भाजपा, कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों के बीच आम मतदाता खुद को असहाय महसूस कर रहा है
नई दिल्ली : भारत के लोकतंत्र में आज सबसे बड़ा संकट सत्ता का नहीं है। सबसे बड़ा संकट विकल्प का है। पिछले 12 वर्षों से केंद्र में भारतीय जनता पार्टी की सरकार है। उससे पहले 10 वर्षों तक कांग्रेस सत्ता में रही। बीच-बीच में क्षेत्रीय दल भी आए और गए। लेकिन वर्ष 2026 में देश की सड़क, खेत, फैक्ट्री और विश्वविद्यालय में बैठा आम आदमी यदि आईना देखता है, तो उसे अपने चेहरे जैसा कोई राजनीतिक चेहरा दिखाई नहीं देता।
भाजपा को चुनौती देने के नाम पर कांग्रेस खड़ी है। लेकिन कांग्रेस पहले ही जनता का विश्वास खो चुकी है। लंबे शासनकाल में उसने पिछड़ों, दलितों और अल्पसंख्यकों को वोट बैंक की तरह इस्तेमाल किया। वादे किए, लेकिन मजबूत संस्थाएं नहीं बनाईं। भ्रष्टाचार के आरोपों से भी वह लगातार घिरी रही। आज कांग्रेस के पास न नया चेहरा है और न नई सोच। यही कारण है कि जनता उस पर दोबारा भरोसा नहीं कर पा रही है।
क्षेत्रीय दलों की स्थिति और भी चिंताजनक है। उत्तर से लेकर दक्षिण तक लगभग हर क्षेत्रीय दल ने सामाजिक न्याय के नाम पर सत्ता हासिल की, लेकिन सत्ता मिलते ही उनका उद्देश्य बदल गया। पार्टियां परिवारों की निजी कंपनियां बन गईं। बेटा, बेटी, दामाद, भतीजा—टिकट भी परिवार में, ठेका भी परिवार में और नीति भी परिवार के इर्द-गिर्द। जिस सामाजिक न्याय के नाम पर ये दल खड़े हुए थे, उसी सामाजिक न्याय को उन्होंने अपने घर की चारदीवारी में कैद कर दिया। जनता उन्हें भी परख चुकी है।
वाम दल एक समय देश के सामने मजबूत विकल्प थे। उनके पास विचार था, अनुशासन था और आंदोलन की ताकत थी। लेकिन वैश्विक बदलाव और देश के भीतर बदलते सामाजिक समीकरणों के कारण आज वे उस स्थिति में नहीं हैं कि भाजपा को राष्ट्रीय स्तर पर चुनौती दे सकें। उनका प्रभाव कुछ राज्यों तक सीमित होकर रह गया है।
यही कारण है कि आज देश के सामने एक विचित्र स्थिति है। सत्ता में भाजपा है, विपक्ष में कांग्रेस और क्षेत्रीय दल हैं, लेकिन जनता को लगता है कि चुनाव में चाहे जिसे जिता दिया जाए, महंगाई, भ्रष्टाचार और बेरोजगारी जैसे मूल प्रश्न वहीं के वहीं बने रहेंगे।
इसी वजह से देश की बड़ी आबादी के भीतर एक नई मांग जन्म ले रही है। यह मांग किसी पार्टी के नाम की नहीं, बल्कि एक नए राजनीतिक चरित्र की है। देश को अब ऐसे राजनीतिक दल की जरूरत महसूस हो रही है, जो मौजूदा दलों से पूरी तरह अलग हो। जिसका चेहरा नया हो, भाषा नई हो और सोच पुरानी राजनीति से अलग हो।
ऐसे दल की पहली शर्त होगी संवेदनशीलता। महंगाई पर भाषण नहीं, हिसाब चाहिए। बेरोजगारी पर इवेंट नहीं, भर्ती कैलेंडर चाहिए। भ्रष्टाचार पर नारा नहीं, पारदर्शिता चाहिए। आज सरकार कहती है कि सब ठीक है, लेकिन आंकड़े बेरोजगारी और महंगाई को लेकर गंभीर तस्वीर पेश करते हैं। भ्रष्टाचार नीचे से ऊपर तक इस कदर फैल चुका है कि बिना रिश्वत के कोई काम होना कठिन लगता है। देश की अधिकांश जनता न तो भ्रष्ट है और न ही भ्रष्टाचार की समर्थक, लेकिन व्यवस्था ने उसे मजबूर कर दिया है। एक नए राजनीतिक दल को इसी मजबूरी को तोड़ना होगा।
दूसरी शर्त होगी आंतरिक लोकतंत्र। आज लगभग सभी बड़ी पार्टियां एक परिवार या एक व्यक्ति के इर्द-गिर्द घूमती हैं। फैसले ऊपर से होते हैं और कार्यकर्ता केवल झंडा उठाने तक सीमित रह जाता है। जनता ऐसे दल की अपेक्षा करती है, जहां जिला अध्यक्ष का चुनाव भी कार्यकर्ता करे, टिकट आंतरिक बहस और लोकतांत्रिक प्रक्रिया से तय हो तथा आलोचना को गद्दारी न माना जाए। परिवारवाद से मुक्त दल ही लोकतंत्र को मजबूत कर सकता है।
तीसरी और सबसे महत्वपूर्ण शर्त है—संस्थाओं और संविधान के प्रति निष्ठा। चुनाव आयोग, न्यायपालिका, मीडिया और विश्वविद्यालय लोकतंत्र के प्रमुख स्तंभ हैं। पिछले कुछ वर्षों में इन सभी संस्थाओं को लेकर लगातार सवाल उठे हैं। साथ ही धर्म आधारित राजनीति के जरिए सत्ता की लड़ाई को तेज किया गया है। आरोप यह भी लगते रहे हैं कि मूल समस्याओं से ध्यान हटाकर जनता को धार्मिक और सांप्रदायिक मुद्दों में उलझाया जाता है।
हालांकि एक सकारात्मक पक्ष भी सामने आया है। देश का युवा वर्ग अब इन सवालों को अधिक गंभीरता से समझ रहा है। वर्ष 2026 में जंतर-मंतर पर उतरे युवाओं ने स्पष्ट कहा कि उन्हें हिंदू-मुसलमान की राजनीति नहीं, बल्कि रोजगार चाहिए। युवा अब पूछ रहा है कि मंदिर बन गया, मस्जिद का मुद्दा भी चल रहा है, लेकिन उसके भविष्य का क्या होगा।
आज अधिकांश राजनीतिक दलों का लक्ष्य सत्ता प्राप्त करना और सत्ता में बने रहना भर रह गया है। सत्ता पाने के लिए वादे किए जाते हैं, सत्ता में बने रहने के लिए प्रचार और सत्ता बचाने के लिए भय का वातावरण बनाया जाता है। जनता यह सब देख रही है। उसे समझ में आने लगा है कि मौजूदा अधिकांश दल सत्ता सुख के उसी चक्र में फंसे हुए हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि कोई भगवा चोला पहनता है, कोई धर्मनिरपेक्षता का और कोई सामाजिक न्याय का।
इसीलिए विकल्प की मांग लगातार तेज होती जा रही है। जनता ऐसा राजनीतिक दल चाहती है, जो सत्ता के लिए नहीं, व्यवस्था परिवर्तन के लिए राजनीति करे। ऐसा दल जो सत्ता में आने पर सबसे पहले सरकारी भर्तियों का पांच वर्ष का कैलेंडर जारी करे, पेपर लीक के खिलाफ कठोर कानून बनाए, भ्रष्टाचार रोकने के लिए लोकपाल को वास्तविक अधिकार दे, चुनावी चंदे में पूर्ण पारदर्शिता लाए तथा महंगाई पर नियंत्रण के लिए आवश्यक वस्तुओं की निगरानी और एमएसएमई क्षेत्र को मजबूत करने की ठोस नीति अपनाए।
ये कोई क्रांति की बातें नहीं हैं। ये आम आदमी की रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़े मुद्दे हैं। लेकिन मौजूदा राजनीतिक दल इन्हें अपना केंद्रीय एजेंडा बनाने से बचते दिखाई देते हैं, क्योंकि ऐसा करते ही कॉरपोरेट, माफिया और सत्ता से जुड़े कई हित प्रभावित हो सकते हैं।
देश की बड़ी आबादी आज इसी दुविधा में है। वह भाजपा से नाराज है, लेकिन कांग्रेस पर भरोसा नहीं कर पा रही। क्षेत्रीय दलों से उम्मीदें टूट चुकी हैं और वाम दलों के पास व्यापक राजनीतिक ताकत नहीं बची है। इसलिए जनता चुप है। लेकिन चुप्पी का अर्थ सहमति नहीं होता, बल्कि विकल्प का अभाव होता है।
भारत के राजनीतिक भविष्य को लेकर जो चिंता आज घर-घर में दिखाई देती है, उसकी जड़ भी यही है। लोगों को डर है कि यदि यही स्थिति बनी रही, तो संविधान केवल कागज का दस्तावेज बनकर रह जाएगा, लोकतंत्र केवल चुनावी उत्सव तक सीमित हो जाएगा और देश की सबसे बड़ी शक्ति—युवा—या तो पलायन करेगा या निराशा में डूब जाएगा।
इतिहास गवाह है कि जब-जब इस देश में नया विकल्प उभरा है, तब-तब सत्ता को झुकना पड़ा है। वर्ष 1977 में जयप्रकाश नारायण के आंदोलन ने विकल्प दिया तो इंदिरा गांधी की सरकार को हार का सामना करना पड़ा। वर्ष 2011 में अन्ना आंदोलन ने विकल्प दिया तो भ्रष्टाचार राष्ट्रीय मुद्दा बन गया। वर्ष 2026 में जंतर-मंतर का आंदोलन खड़ा हुआ तो सरकार को नीट के मुद्दे पर झुकना पड़ा।
अब आवश्यकता इस बात की है कि सड़क पर उठ रही आवाज को राजनीतिक स्वरूप मिले। ऐसा दल सामने आए, जो न कांग्रेस हो, न भाजपा और न ही किसी परिवार की निजी जागीर। जो यह कहे कि वह सत्ता मांगने नहीं, बल्कि जवाबदेही सुनिश्चित करने आया है।
ऐसा दल बनेगा या नहीं, कब बनेगा और कौन बनाएगा—इन सवालों का जवाब भविष्य के गर्भ में है। लेकिन इतना निश्चित है कि जब तक देश को एक विश्वसनीय विकल्प नहीं मिलेगा, तब तक जनता दो बुराइयों में से कम बुरी को चुनने के लिए मजबूर रहेगी।
और लोकतंत्र में यदि जनता मजबूरी में मतदान करे, तो इससे बड़ी लोकतांत्रिक विफलता कोई नहीं हो सकती।
इसलिए आज देश को केवल सत्ता नहीं, व्यवस्था चाहिए। चेहरे नहीं, चरित्र चाहिए। नारे नहीं, नीति चाहिए।
जब तक यह परिवर्तन नहीं होगा, तब तक 140 करोड़ की आबादी वाला यह देश एक बेहतर विकल्प की तलाश में भटकता रहेगा।