दिखा नीतीश कुमार इंपैक्ट, आने वाले विधानसभा चुनाव से पहले इस उपचुनाव ने बिहार की राजनीति का तापमान बढ़ा दिया

बिहार : आज की तारीख में भारतीय जनता पार्टी विश्व की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी है। देश ही नहीं, विदेशों में भी उसका व्यापक जनसमर्थन है। इसके बावजूद हाल में हुए तीन विधानसभा उपचुनावों में भाजपा को केवल गुजरात में जीत मिली, जबकि बिहार और मध्य प्रदेश में उसे हार का सामना करना पड़ा। इनमें भी बिहार की हार सबसे अधिक चुभने वाली मानी जा रही है, क्योंकि यह उसी राज्य में हुई है, जहां लगभग 100 दिन पहले पहली बार भाजपा के नेतृत्व में सरकार बनी है।

बिहार में सत्ता परिवर्तन हुए अभी चार महीने भी पूरे नहीं हुए हैं। जनता दल (यूनाइटेड) के नेतृत्व में करीब 20 वर्षों से चल रही सरकार का अंत हुआ। बिहार के लोकप्रिय मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पद छोड़ा और मुख्यमंत्री की जिम्मेदारी भाजपा के सम्राट चौधरी ने संभाली। सत्ता परिवर्तन के बाद यह पहला उपचुनाव था। इसे जनता के मूड को परखने का पहला अवसर माना जा रहा था। परिणाम ने संकेत दिया कि मतदाताओं का एक वर्ग इस बदलाव से संतुष्ट नहीं है।

बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव का परिणाम इसी असंतोष की ओर इशारा करता है। यहां भाजपा उम्मीदवार नीरज कुमार को जन सुराज के प्रशांत किशोर ने 18,983 मतों से पराजित किया। वहीं राष्ट्रीय जनता दल की उम्मीदवार रेखा गुप्ता का प्रदर्शन भी काफी कमजोर रहा। 2025 के विधानसभा चुनाव में उन्हें 41 हजार से अधिक वोट मिले थे, जबकि इस बार उनका आंकड़ा करीब 13 हजार पर सिमट गया। 31 राउंड की मतगणना में भाजपा एक भी राउंड में बढ़त नहीं बना सकी। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के बूथ पर भी पार्टी को हार मिली। लगभग 45 वर्षों से कायम भाजपा का यह मजबूत गढ़ ढह गया।

यह नाराजगी किसी एक जाति या वर्ग तक सीमित नहीं दिखी। इसका असर खास तौर पर युवाओं और महिलाओं के बीच अधिक दिखाई दिया। इसे कई राजनीतिक विश्लेषक पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के प्रभाव के रूप में भी देख रहे हैं।

पटना और आसपास के जिलों में 'जेन जी आंदोलन' के दौरान जो घटनाएं हुईं, उन्हें बिहार अब भी भूला नहीं है। आंदोलन के दौरान केवल लाठीचार्ज ही नहीं हुआ, बल्कि गोलीबारी की घटनाएं भी सामने आईं। छात्रों के प्रति सरकार के इस रवैये को समाज के एक बड़े वर्ग ने पसंद नहीं किया। आम चर्चा में यह बात भी सामने आई कि यदि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार होते, तो छात्रों के साथ ऐसा व्यवहार शायद नहीं होता। महिलाओं में भी इस मुद्दे को लेकर नाराजगी देखी गई।

महिलाओं की नाराजगी की एक दूसरी वजह भी बताई जा रही है। 2025 में भारी जनादेश मिलने के बावजूद महज तीन महीने बाद नीतीश कुमार का मुख्यमंत्री पद छोड़ना कई लोगों को असहज लगा। बिहार की बड़ी संख्या में महिलाओं का झुकाव लंबे समय से नीतीश कुमार की ओर रहा है। उनके पद छोड़ने को कई महिलाओं ने भावनात्मक रूप से लिया और यह भावना मतदान में भी दिखाई दी।

युवाओं में पिछले कुछ वर्षों से पेपर लीक और परीक्षाओं में अनियमितताओं को लेकर असंतोष जरूर रहा है। लेकिन सत्ता परिवर्तन के बाद कई युवाओं को यह महसूस हुआ कि अब उनकी समस्याओं को सुनने वाला नेतृत्व कमजोर पड़ गया है। यही कारण रहा कि युवाओं का एक वर्ग सरकार के खिलाफ दिखाई दिया।

मुख्यमंत्री रहते हुए नीतीश कुमार का प्रभाव कुर्मी समाज और कुछ अन्य पिछड़े वर्गों में भी मजबूत रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इन वर्गों के एक हिस्से की नाराजगी भी बांकीपुर में मतदान के दौरान सामने आई। भले ही बिहार में एनडीए की सरकार हो और जदयू उसकी प्रमुख सहयोगी हो, लेकिन जदयू के परंपरागत मतदाताओं का पूरा समर्थन इस बार एनडीए उम्मीदवार को मिलता नहीं दिखा।

मोकामा के विधायक अनंत सिंह ने भी इस मुद्दे पर खुलकर अपनी राय रखी। उनका कहना था कि जनादेश मिलने के बावजूद नीतीश कुमार के स्थान पर भाजपा का मुख्यमंत्री बनना बिहार की जनता को स्वीकार नहीं हुआ। उनका यह भी कहना था कि भले ही नीतीश कुमार ने स्वेच्छा से इस्तीफा दिया हो, लेकिन आम जनता का एक वर्ग इसे दबाव में लिया गया फैसला मानता है। राजनीतिक दृष्टि से उनकी इस टिप्पणी को पूरी तरह नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा।

सत्ता परिवर्तन के बाद शासन और प्रशासन में भी नीतीश कुमार की भूमिका सीमित होती दिखाई दी। हालांकि सरकार गठबंधन की है, लेकिन भाजपा अब उन मुद्दों पर तेजी से आगे बढ़ रही है, जिन पर नीतीश कुमार के कार्यकाल में सहमति नहीं बन पाई थी। इसे लेकर जदयू के भीतर भी असहजता की चर्चा होती रही है। खासकर राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा, केंद्रीय मंत्री ललन सिंह और उनके समर्थक नेताओं की भूमिका को लेकर पार्टी के भीतर अलग-अलग मत सामने आ रहे हैं।

नितिन नवीन लगातार पांच बार विधायक रहे हैं, जबकि उनके पिता नवीन किशोर सिन्हा भी दो बार इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। इसके बावजूद बांकीपुर में भाजपा की हार हुई। ऐसे में इस परिणाम में नीतीश कुमार के प्रभाव की चर्चा स्वाभाविक है। आने वाले समय में इसका असर भाजपा और जदयू, दोनों दलों की आंतरिक राजनीति पर भी दिखाई दे सकता है।

मध्य प्रदेश और गुजरात के चुनाव परिणामों की अपनी अलग राजनीतिक परिस्थितियां हो सकती हैं, लेकिन बिहार ने यह संकेत जरूर दिया है कि सत्ता परिवर्तन का राजनीतिक असर पड़ता है। मतदाता जनादेश का सम्मान चाहता है। वह चाहता है कि जिस नेतृत्व को उसने चुना है, उसे बीच कार्यकाल में बदलने की मजबूत और स्पष्ट वजह हो। वह संवाद और स्थिरता को महत्व देता है।

बांकीपुर का यह परिणाम केवल भाजपा के लिए ही नहीं, बल्कि जनता दल (यूनाइटेड) के लिए भी एक राजनीतिक संदेश माना जा सकता है। यदि जदयू अपने परंपरागत सामाजिक आधार को संतुष्ट नहीं रख पाती है, तो उसका एक हिस्सा तीसरे राजनीतिक विकल्प की ओर जा सकता है। वर्तमान परिस्थितियों में प्रशांत किशोर उस विकल्प के रूप में उभरते दिखाई दे रहे हैं।

करीब 100 दिन पुरानी सरकार और 45 साल पुराना राजनीतिक गढ़-दोनों पर इस उपचुनाव का असर साफ दिखाई दिया। यदि मतदाताओं को यह महसूस होता है कि उनके जनादेश की भावना बदली गई है, तो वे अगले चुनाव में और बड़ा राजनीतिक संदेश देने से भी पीछे नहीं हटते। बांकीपुर का परिणाम इसी संदेश के रूप में देखा जा रहा है।