हरनौत के तपिश में झुलस रहा जदयू, नालंदा की राजनीति में अंदरूनी संघर्ष बना चर्चा का विषय

प्रभात कुमार, बिहार

नीतीश कुमार की राजनीतिक कर्मभूमि माने जाने वाले हरनौत विधानसभा क्षेत्र में जनता दल यूनाइटेड के भीतर चल रही अंदरूनी खींचतान अब सतह पर आ गई है। 1995 से लगातार इस सीट का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ विधायक हरिनारायण सिंह ने पार्टी लाइन से अलग रुख अपनाते हुए बगावत के संकेत दे दिए हैं। वहीं, नालंदा से नौवीं बार विधायक चुने गए श्रवण कुमार के विधायक दल के नेता बनने और मंत्री पद मिलने से क्षेत्र में उत्साह और कार्यकर्ताओं में उल्लास का माहौल है।

दूसरी ओर, सम्राट चौधरी मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिलने से नाराज चल रहे हरिनारायण सिंह ने इस्तीफे की तमाम अटकलों को खारिज कर दिया है। उनकी नाराजगी इतनी गहरी बताई जा रही है कि उन्होंने विरोधी दल के नेता लालू यादव की सार्वजनिक तौर पर प्रशंसा तक कर दी। दो दिन पहले एक जनसभा में उन्होंने स्पष्ट कहा कि उनके विधानसभा कार्यकाल के अभी साढ़े चार वर्ष से अधिक शेष हैं और ऐसी स्थिति में पद छोड़ने का कोई सवाल ही नहीं उठता। उनका यह बयान सीधे तौर पर पार्टी के उस अनौपचारिक प्रस्ताव को चुनौती माना जा रहा है, जिसमें हरनौत सीट को निशांत कुमार के लिए खाली कराने की चर्चा चल रही है।

हरिनारायण सिंह की नाराजगी की जड़ 2025 विधानसभा चुनाव के बाद बने नए मंत्रिमंडल से जुड़ी मानी जा रही है। अस्सी वर्ष की आयु पार कर चुके बिहार सरकार के उपमुख्यमंत्री विजेंद्र प्रसाद यादव ने स्वयं मंत्रिमंडल में शामिल नहीं होने की इच्छा जताई थी। वहीं, हरिनारायण सिंह 1995 के उपचुनाव के बाद से लगातार हरनौत से विधायक हैं। वरिष्ठता के क्रम में वे वर्तमान उपमुख्यमंत्री विजेंद्र यादव से भी आगे माने जाते हैं और पूर्व की नीतीश सरकारों में मंत्री पद का दायित्व भी संभाल चुके हैं। इसके बावजूद सम्राट चौधरी की नई सरकार में उन्हें मंत्रिमंडल में स्थान नहीं मिला।

इस मुद्दे को लेकर अब उनके तेवर बागी होते दिखाई दे रहे हैं। हालांकि पार्टी का एक धड़ा मानता है कि उम्र और अनुभव को देखते हुए उन्हें मंत्रिमंडल में जगह मिलनी चाहिए थी, जबकि दूसरा धड़ा उनकी उम्र और स्वास्थ्य का हवाला देते हुए राजनीतिक संन्यास की वकालत कर रहा है। शुरुआत में मंत्री पद की इच्छा से इनकार करने वाले हरिनारायण सिंह अब खुलकर असंतोष जाहिर कर रहे हैं। हाल के दिनों में उनकी स्थानीय सक्रियता बढ़ी है और उन्होंने विपक्षी नेताओं के कार्यों की सार्वजनिक सराहना भी की है, जिसे राजनीतिक हलकों में नीतीश कुमार और पार्टी नेतृत्व पर परोक्ष हमला माना जा रहा है।

इस पूरे विवाद के केंद्र में पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के पुत्र निशांत कुमार का नाम है। निशांत कुमार को 2025 चुनाव के बाद बिहार सरकार में मंत्री बनाया गया है। संविधान के अनुच्छेद 164(4) के तहत किसी भी मंत्री के लिए छह महीने के भीतर विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य बनना आवश्यक होता है। निशांत कुमार ने विधान परिषद के बजाय सीधे विधानसभा से निर्वाचित होने की इच्छा जाहिर की है। इसके बाद से हरनौत सीट को लेकर अटकलें तेज हो गई हैं।

दरअसल, 2025 विधानसभा चुनाव से पहले ही हरनौत से निशांत कुमार की उम्मीदवारी की चर्चा जोरों पर थी। उस समय पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव मनीष कुमार वर्मा भी इस सीट से दावेदारी कर रहे थे। पार्टी के भीतर एकमत नहीं होने के बावजूद तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पुराने साथी हरिनारायण सिंह पर भरोसा जताते हुए उन्हें टिकट दिया था। हरिनारायण सिंह चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे।

दिलचस्प बात यह है कि चुनाव प्रचार के दौरान खुद हरिनारायण सिंह ने सार्वजनिक मंच से कहा था कि यदि भविष्य में निशांत कुमार हरनौत से चुनाव लड़ना चाहें, तो वे उनके लिए सीट खाली कर देंगे। लेकिन अब उन्होंने अपना रुख बदल लिया है। पार्टी सूत्रों के अनुसार, नेतृत्व की ओर से यह प्रस्ताव रखा गया था कि हरिनारायण सिंह विधायक पद से इस्तीफा देकर विधान परिषद चले जाएं, ताकि उपचुनाव में निशांत कुमार हरनौत से चुनाव लड़ सकें। फिलहाल हरिनारायण सिंह ने इस प्रस्ताव को मानने से इनकार कर दिया है।

हरनौत सीट का महत्व इसलिए भी अधिक है क्योंकि यह नालंदा जिले में स्थित है, जिसे नीतीश कुमार का गृह जिला और जदयू का सबसे मजबूत गढ़ माना जाता है। नीतीश कुमार का इस सीट से गहरा संबंध रहा है। वे 1985 में पहली बार यहीं से विधायक चुने गए थे। इससे पहले 1977 और 1980 के चुनाव में उन्हें इसी सीट से हार का सामना करना पड़ा था। 1995 में बाढ़ लोकसभा सीट से सांसद चुने जाने के बाद उन्होंने हरनौत विधानसभा सीट से इस्तीफा दिया था। उनके इस्तीफे से रिक्त हुई सीट पर हुए उपचुनाव में हरिनारायण सिंह पहली बार विधायक बने और तब से लगातार जीतते आ रहे हैं।

हरनौत की जनता के एक वर्ग की मांग है कि अब नीतीश कुमार की परंपरागत सीट से उनके पुत्र निशांत कुमार को चुनाव लड़ना चाहिए। वहीं हरिनारायण सिंह का तर्क है कि उन्होंने तीन दशक तक क्षेत्र की सेवा की है और जनता ने 2025 में भी उन्हें पूर्ण बहुमत से जिताया है। ऐसे में वे अपना कार्यकाल पूरा करना चाहते हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि हरिनारायण सिंह बागी रुख अपनाते हैं, तो इसका असर नालंदा जिले की अन्य सीटों पर भी पड़ सकता है।

फिलहाल गेंद जदयू के शीर्ष नेतृत्व के पाले में है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने अब तक इस मुद्दे पर कोई आधिकारिक टिप्पणी नहीं की है। पार्टी के सामने चुनौती यह है कि तीन दशक से साथ निभा रहे वरिष्ठ नेता को कैसे संतुष्ट किया जाए और साथ ही निशांत कुमार के राजनीतिक भविष्य को भी सुरक्षित रखा जाए। निशांत कुमार को मंत्री पद पर बने रहने के लिए अगले कुछ महीनों में किसी सदन का सदस्य बनना अनिवार्य है। यदि हरिनारायण सिंह अपने रुख पर कायम रहते हैं, तो पार्टी को निशांत के लिए कोई दूसरी सीट तलाशनी पड़ सकती है।

यह पूरा प्रकरण जदयू के भीतर चल रहे ‘उत्तराधिकार बनाम वरिष्ठता’ के संघर्ष को उजागर करता है। एक तरफ तीन दशक का अनुभव और मजबूत जनाधार रखने वाले हरिनारायण सिंह हैं, जो अपनी राजनीतिक पारी समाप्त नहीं करना चाहते। दूसरी तरफ निशांत कुमार हैं, जिन्हें पार्टी के भविष्य के चेहरे के रूप में स्थापित करने की कोशिश हो रही है।

आने वाले दिन तय करेंगे कि हरनौत की यह सियासी लड़ाई समझौते की मेज पर खत्म होती है या बगावत की राह पकड़ती है। फिलहाल नालंदा की राजनीति में सबकी नजर हरिनारायण सिंह के अगले कदम पर टिकी हुई है।