17 जून की मुठभेड़ के बाद उठे सवालों ने बढ़ाया सियासी दबाव, विपक्ष के साथ सत्ता पक्ष के भीतर से भी उठी निष्पक्ष जांच की मांग

बिहार। भोजपुर जिले के शाहपुर थाना क्षेत्र के बिलौटी गांव में 17 जून को हुई चर्चित पुलिस मुठभेड़ अब न्यायिक जांच के घेरे में आ गई है। लगातार उठ रहे सवालों, राजनीतिक विवाद, सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो और घटना को लेकर बढ़ती जनचर्चा के बीच राज्य सरकार ने पूरे मामले की न्यायिक जांच कराने का फैसला लिया है। सरकार के इस निर्णय के बाद अब मुठभेड़ से जुड़े सभी तथ्यों और परिस्थितियों की पड़ताल हाईकोर्ट के एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश की निगरानी में की जाएगी।

मामला 17 जून को उस समय सुर्खियों में आया जब शाहपुर थाना क्षेत्र के बिलौटी गांव में पुलिस और भरत भूषण तिवारी के बीच मुठभेड़ की घटना सामने आई। पुलिस ने शुरुआती तौर पर इसे आत्मरक्षा में की गई कार्रवाई बताया था। हालांकि घटना के महज 24 घंटे के भीतर ही इस मुठभेड़ को लेकर सवाल उठने लगे। सोशल मीडिया पर कुछ वीडियो और तस्वीरें वायरल हुईं, जिनके आधार पर कई लोगों ने पुलिस के आधिकारिक दावों पर सवाल खड़े किए। इसके बाद मामला तेजी से राजनीतिक और सामाजिक बहस का विषय बन गया।

घटना को लेकर विरोध केवल विपक्षी दलों तक सीमित नहीं रहा। विभिन्न सामाजिक संगठनों के साथ-साथ सत्ता पक्ष से जुड़े कुछ नेताओं और मंत्रियों की ओर से भी पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग उठने लगी। बढ़ते जनदबाव और लगातार गहराते विवाद के बीच सरकार ने मामले को न्यायिक जांच के लिए सौंपने का निर्णय लिया। राजनीतिक हलकों में इसे विवाद पर विराम लगाने और सच्चाई सामने लाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

सरकारी सूत्रों के अनुसार न्यायिक जांच के दौरान मुठभेड़ में शामिल पुलिस अधिकारियों की भूमिका, घटनास्थल की परिस्थितियां, पुलिस द्वारा की गई कार्रवाई तथा उपलब्ध साक्ष्यों का नए सिरे से परीक्षण किया जाएगा। जांच आयोग यह भी देखेगा कि घटना के दौरान क्या परिस्थितियां थीं और पुलिस की कार्रवाई उपलब्ध तथ्यों तथा नियमों के अनुरूप थी या नहीं।

जांच टीम प्रत्यक्षदर्शियों, ग्रामीणों और पुलिसकर्मियों के बयान दर्ज करेगी। इसके साथ ही कॉल डिटेल रिकॉर्ड (सीडीआर), मेडिकल रिपोर्ट, पोस्टमार्टम रिपोर्ट तथा अन्य दस्तावेजी साक्ष्यों की भी गहन समीक्षा की जाएगी। जांच के दायरे में सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो और तस्वीरें भी शामिल होंगी। इनकी फॉरेंसिक जांच कर यह पता लगाया जाएगा कि उनमें दिख रही सामग्री कितनी प्रमाणिक है और उसका घटनाक्रम से क्या संबंध है।

बैलिस्टिक विशेषज्ञों की मदद से यह भी जांच की जाएगी कि गोलियां किस दिशा से चलीं, कितनी दूरी से चलीं और घटनास्थल से मिले वैज्ञानिक साक्ष्य क्या संकेत देते हैं। इसके अलावा ग्रामीणों और प्रत्यक्षदर्शियों के बयान ऐसे माहौल में दर्ज किए जाएंगे, जहां वे बिना किसी दबाव या भय के अपनी बात खुलकर रख सकें। जांच एजेंसी का प्रयास होगा कि सभी पक्षों को अपनी बात रखने का पूरा अवसर मिले और निष्कर्ष केवल तथ्यों तथा साक्ष्यों के आधार पर निकाला जाए।

सरकारी अधिकारियों का कहना है कि जांच का उद्देश्य किसी को बचाना या फंसाना नहीं, बल्कि तथ्यों के आधार पर सच्चाई सामने लाना है। सूत्रों के मुताबिक जांच का मूल सिद्धांत यही रहेगा कि कोई दोषी बचने न पाए और कोई बेकसूर फंसने न पाए। यदि जांच में किसी स्तर पर लापरवाही, नियमों के उल्लंघन, अधिकारों के दुरुपयोग या किसी अन्य प्रकार की अनियमितता के प्रमाण मिलते हैं तो संबंधित अधिकारियों और कर्मियों के खिलाफ सख्त प्रशासनिक एवं कानूनी कार्रवाई की जा सकती है। गंभीर अनियमितता साबित होने की स्थिति में नौकरी जाने से लेकर आपराधिक कार्रवाई तक की नौबत आ सकती है। वहीं यदि पुलिस की कार्रवाई को सही पाया जाता है तो उससे जुड़े विवादों और आरोपों पर भी विराम लग सकता है।

सूत्र बताते हैं कि अगले 48 घंटों के भीतर जांच की जिम्मेदारी संभालने वाले सेवानिवृत्त न्यायाधीश के नाम की औपचारिक घोषणा की जा सकती है। साथ ही आयोग को रिपोर्ट सौंपने के लिए एक निर्धारित समय-सीमा भी तय किए जाने की संभावना है। माना जा रहा है कि जांच के दायरे में घटना से जुड़े सभी महत्वपूर्ण पहलुओं को शामिल किया जाएगा।

भोजपुर का यह मामला अब केवल एक पुलिस मुठभेड़ का विषय नहीं रह गया है। यह कानून-व्यवस्था, पुलिस की जवाबदेही और राज्य सरकार की साख से जुड़ा मुद्दा बन चुका है। ऐसे में पूरे राज्य की निगाहें अब न्यायिक जांच पर टिकी हैं। सबकी उत्सुकता इस बात को लेकर है कि जांच में कौन-कौन से तथ्य सामने आते हैं, किन अधिकारियों या पक्षों की भूमिका पर सवाल उठते हैं और 17 जून को बिलौटी में वास्तव में क्या हुआ था? न्यायिक जांच की रिपोर्ट से ही इस बहुचर्चित मामले की तस्वीर पूरी तरह साफ हो सकेगी।