छत्तीसगढ़ की लोक परंपरा को विश्व मंच तक पहुंचाने वाली पंडवानी ने रायपुर एम्स में अंतिम सांस ली
छत्तीसगढ़ की प्रसिद्ध पंडवानी गायिका और पद्म विभूषण से सम्मानित तीजन बाई अब इस दुनिया में नहीं रहीं। 70 वर्ष की आयु में उन्होंने रायपुर स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में तड़के करीब 3:15 बजे अंतिम सांस ली। वह लंबे समय से गंभीर रूप से बीमार थीं और अस्पताल में उनका इलाज चल रहा था। उनके निधन से भारतीय लोक संगीत और सांस्कृतिक जगत में शोक की लहर दौड़ गई है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी तीजन बाई के निधन पर गहरा दुख जताया। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा, "सुप्रसिद्ध पंडवानी गायिका तीजन बाई जी के निधन से अत्यंत दुख हुआ है। उन्होंने छत्तीसगढ़ की इस लोक कला को अपनी भव्य प्रस्तुति से दुनियाभर में एक विशिष्ट पहचान दिलाई। उनका जाना कला एवं संस्कृति जगत के लिए एक अपूरणीय क्षति है। शोक की इस घड़ी में मेरी संवेदनाएं उनके परिजनों और प्रशंसकों के साथ हैं।
8 अगस्त 1956 को भिलाई के निकट गनियारी गांव में जन्मी तीजन बाई का बचपन बेहद साधारण परिस्थितियों में बीता। उनके नाना बृजलाल पारधी उन्हें महाभारत की कथाएं सुनाया करते थे। इन्हीं कथाओं ने उनके भीतर पंडवानी गायन के प्रति गहरा लगाव पैदा किया। महज 13 वर्ष की उम्र में उन्होंने पहली बार मंच पर प्रस्तुति दी, जिसके बदले उन्हें केवल 10 रुपये मिले थे। यही छोटी शुरुआत आगे चलकर उन्हें अंतरराष्ट्रीय पहचान तक ले गई।
तीजन बाई ने पंडवानी की कापालिक शैली को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया। उस समय महिलाओं के लिए बैठकर 'वेदामति' शैली में प्रस्तुति देना ही परंपरा मानी जाती थी, लेकिन उन्होंने इस रूढ़ि को तोड़ते हुए खड़े होकर अभिनय, भाव-भंगिमा और पूरे उत्साह के साथ पंडवानी प्रस्तुत करनी शुरू की। उनकी बुलंद आवाज और प्रभावशाली मंच प्रस्तुति ने इस लोक कला को नई पहचान दिलाई।
उनका निजी जीवन भी संघर्षों से भरा रहा। कम उम्र में विवाह होने के बाद जब उन्होंने पंडवानी गायन को अपना जीवन बनाया, तो उन्हें परिवार और समाज के विरोध का सामना करना पड़ा। सामाजिक बहिष्कार, आर्थिक तंगी और निजी कठिनाइयों के बावजूद उन्होंने अपने संकल्प को नहीं छोड़ा। बाद में उन्होंने तुकाराम उर्फ टुक्का राम से विवाह किया और हर चुनौती के बीच अपनी कला की साधना जारी रखी।
करीब पांच दशकों से अधिक समय तक तीजन बाई ने देश-विदेश में हजारों मंचों पर पंडवानी की प्रस्तुतियां दीं। हाथ में तंबूरा लेकर जब वह महाभारत के पात्रों और प्रसंगों को जीवंत करती थीं तो दर्शक मंत्रमुग्ध हो जाते थे। उनकी प्रस्तुति केवल गायन नहीं, बल्कि अभिनय, कथा-वाचन और लोक संस्कृति का अद्भुत संगम होती थी।
भारतीय लोक कला में उनके असाधारण योगदान के लिए उन्हें कई प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा गया। वर्ष 1988 में उन्हें पद्मश्री, 2003 में पद्म भूषण और 2019 में देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। इसके अलावा उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार सहित कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मान भी मिले।
तीजन बाई भले ही आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी दमदार आवाज, पंडवानी की अनूठी शैली और लोक संस्कृति के प्रति समर्पण आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करता रहेगा। भारतीय लोक कला के इतिहास में उनका नाम सदैव सम्मान और गौरव के साथ याद किया जाएगा।
