सोशल मीडिया से भागने की जरूरत नहीं, सही अनुशासन से कर सकते हैं स्क्रीन टाइम कम

डॉ. प्रभात इंदौरा

पिछले आलेख में हमने सोशल मीडिया, स्क्रॉलिंग और इसके परिणामों के बारे में चर्चा की। उसमें जाना कि किस प्रकार लोग स्क्राॅलिंग के जाल में फंसते जा रहे हैं। बहुत सारे विद्यार्थियों का यह सवाल होता है कि वह चाहकर भी मोबाइल का उपयोग कम क्यों नहीं कर पाते? अगर आपकी भी यही समस्या है तो यह लेख आपके लिए बेहद उपयोगी है। बहुत से अध्ययनों से यह बात पता चलती है कि युवाओं का औसत स्क्रीन टाइम 5 घंटे से अधिक पहुंच चुका है और कई तो इससे भी ज्यादा वक्त अपने स्मार्टफोन पर बिता रहे हैं। यह बहुत ही चिंताजनक स्थिति है। इससे बचने के लिए कुछ नियम अपनाए जा सकते हैं जो विभिन्न स्तरों पर आपके लिए मददगार हो सकते हैं, परंतु सबसे अहम है आपकी अपनी इच्छा शक्ति, यदि आप वाकयी अपनी डिजिटल हैबिट को लेकर चिंतित है तो ये नियम अपनाकर डिजिटल अनुशासन का लक्ष्य पाया जा सकता है।

पहला नियम : नोटिफिकेशन को मालिक न बनने दें

आपके फोन पर आने वाली हर नॉटिफिकेशन जरूरी नहीं है। क्या इंस्टाग्राम का नया फॉलोवर आपको उसी पल जानना जरूरी है? क्या किसी शॉपिंग एप की सैल से जुड़ी नोटिफिकेशन वायी इतनी महत्वपूर्ण है? क्या हर व्हाट्स एप ग्रुप मेसेज तुरंत देखना जरूरी है? अधिकतर मामलों में जवाब होगा नहीं। इसलिए गैर जरूरी नोटिफिकेशन आज से ही बंद कीजिए। जब नोटिफिकेशन नहीं आएगी, तो आपके ब्रेन को बार बार फोन चेक करने का क्यू भी कम मिलेगा। और धीरे धीरे यह आपको बार बार फोन चेक करने की आदत से बचने में मदद करेगा।

दूसरा नियम : पढ़ाई और मोबाइल के बीच दूरी है जरूरी

यह बहुत सिंपल लेकिन बेहतरीन तरीका है। पढ़ाई करते समय फोन को टेबल पर उल्टा रख देना पर्याप्त नहीं हो सकता। क्योंकि आपको पता है कि फोन वहीं है। बेहतर है कि फोन दूसरे कमरे में रख दें या अपने बैग में रख दें। कम से कम 30 से 45 मिनट के फोकस्ड स्टडी सेशन में फोन को दूर रखें तो यह मददगार होगा। क्योंकि डिसिप्लीन का मतलब हर बार आवेग को दबाना नहीं है। कभी कभी उसे दूर ही रखना बेहतर होता है।

तीसरा नियम : नो फोन जोन बनाएं

अपनी कुछ जगहें और समय मोबाइल फ्री रखें। जैसे पढ़ाई की मेज, भोजन की मेज, क्लासरूम, सुबह उठने के पहले आधा घंटा पहले और सोने से पहले अंतिम 30 मिनट। जब आप ये करेंगे तो धीरे-धीरे आपका ब्रेन इन जगहों को डिस्ट्रैक्सन फ्री जोन्स के रूप में पहचानने लगेगा।

चौथा नियम : सोशल मीडिया टाइम विंडो बनाएं

अगर आप कहेंगे कि मैं आज फोन नहीं नहीं चलाऊँगा तो यह टार्गेट असंभव जैसा हो सकता है। इसके बजाय आप ऐसे टार्गेट रख सकते हैं कि मैं इंस्टाग्राम या अन्य कोई सोशल मीडिया शाम 7ः 30 से 8ः00 बजे तक देखूँगा। अब आपका सोशल मीडिया उपयोग इंटेंशनल हो गया। यदि चाहें तो एप टाइमर या डिजिटल वेलबीन्ग जैसे टूल्स का भी उपयोग कर सकते हैं, लेकिन डिसिप्लीन आपको अपनी इच्छाशक्ति से ही बनाना होगा।

पांचवां नियम : सुबह की शुरूआत फोन से नहीं करेंगे

सुबह उठते ही इंस्टाग्राम खोलना दिन की शुरुआत अनुत्पादक बना सकता है क्योंकि आपने अपना दिन खुद तय नहीं किया। आपने किसी अल्गोरिथ्म को तय करने दिया कि सुबह आपके दिमाग में सबसे पहले क्या आएगा। इसके बजाय सुबह पानी पीजिए। थोड़ा टहल सकते है। आज के तीन महत्वपूर्ण काम जो आपको करने है वह लिखें। कुछ पढ़ भी सकते हैं। इससे आप पाएंगे कि दिन की शुरुआत का मूड बदलने लगता है।

छठा नियम : एक स्क्रीन, एक टास्क

जब पढ़ाई कर रहे हैं तो पढ़ाई ही करें और जब लेक्चर देख रहे हैं तो लेक्चर पर ध्यान केंद्रीत करें और जब असाइनमेंट लिख रहे हैं तो वही करें। अगर एक ही समय में पीडीएफ खुली है, व्हाट्स एप वेब खुला है, इंस्टाग्राम फोन में खुला है, यूट्यूब बैकग्राउंड में चल रहा है, और नोटिफिकेशन लगातार आ रही हैं तो आप मल्टी टास्किंग नहीं कर रहे। आपका अटेंशन लगातार स्विच हो रहा है। और इस तरह की मल्टी टास्किंग अक्सर उत्पादकता का भ्रम पैदा करती है।

सातवां नियम : कंटेंट डाइट बना सकते हैं

जिस तरह हम तय करते हैं कि हम क्या खाते हैं, उसी तरह यह तय करना चाहिए कि हम क्या देखते हैं। अपने सोशल मीडिया फीड को देखिए। आप किन अकाउंट्स को फॉलो करते हैं?अगर आपका पूरा फीड सेलेब्रिटी गोस्सिप, रैंडम मीम, लगजरी लाइफ स्टाइल, कंट्रॉवर्सिज और अंतहीन इंटरटेनमेंट से भरा पड़ा है तो आपका डिजिटल वातावरण आपको उसी दिशा में ले जाएगा। इसके बजाय कुछ मीनिंगफुल क्रिएटर फॉलो कीजिए जैसे कि एजुकेटर, रिसर्चर्स, जर्नालिस्ट्स, इंडस्ट्री एक्सपर्ट, ऑथर्स, साइंटिस्ट्स यह आर्टिस्ट्स। इससे आपका फीड सिर्फ इंटरटेनमेंट नहीं रहेगा। वह लर्निंग बन सकता है। लेकिन सावधान रहें क्योंकि कई विद्यार्थी पढ़ाई से बचने के लिए भी एजुकेशनल विडियोस देखने लगते हैं और तीन घंटे बाद पता चलता है पढ़ाई शुरू ही नहीं हुई। हर लेर्निंग कंटेंट के बाद खुद से पूछिए कि अब मैं इसका उपयोग क्या करूँगा?

इन नियमों को अपनाकर हम अपना डिजिटल डिसिप्लीन बना सकते हैं। वहीं जरूरी है कि टेक्नोलॉजी को कंजुमर से क्रिएटर बनने के लिए इस्तेमाल किया जाए। युवा विद्यार्थियों के लिए शायद सबसे महत्वपूर्ण डिजिटल शिफ्ट यही है। केवल रील्स देखिए मत। एक रील बनाइए। केवल पॉडकास्ट्स सुनने की बजाय एक छोटा पॉडकास्ट रिकॉर्ड करने की कोशिश करें। केवल आर्टिकल पढ़ते रहने की बजाय अर्टिकल लिखने की कोशिश करें। अपना अपना पोर्टफोलियो बनाइए जो आपको मदद कर सकता है। अगर हर दिन 60 मिनट स्क्रॉलिंग कम हो जाए तो आप एक साल में लगभग 365 घंटे बचा सकते हैं। और इनसे आप एक नई भाषा सीख सकते हैं कोई नया कोर्स कर सकते हैं। कई बुक्स पढ़ सकते हैं। वीडियो एडिटिंग या कोई अन्य नई स्किल सीख सकते हैं। आज अपने फोन से एक सवाल पूछिए कि क्या यह डिवाइस मेरी जिंदगी को बेहतर बना रहा है या सिर्फ मेरी खाली जगह भर रहा है? इसके बाद ईमानदारी से निर्णय लें। आपको स्मार्टफोन छोड़ने की जरूरत नहीं बस डिजिटल डिसिप्लीन की जरूरत।