- दीपक प्रकाश कुशवाहा को टिकट नहीं मिलने के बाद राजनीतिक हलकों में चर्चा गर्म। रालोमो और भाजपा के रिश्तों को लेकर फिर उठने लगे कई सवाल
बिहार : बिहार विधान परिषद की 9 सीटों के चुनाव और एक सीट के उपचुनाव को लेकर सोमवार को विधानसभा परिसर में एनडीए का शक्ति प्रदर्शन देखने को मिला। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की मौजूदगी में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के सभी उम्मीदवार नामांकन दाखिल करने पहुंचे। भाजपा, जदयू और लोजपा रामविलास के नेता भी इस मौके पर मौजूद रहे। केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान भी विधानसभा पहुंचे, लेकिन इस पूरे आयोजन में राष्ट्रीय लोक मोर्चा के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा और उनके मंत्री पुत्र दीपक प्रकाश कुशवाहा की गैरमौजूदगी ने सियासी चर्चा को नया मोड़ दे दिया।
जब एनडीए उम्मीदवारों के नामांकन कार्यक्रम में शामिल नहीं होने को लेकर उपेंद्र कुशवाहा से सवाल किया गया, तो उन्होंने कहा कि पार्टी की ओर से विधायक दल के नेता माधव आनंद वहां पहुंचे हैं। हालांकि, जब उनसे पूछा गया कि मंत्री दीपक प्रकाश कुशवाहा नामांकन प्रक्रिया में क्यों नहीं गए तो उन्होंने जवाब देने से परहेज किया। यही चुप्पी अब राजनीतिक गलियारों में सबसे ज्यादा चर्चा का विषय बनी हुई है।
असल मुद्दा दीपक प्रकाश कुशवाहा के मंत्री पद से जुड़ा है। एमएलसी चुनाव उनके लिए विधान पार्षद बनकर मंत्री पद बचाने का अवसर बन सकता था, लेकिन भाजपा की ओर से उन्हें टिकट नहीं दिया गया। दीपक पहले भी नीतीश सरकार में करीब पांच महीने मंत्री रहे थे, लेकिन उस दौरान वे किसी सदन के सदस्य नहीं बन पाए। सम्राट चौधरी सरकार में 7 मई को उन्हें फिर मंत्री पद मिला, लेकिन अब यदि वे विधायक या विधान पार्षद नहीं बन पाते हैं, तो उनके मंत्री पद पर संकट कभी भी गहरा सकता है। वे कब इस्तीफा देंगे या उनसे कब इस्तीफा मांगा जाएगा, यह अभी स्पष्ट नहीं है, लेकिन उसका तरीका एनडीए में उपेंद्र कुशवाहा के भविष्य का संकेत दे सकता है।
इस पूरे घटनाक्रम को रालोमो और भाजपा के रिश्तों से भी जोड़कर देखा जा रहा है। चर्चा है कि भाजपा की ओर से रालोमो के विलय का प्रस्ताव लंबे समय से राजनीतिक गलियारों में तैर रहा था, जिसे उपेंद्र कुशवाहा ने स्वीकार नहीं किया। कुशवाहा ने हाल में साफ कहा था कि रालोमो के भाजपा में विलय की चर्चा बहुत दिनों से उड़ाई जा रही है, लेकिन दुनिया की कोई ताकत ऐसा नहीं कर सकती। उन्होंने यह भी कहा था कि रालोमो एनडीए में था, है और आगे भी रहेगा। सोमवार को वे दोपहर बाद दिल्ली रवाना होने वाले थे, जहां 13 जून को पार्टी का राष्ट्रीय सम्मेलन होना है। इस सम्मेलन में उपेंद्र कुशवाहा की फिर से पार्टी अध्यक्ष पद पर ताजपोशी तय मानी जा रही है।
विधानसभा में संख्या बल के हिसाब से एनडीए मजबूत स्थिति में है। गठबंधन के पास 202 विधायक हैं और 9 सीटों के चुनाव में वह 8 सीटों पर जीत दर्ज कर सकता है। एनडीए ने इन सीटों के लिए भाजपा से 4, जदयू से 3 और लोजपा रामविलास से 1 उम्मीदवार दिया है। विपक्ष की ओर से एक सीट राष्ट्रीय जनता दल के खाते में जाने की संभावना है। राजद ने पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी के मुंहबोले भाई और मौजूदा एमएलसी सुनील कुमार सिंह को फिर टिकट दिया है। सुनील सिंह ने सोमवार को सबसे पहले नामांकन दाखिल किया।
यदि 9 सीटों के लिए केवल यही 9 उम्मीदवार मैदान में रहते हैं, तो बिना मतदान सभी निर्विरोध निर्वाचित हो जाएंगे। इसके अलावा एक सीट पर उपचुनाव होना है। यह सीट नीतीश कुमार के कारण खाली हुई थी और इस पर जदयू उम्मीदवार की जीत तय मानी जा रही है। कुल मिलाकर विधानसभा में एनडीए और राजद के 10 उम्मीदवारों ने पर्चा दाखिल किया है। मौजूदा समीकरणों में कोई 11वां उम्मीदवार सामने आता नहीं दिख रहा है, इसलिए मतदान की नौबत आए बिना सभी 10 उम्मीदवारों का निर्विरोध चुना जाना लगभग तय माना जा रहा है।
भाजपा ने इस चुनाव में कई चेहरों को मौका दिया है। भोजपुरी फिल्मों के सुपरस्टार पवन सिंह, प्रदेश उपाध्यक्ष अनिल कुमार ठाकुर और पूर्व प्रदेश उपाध्यक्ष शीला प्रजापति को पहली बार टिकट दिया गया है। वहीं मौजूदा एमएलसी संजय मयूख फिर से टिकट पाने में सफल रहे हैं। जदयू ने नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार, महिला प्रकोष्ठ की प्रदेश अध्यक्ष भारती मेहता, प्रदेश सचिव शिवरानी देवी प्रजापति और शेखपुरा के ललन प्रसाद को उम्मीदवार बनाया है। ललन प्रसाद उपचुनाव वाली सीट से मैदान में हैं। लोजपा रामविलास की ओर से केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान ने पार्टी के कार्यकारी प्रदेश अध्यक्ष अशरफ अंसारी को टिकट दिया है।
इस चुनाव में परिणाम से ज्यादा चर्चा एनडीए के भीतर के संदेशों को लेकर है। भाजपा, जदयू और लोजपा रामविलास के उम्मीदवारों के नामांकन में जहां गठबंधन की एकजुटता दिखाई गई, वहीं उपेंद्र कुशवाहा और दीपक प्रकाश कुशवाहा की दूरी ने यह संकेत भी दिया कि सब कुछ उतना सहज नहीं है जितना मंच पर दिखाने की कोशिश होती है।
अब सबसे बड़ा सवाल दीपक प्रकाश कुशवाहा के मंत्री पद को लेकर है। यदि वे निकट भविष्य में किसी सदन के सदस्य नहीं बनते हैं, तो संवैधानिक बाध्यता के कारण उन्हें पद छोड़ना पड़ सकता है। ऐसे में उनका इस्तीफा कैसे होता है और एनडीए नेतृत्व उपेंद्र कुशवाहा के साथ कैसा व्यवहार करता है, यह बिहार की आगे की सियासत का बड़ा संकेत होगा।
