अब एसकेएमसीएच के लावारिस वार्ड में जिंदगी से जंग लड़ रहा बुजुर्ग। पत्नी की मौत के बाद अकेले दम पर बेटी का पालन-पोषण कर उसकी शादी की

मुजफ्फरपुर : जिंदगी भर परिवार के लिए संघर्ष करने वाला एक बुजुर्ग आज अपने ही लोगों की बेरुखी का शिकार बनकर अस्पताल के लावारिस वार्ड में दिन काटने को मजबूर है। कभी पत्नी के निधन के बाद अकेले बेटी का पालन-पोषण किया, उसे पढ़ाया-लिखाया और शादी कर अपने घर से विदा किया। लेकिन बुढ़ापे में जब सहारे की जरूरत पड़ी तो अपनों ने ही मुंह मोड़ लिया। आज हालत यह है कि नाम, पता और गांव सब कुछ होने के बावजूद एसकेएमसीएच के लावारिस वार्ड में उनकी देखभाल करने वाला कोई नहीं है।

यह मार्मिक कहानी पूर्वी चंपारण जिले के राजेपुर थाना क्षेत्र के मोहम्मदपुर मझौलिया निवासी 70 वर्षीय ऋषिकेश प्रसाद सिंह की है। जीवन की कठिन परिस्थितियों से जूझते-जूझते उनका बुढ़ापा भी दर्द और अकेलेपन में गुजर रहा है।

बताया जाता है कि कई वर्ष पहले उनकी पत्नी का निधन हो गया था। पत्नी अपने पीछे एक छोटी बेटी छोड़ गई थीं। ऋषिकेश प्रसाद सिंह ने अकेले ही बेटी का पालन-पोषण किया और समय आने पर उसकी शादी भी कर दी। विवाह के बाद बेटी अपने ससुराल चली गई और बुजुर्ग अकेले रह गए।

इसी बीच संपत्ति को लेकर रिश्तेदारों और अपने छोटे भाई से विवाद शुरू हो गया। आरोप है कि उन्हें लगातार प्रताड़ित किया गया और उनकी जमीन-जायदाद हड़पने की कोशिश की गई। हालात ऐसे बने कि उन्हें अपना पैतृक घर छोड़ना पड़ा। इसके बाद वह नालंदा जिले के नूरसराय थाना क्षेत्र के चकचंगासी गांव में जाकर चाय की छोटी दुकान चलाकर किसी तरह अपना जीवनयापन करने लगे।

करीब छह महीने पहले जब वह अपने गांव लौटे तो देखा कि उनके घर पर उनका अधिकार ही समाप्त हो चुका है। इस सदमे से वह अभी उबर भी नहीं पाए थे कि करीब दो महीने पहले शौच से लौटते समय उनका पैर फिसल गया। गिरने से उनके बाएं कुल्हे की हड्डी टूट गई और वह गंभीर रूप से घायल हो गए।

गांव के कुछ लोगों ने मानवता दिखाते हुए उन्हें इलाज के लिए श्रीकृष्ण मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल (एसकेएमसीएच) पहुंचाया। यहां भर्ती कराने के बाद सभी लोग वापस लौट गए। तब से वह अस्पताल के वार्ड संख्या-दो स्थित लावारिस वार्ड में भर्ती हैं।

सबसे पीड़ादायक बात यह है कि उनका पूरा परिचय दर्ज होने के बावजूद आज तक कोई परिजन उनसे मिलने नहीं पहुंचा। अस्पताल के बिस्तर पर पड़े ऋषिकेश प्रसाद सिंह अपनों की राह देखते रहते हैं। उनका दर्द केवल बीमारी का नहीं, बल्कि उस अकेलेपन का भी है, जिसमें जीवन भर परिवार के लिए संघर्ष करने वाला एक इंसान अपने अंतिम पड़ाव पर पूरी तरह असहाय होकर रह गया है।

ऋषिकेश प्रसाद सिंह की यह कहानी केवल एक व्यक्ति की पीड़ा नहीं, बल्कि समाज के सामने खड़ा एक ऐसा सवाल भी है, जो रिश्तों, संवेदनाओं और मानवीय जिम्मेदारियों पर गंभीर चिंतन करने को मजबूर करता है।