बार-बार आने वाली बाढ़ से खेती को बचाने के लिए दीर्घकालीन समाधान पर काम करना जरूरी
बाढ़ का पानी आज नहीं तो कल उतर जाएगा। सड़कें फिर दिखाई देने लगेंगी, गांवों में आवाजाही सामान्य हो जाएगी और राहत शिविर भी धीरे-धीरे खाली हो जाएंगे। लेकिन जिस किसान की खड़ी फसल पानी में डूब गई, उसके जीवन से बाढ़ इतनी जल्दी नहीं उतरती। खेत में लगा पैसा चला गया, महीनों की मेहनत मिट्टी में मिल गई और सामने अगली फसल की तैयारी खड़ी है। ऐसे किसान के लिए असली संकट पानी घटने के बाद शुरू होता है।
बिहार में इस बार बाढ़ ने बड़ी आबादी के साथ खेती को भी गंभीर चोट पहुंचाई है। कई इलाकों में केला, मक्का और दूसरी फसलों को नुकसान हुआ है। प्रभावित क्षेत्रों में क्षति का आकलन भी किया जा रहा है। यह जरूरी है, लेकिन उससे बड़ा सवाल यह है कि आकलन के बाद सहायता किसान तक कब पहुंचेगी? किसान का कृषि चक्र सरकारी फाइलों के हिसाब से नहीं चलता। उसे अगली बुआई के लिए समय पर खेत तैयार करना है, बीज और खाद खरीदनी है तथा मजदूरी का इंतजाम करना है। यदि सहायता तब मिले, जब बुआई का समय निकल चुका हो तो उसका उद्देश्य ही अधूरा रह जाता है।
सबसे ज्यादा चिंता छोटे और सीमांत किसानों की है। उनके लिए एक फसल का डूबना केवल खेती का नुकसान नहीं होता, बल्कि पूरे परिवार का बजट बिगड़ जाता है। इसी फसल से बच्चों की पढ़ाई चलती है, इलाज होता है, घर का खर्च निकलता है और पुराने कर्ज चुकाए जाते हैं। फसल चली गई तो किसान के सामने दोहरी मुश्किल खड़ी होती है। पुराना कर्ज चुकाना और अगली खेती के लिए फिर उधार लेना।
यही कारण है कि बाढ़ के बाद केवल नुकसान की सूची तैयार कर देना पर्याप्त नहीं है। सर्वे तेजी से हो, वास्तविक नुकसान दर्ज किया जाए और पात्र किसान को सहायता के लिए दफ्तरों के चक्कर न लगाने पड़ें। फसल बीमा और आपदा राहत की उपयोगिता भी तभी है, जब संकट के समय किसान को उसका लाभ आसानी और समय पर मिले। तकनीक के इस दौर में खेतों का सर्वे, नुकसान का सत्यापन और सहायता का भुगतान महीनों तक लटका रहना स्वीकार्य नहीं होना चाहिए।
बिहार की समस्या केवल इस साल की बाढ़ तक सीमित नहीं है। राज्य के बड़े हिस्से दशकों से बाढ़ की मार झेलते आए हैं। हर साल पानी आता है, फसलें डूबती हैं, नुकसान का आकलन होता है और राहत की चर्चा शुरू हो जाती है। सवाल यह है कि यह सिलसिला कब तक इसी तरह चलता रहेगा? तटबंधों की निगरानी, नदियों में गाद, जल निकासी, बाढ़ के पानी के बेहतर प्रबंधन और बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों के अनुकूल खेती पर दीर्घकालीन योजना बनानी होगी। केवल आपदा आने के बाद सक्रिय होने से समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकलेगा।
मौसम का बदलता मिजाज चुनौती को और गंभीर बना रहा है। कहीं अत्यधिक पानी खेती को डुबो रहा है तो कहीं पर्याप्त बारिश नहीं होने से किसान सिंचाई के लिए परेशान है। ऐसे में बिहार की कृषि नीति को भी बदलती जलवायु के अनुरूप ढालना होगा। कम अवधि और बाढ़ सहने वाली फसलों, बेहतर सिंचाई, मौसम की सटीक सूचना और स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार खेती को बढ़ावा देना जरूरी है।
किसान को संकट के समय केवल सहानुभूति नहीं, ऐसी व्यवस्था चाहिए जो उसे दोबारा खड़ा कर सके। नुकसान का आकलन तेज हो, सहायता समय पर मिले और अगली फसल के लिए जरूरी संसाधन उपलब्ध कराए जाएं। साथ ही हर साल दोहराई जाने वाली इस त्रासदी के स्थायी समाधान पर काम हो। बाढ़ का पानी अपने समय पर उतर जाता है, लेकिन किसान के सिर चढ़ा नुकसान तभी उतरता है, जब उसका खेत फिर हरा होता है।
