कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और पश्चिम एशिया तनाव के बीच भारतीय मुद्रा ऐतिहासिक निचले स्तर तक पहुंची
सेंट्रल डेस्क, नई दिल्ली
अंतरराष्ट्रीय बाजार में बढ़ते तनाव और महंगे होते कच्चे तेल ने भारतीय अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ाना शुरू कर दिया है। शुक्रवार को अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया रिकॉर्ड कमजोर स्तर तक फिसल गया। कारोबार के दौरान पहली बार रुपया 96 प्रति डॉलर के स्तर के नीचे पहुंच गया, जिससे वित्तीय बाजारों में हलचल तेज हो गई। हालांकि दिन के अंत में भारतीय रिजर्व बैंक की संभावित सक्रियता की चर्चा के बाद रुपये में कुछ सुधार देखने को मिला।
विदेशी मुद्रा बाजार में कारोबार की शुरुआत कमजोर संकेतों के साथ हुई। रुपया शुरुआती कारोबार में ही दबाव में दिखा और धीरे धीरे गिरते हुए अपने अब तक के सबसे कमजोर स्तर तक पहुंच गया। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि पश्चिम एशिया में बढ़ते भू राजनीतिक तनाव और ईरान से जुड़े हालात ने निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है। इसका सबसे बड़ा असर कच्चे तेल की कीमतों पर पड़ा, जिसका सीधा दबाव भारतीय मुद्रा पर देखने को मिला।
विशेषज्ञों के अनुसार इस वर्ष अब तक रुपये में लगातार कमजोरी बनी हुई है। डॉलर के मुकाबले भारतीय मुद्रा में छह प्रतिशत से अधिक गिरावट दर्ज की जा चुकी है। हाल के कारोबारी सत्रों में गिरावट की रफ्तार और तेज हुई है, जिससे आयात लागत और महंगाई को लेकर नई चिंताएं खड़ी हो गई हैं।
डॉलर की मजबूती भी रुपये पर भारी पड़ रही है। अमेरिकी अर्थव्यवस्था से जुड़े मजबूत आंकड़ों के बाद वैश्विक निवेशकों का भरोसा डॉलर पर बढ़ा है। इससे अमेरिकी मुद्रा लगातार मजबूत हो रही है और उभरते बाजारों की मुद्राओं पर दबाव बढ़ रहा है। बाजार विश्लेषकों का कहना है कि विदेशी निवेश प्रवाह कमजोर पड़ने और निवेशकों की बिकवाली ने भी रुपये की स्थिति को कमजोर किया है।
उधर, अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमतों में तेज उछाल देखा गया। तेल की बढ़ती कीमतों से भारत जैसे आयात आधारित देशों पर अतिरिक्त आर्थिक दबाव बनता है, क्योंकि इससे आयात बिल और महंगाई दोनों बढ़ने की आशंका रहती है। यही वजह है कि रुपये में गिरावट के साथ साथ महंगाई को लेकर भी चिंता बढ़ने लगी है।
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दिनों में भारतीय रिजर्व बैंक बाजार में हस्तक्षेप कर रुपये को सहारा देने की कोशिश कर सकता है। साथ ही सरकार और केंद्रीय बैंक आयात शुल्क तथा अन्य आर्थिक उपायों के जरिए बाजार में स्थिरता बनाए रखने का प्रयास कर सकते हैं।
आर्थिक जानकारों का कहना है कि जब तक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तनाव कम नहीं होता और कच्चे तेल की कीमतों में नरमी नहीं आती, तब तक रुपये पर दबाव बना रह सकता है। फिलहाल निवेशकों और कारोबारियों की नजर रिजर्व बैंक की अगली रणनीति और वैश्विक बाजार के संकेतों पर टिकी हुई है।

