा बढ़ेगा और खेल को करियर बनाने वाले बच्चों को परिवारों का समर्थन भी मिलेगा। उन्होंने युवाओं को संदेश दिया कि स्क्रीन से ज्यादा स्पोर्ट्स सेंटर और प्ले-स्टेशन से ज्यादा प्लेग्राउंड की अहमियत समझनी होगी।