रक्षा सहयोग को नई मजबूती देने वाले कई महत्वपूर्ण समझौतों की उम्मीद जताई जा रही है
जिस यूरेनियम को लेकर अमेरिका और ईरान के बीच दशकों से तनाव बना हुआ है और जिसके कारण दोनों देशों के बीच कई बार सैन्य टकराव की स्थिति पैदा हो चुकी है, उसी यूरेनियम को लेकर भारत अब एक बड़ा रणनीतिक कदम उठाने जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने तीन देशों के दौरे के तहत बुधवार को ऑस्ट्रेलिया पहुंचे, जहां ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज के साथ उनकी अहम बैठक होनी है। इस बैठक में कई महत्वपूर्ण समझौतों की उम्मीद है, जिनमें सबसे अहम ऑस्ट्रेलिया से यूरेनियम आयात का समझौता माना जा रहा है। इस प्रस्तावित डील पर चीन की भी पैनी नजर रहने की संभावना है।
अधिकारियों के अनुसार, प्रधानमंत्री मोदी के ऑस्ट्रेलिया पहुंचने के साथ ही भारत की हिंद-प्रशांत रणनीति का एक नया चरण भी शुरू हो गया है। इस यात्रा के केंद्र में चीन की बढ़ती क्षेत्रीय सक्रियता, महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति सुनिश्चित करना, ऊर्जा सुरक्षा, समुद्री सुरक्षा और रणनीतिक सहयोग को मजबूत करना शामिल है।
सरकारी सूत्रों का कहना है कि यूरेनियम आयात से जुड़ा समझौता इस पूरे दौरे का सबसे महत्वपूर्ण एजेंडा है।
ऑस्ट्रेलिया दुनिया के सबसे बड़े यूरेनियम भंडार वाले देशों में शामिल है। वैश्विक यूरेनियम भंडार का एक-चौथाई से अधिक हिस्सा वहीं मौजूद है। भारत अपनी परमाणु ऊर्जा परियोजनाओं के लिए दीर्घकालिक ईंधन आपूर्ति सुनिश्चित करना चाहता है, ताकि भविष्य में स्थापित होने वाले डेटा सेंटरों और एआई लैब्स सहित ऊर्जा की अधिक खपत वाले क्षेत्रों को निर्बाध बिजली उपलब्ध कराई जा सके।
विदेश मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों के अनुसार, वैश्विक यूरेनियम आपूर्ति श्रृंखला में चीन की मजबूत पकड़ भारत के लिए चिंता का विषय है। चीन की सरकारी खनन कंपनियों की नामीबिया और नाइजर की प्रमुख यूरेनियम खदानों में बड़ी हिस्सेदारी है, जबकि कजाखस्तान के यूरेनियम का सबसे बड़ा खरीदार भी चीन ही है। ऐसे में भारत पहले से हुए समझौतों के आधार पर ऑस्ट्रेलिया से यूरेनियम आयात को और मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि ऑस्ट्रेलिया से नियमित यूरेनियम आपूर्ति मिलने के बाद भारत अपने घरेलू यूरेनियम संसाधनों का उपयोग अन्य रणनीतिक और परमाणु क्षमताओं को मजबूत करने में अधिक प्रभावी ढंग से कर सकेगा। भारत ने वर्ष 2047 तक देश की परमाणु ऊर्जा उत्पादन क्षमता को 100 गीगावॉट तक पहुंचाने का लक्ष्य निर्धारित किया है और इसके लिए ईंधन की स्थिर उपलब्धता बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
प्रधानमंत्री मोदी का यह दौरा हिंद महासागर क्षेत्र को मुक्त, सुरक्षित और नियम-आधारित बनाए रखने के क्वॉड समूह के साझा उद्देश्य को भी मजबूती देगा। भारत और ऑस्ट्रेलिया दोनों क्वॉड के प्रमुख सदस्य हैं और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में किसी भी विस्तारवादी नीति का संतुलित जवाब देने के पक्षधर रहे हैं। विदेश मंत्रालय के अधिकारियों का कहना है कि चीन के बढ़ते सैन्य विस्तार, आर्थिक दबाव और क्षेत्रीय बदलते हालात के बीच यह यात्रा विशेष रणनीतिक महत्व रखती है।
विशेषज्ञों के अनुसार इस दौरे का समय भी काफी महत्वपूर्ण है। हाल ही में जापान की प्रधानमंत्री सनाए ताकाइची की भारत यात्रा के दौरान भी सुरक्षा सहयोग बढ़ाने और चीन पर निर्भर आपूर्ति श्रृंखला को कम करने पर विशेष जोर दिया गया था। अब ऑस्ट्रेलिया के साथ संभावित समझौते भी उसी व्यापक रणनीतिक नीति का हिस्सा माने जा रहे हैं।
रक्षा और रणनीतिक सहयोग के अलावा प्रधानमंत्री मोदी और ऑस्ट्रेलियाई नेतृत्व के बीच व्यापार, निवेश और ऊर्जा सुरक्षा पर भी व्यापक चर्चा होगी। वर्ष 2022 में भारत-ऑस्ट्रेलिया आर्थिक सहयोग एवं व्यापार समझौता (ECTA) लागू होने के बाद दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार 54 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक पहुंच चुका है। अब दोनों देश व्यापक आर्थिक सहयोग समझौते (CECA) को अंतिम रूप देने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। इसके लागू होने पर वर्ष 2030 तक दोनों देशों के बीच व्यापार 100 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक पहुंचने की संभावना जताई जा रही है।
