प्रशिक्षण के बाद सरकार देगी लोन, समाज के मुख्यधारा से जुड़ जायेंगे नक्सली, 15 लाख के इनामी नक्सली सहित रांची जिले का लाल आतंक कुंदन पाहन भी सीख रहा हुनर
झारखंड से कौस्तुभ कुमार मलयज
नक्सलवाद से राज्य को दहलाने वाले, बम बनाने और हथियार से सटीक निशाना लगाकर पुलिस व पूंजीपतियों को मौत के घाट उतारने वाले हाथ अब लोगों को अपने हाथों का हुनर दिखाएंगे। हजारीबाग स्थित ओपन जेल में कई इनामी नक्सलियों समेत कुल 124 पूर्व नक्सली रह रहे हैं। इनमें 96 पुरुष और 28 महिलाएं शामिल हैं। यहां 11 पति-पत्नी के जोड़े भी रह रहे हैं, जिनके साथ नौ बच्चे भी हैं। नक्सलियों को मुर्गी पालन और टेलरिंग का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। 60 पूर्व नक्सलियों को दो बैच में प्रशिक्षण दिया जा रहा है। जेल प्रशासन का कहना है कि ग्रामीण परिवेश के मुल निवासी होने के कारण उन्हें मुर्गी पालन व टेलरिंग का प्रशिक्षण दिया जा रहा है।
हजारीबाग जेल प्रशासन के अनुसार प्रशिक्षण लेने के बाद जब वे पूर्व नक्सली जेल से बाहर आयेंगे, तो अपना रोजगार कर जीविका चला सकेगें, इतना अधिक हुनरमंद उन्हें बना दिया जा रहा है। मुख्यमंत्री रोजगार सृजन योजना की तहत उन्हें सरकार की ओर से लोन उपलब्ध कराया जायेगा। प्रशिक्षण का उद्घाटन करने पहुंचे हजारीबाग डीसी ने भी उन्हें यह आश्वासन दिया है कि जो हजारीबाग में अपना व्यवसाय खोलना चाहते हैं, उन्हें सारी व्यवस्था वे उपलब्ध करा देंगे। अन्य जिलों के पूर्व नक्सलियों के लिए वे अपने स्तर से बात कर उन्हें भी सहायता उपलब्ध करवा देंगे।
हाल में सरेंडर करने वाले 15 लाख रुपये के इनामी नक्सली संतोष महतो उर्फ वासुदेव दा उर्फ दिलीप, 10 लाख रुपये के इनामी अश्विन और चंदन लोहरा, पांच लाख रुपये के इनामी अनिल तुरी उर्फ उज्ज्वल, सुखलाल बिरजिया उर्फ अकेला और दो लाख रुपये के इनामी सुदेश होनहागा उर्फ सोनाराम होनहागा समेत कई इनामी Dumdum इन दिनों विभिन्न तरह के हुनर सीख रहे हैं। रांची और खूंटी जिले में नक्सली गतिविधियों से जुड़े रहे कुंदन पाहन सहित कई नामी नक्सली हुनर सीख रहे हैं।
बंदूक से बाजार तक : आत्मसमर्पित नक्सलियों के हुनर को मिलेगी नई पहचान
कभी हाथों में हथियार था और जिंदगी का रास्ता जंगलों से होकर गुजरता था। अब उन्हीं हाथों में हुनर है और नजरें एक बेहतर भविष्य पर टिकी हैं। आत्मसमर्पण के बाद मुख्यधारा में लौटे नक्सलियों के पुनर्वास को अब सिर्फ प्रशिक्षण और पढ़ाई तक सीमित रखने के बजाय उन्हें बाजार से जोड़ने की तैयारी है। हजारीबाग के ओपन जेल में चल रही इस पहल का मकसद है कि प्रशिक्षण के बाद तैयार होने वाले उत्पादों को बाजार मिले और हुनर उनके लिए आमदनी का जरिया बन सके। सरकारी व्यवस्था का लाभ आत्मसमर्पित नक्सलियों को भी देने की कोशिश की जा रही है। उन्हें विभिन्न कामों का प्रशिक्षण देकर हुनरमंद बनाने के बाद तैयार उत्पादों को बाजार तक पहुंचाने की व्यवस्था विकसित करने पर जोर है। इससे प्रशिक्षण लेने वालों के सामने रोजगार और आत्मनिर्भरता का रास्ता खुल सकता है।
