मोतिहारी की घटना ने खोली व्यवस्था की पोल, कानून सख्त फिर भी जहर बिक रहा खुलेआम 

नीरज कुमार

बिहार में शराबबंदी को अक्सर एक बड़ी सामाजिक उपलब्धि के तौर पर पेश किया जाता है, लेकिन मोतिहारी में जहरीली शराब से हुई चार मौतों ने इस दावे की जमीनी सच्चाई को बेनकाब कर दिया है। सवाल सीधा है और असहज भी कि जब शराब पर पूरी तरह प्रतिबंध है, तो आखिर यह जहर लोगों तक पहुंच कैसे रहा है और क्यों हर कुछ समय पर निर्दोष लोग इसकी कीमत अपनी जान देकर चुका रहे हैं।

पूर्वी चंपारण की यह घटना किसी एक दिन की चूक नहीं, बल्कि उस तंत्र की विफलता का परिणाम है, जो कागजों पर तो सख्त दिखता है, लेकिन जमीन पर पूरी तरह कमजोर साबित हो रहा है। एक के बाद एक लोगों की तबीयत बिगड़ना, आंखों की रोशनी पर असर पड़ना और अंततः मौतें होना यह बताता है कि अवैध शराब का नेटवर्क न सिर्फ मौजूद है, बल्कि बेखौफ होकर काम कर रहा है।

सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि क्या शराबबंदी सिर्फ कानून की किताबों तक सीमित रह गई है। अगर प्रतिबंध के बावजूद शराब बिक रही है, तो इसका मतलब है कि कहीं न कहीं सिस्टम में गंभीर खामियां हैं। यह मान लेना भी कठिन है कि इतने बड़े स्तर पर चल रहे इस अवैध कारोबार की जानकारी स्थानीय प्रशासन को नहीं होगी। ऐसे में जिम्मेदारी तय करना और जवाबदेही सुनिश्चित करना अब टाला नहीं जा सकता।

2023 में इसी जिले में जहरीली शराब से 42 लोगों की मौत हुई थी। उस दर्दनाक हादसे के बाद सख्ती के दावे किए गए, कार्रवाई की बात कही गई, लेकिन आज की घटना यह बताती है कि वे कदम या तो अधूरे थे या प्रभावी नहीं रहे। अगर इतने बड़े हादसे के बाद भी हालात नहीं बदले, तो यह केवल लापरवाही नहीं, बल्कि नीति और क्रियान्वयन दोनों की विफलता है।

शराबबंदी का उद्देश्य समाज को नशामुक्त करना था, लेकिन वास्तविकता यह है कि नशा खत्म नहीं हुआ, बल्कि उसका रूप और खतरनाक हो गया है। अब लोग छिपकर शराब पीते हैं और उन्हें मिलती है जहरीली शराब, जो सीधे मौत का कारण बनती है। यानी प्रतिबंध ने समस्या को खत्म करने के बजाय उसे और गहरा कर दिया है।

अब वक्त आ गया है कि सरकार इस नीति की जमीनी समीक्षा करे। क्या मौजूदा व्यवस्था प्रभावी है या इसे नए तरीके से लागू करने की जरूरत है। केवल छापेमारी और गिरफ्तारी से समस्या का समाधान नहीं होगा, जब तक कि उस पूरे नेटवर्क को नहीं तोड़ा जाए, जो गांव-गांव तक इस जहर को पहुंचा रहा है।

इसके साथ ही स्थानीय प्रशासन की जवाबदेही तय करना जरूरी है। हर घटना के बाद निचले स्तर के कर्मचारियों पर कार्रवाई कर देना आसान रास्ता है, लेकिन असली सवाल यह है कि क्या सिस्टम के भीतर बैठे जिम्मेदार लोगों तक कार्रवाई पहुंचेगी। जब तक जवाबदेही ऊपर तक तय नहीं होगी, तब तक ऐसी घटनाएं रुकने वाली नहीं हैं।

मोतिहारी की यह घटना एक चेतावनी है कि कानून बनाना काफी नहीं होता, उसे जमीन पर उतारना भी उतना ही जरूरी है। अगर शराबबंदी के बावजूद लोग मर रहे हैं, तो यह केवल कानून की नहीं, बल्कि पूरे शासन तंत्र की असफलता है। अब निर्णय का समय है कि सरकार इस सच्चाई का सामना करे या फिर अगली त्रासदी का इंतजार।