ईरान पर दबाव बरकरार, खाड़ी में अमेरिकी सैन्य मौजूदगी कायम, कूटनीति और ताकत के बीच संतुलन बनाने की कोशिश में वॉशिंगटन
सेंट्रल डेस्क, नई दिल्ली
मिडिल ईस्ट एक बार फिर वैश्विक राजनीति का सबसे संवेदनशील केंद्र बन गया है। खाड़ी क्षेत्र में बढ़ते तनाव, ईरान के साथ टकराव और वैश्विक तेल आपूर्ति को लेकर बनी चिंता के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ऐसा कदम उठाया है, जिसने दुनिया भर की निगाहें वॉशिंगटन और तेहरान पर टिका दी हैं।
अमेरिका ने ‘प्रोजेक्ट फ्रीडम’ को फिलहाल अस्थायी रूप से रोकने का फैसला किया है। लेकिन इसके साथ ही यह भी साफ कर दिया गया है कि ईरान के खिलाफ जारी नौसैनिक नाकेबंदी में किसी तरह की ढील नहीं दी जाएगी। यही वजह है कि इस फैसले को केवल सैन्य रणनीति नहीं, बल्कि एक बड़े कूटनीतिक संकेत के रूप में देखा जा रहा है।
दरअसल, ‘प्रोजेक्ट फ्रीडम’ की घोषणा ट्रंप ने हाल ही में की थी। इस मिशन का मकसद होर्मुज जलडमरूमध्य में फंसे व्यावसायिक जहाजों को सुरक्षित रास्ता उपलब्ध कराना था। यह समुद्री मार्ग दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल आपूर्ति मार्गों में गिना जाता है। वैश्विक ऊर्जा व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। ऐसे में यहां किसी भी प्रकार का तनाव सीधे अंतरराष्ट्रीय बाजार, तेल कीमतों और वैश्विक अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकता है।
अमेरिकी सेना की यूएस सेंट्रल कमांड यानी CENTCOM ने इस ऑपरेशन को सक्रिय भी कर दिया था। मिशन के तहत गाइडेड मिसाइल डिस्ट्रॉयर, 100 से ज्यादा हवाई और समुद्री विमान, आधुनिक ड्रोन सिस्टम और करीब 15 हजार सैनिकों की तैनाती की गई थी। इसका उद्देश्य इस अहम समुद्री मार्ग पर जहाजों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करना था।
लेकिन अचानक इस अभियान पर अस्थायी रोक ने कई नए सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या अमेरिका वास्तव में तनाव कम करना चाहता है? क्या ईरान के साथ कोई बड़ा समझौता होने वाला है? या फिर यह सिर्फ रणनीतिक दबाव बनाने का एक नया तरीका है?
राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रूथ सोशल पर इस फैसले को लेकर विस्तृत बयान जारी किया। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान समेत कई देशों के अनुरोध और ईरान के खिलाफ अभियान में मिली “बड़ी सैन्य सफलता” के बाद अब स्थिति एक नए चरण में पहुंच गई है। ट्रंप के मुताबिक, ईरान के प्रतिनिधियों के साथ व्यापक और अंतिम समझौते की दिशा में काफी प्रगति हुई है।
उन्होंने यह भी कहा कि दोनों पक्षों ने आपसी सहमति से एक अस्थायी कदम उठाने का निर्णय लिया है। हालांकि ट्रंप ने स्पष्ट शब्दों में दोहराया कि ईरान पर लगाया गया ब्लॉकेड पूरी तरह लागू रहेगा। यानी अमेरिका बातचीत की संभावना खुली रखते हुए भी सैन्य दबाव कम करने के मूड में नहीं है।
इस पूरे घटनाक्रम में पाकिस्तान की भूमिका भी चर्चा में आ गई है। ट्रंप ने दावा किया कि पाकिस्तान समेत कई देशों ने अमेरिका से हस्तक्षेप करने और हालात को नियंत्रित करने की अपील की थी। माना जा रहा है कि पाकिस्तान इस समय अमेरिका और ईरान के बीच संभावित शांति समझौते में मध्यस्थ की भूमिका निभाने की कोशिश कर रहा है।
दूसरी ओर, ईरान की तरफ से अब तक कोई स्पष्ट आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। हालांकि तेहरान पहले भी अमेरिकी नौसैनिक गतिविधियों और खाड़ी क्षेत्र में बढ़ती सैन्य मौजूदगी का विरोध करता रहा है। यही कारण है कि क्षेत्र में तनाव पूरी तरह खत्म होता नहीं दिख रहा।
विशेषज्ञ मानते हैं कि अमेरिका इस समय दोहरी रणनीति पर काम कर रहा है। एक तरफ वह सैन्य ताकत दिखाकर ईरान पर दबाव बनाए रखना चाहता है, वहीं दूसरी ओर संभावित समझौते की जमीन भी तैयार कर रहा है। यही वजह है कि ‘प्रोजेक्ट फ्रीडम’ को पूरी तरह समाप्त नहीं किया गया, बल्कि केवल अस्थायी तौर पर रोका गया है।
अगर आने वाले दिनों में अमेरिका और ईरान के बीच कोई समझौता होता है, तो इसका असर केवल मिडिल ईस्ट तक सीमित नहीं रहेगा। इससे वैश्विक तेल बाजार, अंतरराष्ट्रीय व्यापार और विश्व राजनीति की दिशा भी बदल सकती है। लेकिन अगर बातचीत विफल होती है, तो खाड़ी क्षेत्र एक बार फिर बड़े सैन्य टकराव की ओर बढ़ सकता है।
फिलहाल दुनिया की नजरें होर्मुज जलडमरूमध्य और वॉशिंगटन-तेहरान संबंधों पर टिकी हुई हैं। क्योंकि यह केवल दो देशों का विवाद नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की आर्थिक और सामरिक स्थिरता से जुड़ा मामला बन चुका है।

