मदरसों में वंदे मातरम् अनिवार्य करने के फैसले से राजनीतिक माहौल गर्माया, एक पक्ष इसे राष्ट्रीय एकता का प्रतीक बता रहा है तो दूसरा इसे वैचारिक दबाव मान रहा है

एनके मिश्रा, नई दिल्ली

पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा राज्य के सभी मदरसों में प्रार्थना सभा के दौरान ‘वंदे मातरम्’ गाना अनिवार्य किए जाने का फैसला केवल एक प्रशासनिक आदेश भर नहीं है। यह निर्णय उस गहरी वैचारिक बहस को फिर सामने ले आया है, जो पिछले कुछ वर्षों से भारतीय राजनीति और समाज के केंद्र में लगातार मौजूद रही है। सवाल यह नहीं है कि ‘वंदे मातरम्’ का सम्मान होना चाहिए या नहीं। सवाल यह है कि क्या राष्ट्रभक्ति को अनिवार्य बनाया जा सकता है और क्या किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था में सांस्कृतिक प्रतीकों को आदेश के जरिए लागू करना उचित माना जा सकता है।

‘वंदे मातरम्’ भारत के स्वतंत्रता आंदोलन का ऐतिहासिक गीत रहा है। इस गीत ने अंग्रेजी शासन के खिलाफ संघर्ष के दौरान लाखों भारतीयों के भीतर स्वतंत्रता की चेतना जगाई थी। इसमें कोई संदेह नहीं कि यह गीत भारतीय इतिहास और राष्ट्रीय भावना से गहराई से जुड़ा हुआ है। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि स्वतंत्र भारत में इस गीत को लेकर समय-समय पर वैचारिक और धार्मिक असहमति सामने आती रही है। खासकर मुस्लिम संगठनों का एक वर्ग यह तर्क देता रहा है कि उनकी धार्मिक मान्यताओं के अनुसार वे केवल एक ही शक्ति की इबादत करते हैं, इसलिए किसी अन्य स्वरूप की स्तुति उनके लिए स्वीकार्य नहीं हो सकती।

यहीं से यह मुद्दा संवेदनशील बन जाता है। लोकतंत्र केवल बहुमत की इच्छा का नाम नहीं है, बल्कि विविध विचारों और आस्थाओं के बीच संतुलन बनाए रखने की प्रणाली भी है। यदि कोई सरकार किसी सांस्कृतिक प्रतीक को अनिवार्य करती है, तो यह स्वाभाविक है कि समाज के कुछ वर्ग उसमें अपनी स्वतंत्रता और पहचान को लेकर असहजता महसूस करें। ऐसी परिस्थितियों में संवाद और सहमति का रास्ता अधिक प्रभावी माना जाता है, न कि प्रशासनिक कठोरता।

सरकार का पक्ष यह है कि इस निर्णय का उद्देश्य राष्ट्रभक्ति और राष्ट्रीय एकता की भावना को मजबूत करना है। यह तर्क अपने आप में गलत नहीं कहा जा सकता। किसी भी राष्ट्र की एकता उसके साझा प्रतीकों और सामूहिक चेतना से मजबूत होती है। लेकिन इतिहास यह भी बताता है कि देशभक्ति का भाव आदेशों से नहीं, बल्कि विश्वास और सहभागिता से पैदा होता है। जब राष्ट्रवाद राजनीतिक बहस का हथियार बन जाता है, तब उसका मूल भाव कमजोर होने लगता है।

इस पूरे विवाद का एक दूसरा पहलू भी है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। पिछले कुछ वर्षों में देश में धार्मिक पहचान, शिक्षण संस्थानों और सांस्कृतिक प्रतीकों को लेकर तनाव बढ़ा है। ऐसे में कोई भी निर्णय, जो सीधे किसी विशेष समुदाय से जुड़ा दिखाई देता हो, स्वाभाविक रूप से राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रिया पैदा करता है। यही कारण है कि इस फैसले के बाद विरोध के स्वर भी तेज हुए हैं और अदालत जाने की बात भी सामने आ रही है।

भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसकी विविधता रही है। यहां अनेक धर्म, भाषाएं, संस्कृतियां और परंपराएं सदियों से साथ-साथ विकसित हुई हैं। लोकतंत्र की सफलता इसी में है कि वह असहमति को भी सम्मान दे। यदि राष्ट्रभक्ति को प्रमाणित करने की होड़ शुरू हो जाए, तो समाज में अविश्वास और विभाजन की रेखाएं और गहरी हो सकती हैं।

आज आवश्यकता इस बात की है कि सरकारें राष्ट्रवाद को राजनीतिक ध्रुवीकरण का माध्यम बनाने के बजाय सामाजिक विश्वास का आधार बनाएं। देशभक्ति का अर्थ किसी समुदाय को कठघरे में खड़ा करना नहीं, बल्कि सभी नागरिकों को समान सम्मान और सुरक्षा का भरोसा देना है। भारत का संविधान भी यही सिखाता है कि एक मजबूत राष्ट्र वही होता है, जहां एकता दबाव से नहीं, बल्कि विश्वास और सहमति से पैदा होती है।