भारतीय विदेश सेवा के 2025 बैच के प्रशिक्षु अधिकारियों और भूटान के दो राजनयिकों ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु से की मुलाकात
नई दिल्ली : दुनिया में भारत की बढ़ती आर्थिक और रणनीतिक भूमिका के बीच राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने युवा राजनयिकों को राष्ट्रहित सर्वोपरि रखने का संदेश दिया है। उन्होंने कहा कि भारत की वैश्विक सहभागिता हमेशा देशवासियों की आकांक्षाओं के अनुरूप होनी चाहिए। भारतीय विदेश सेवा के अधिकारी विदेशों में केवल सरकार के प्रतिनिधि नहीं होते, बल्कि वे 140 करोड़ भारतीयों और उनकी आशाओं एवं आकांक्षाओं का भी प्रतिनिधित्व करते हैं।
भारतीय विदेश सेवा के 2025 बैच के प्रशिक्षु अधिकारियों और भूटान के दो राजनयिकों ने गुरुवार को राष्ट्रपति भवन में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु से मुलाकात की। ये सभी वर्तमान में सुषमा स्वराज विदेश सेवा संस्थान में प्रवेश प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं।
प्रशिक्षु अधिकारियों को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति ने उन्हें बधाई दी और कहा कि उन्हें विदेशों में भारत का प्रतिनिधित्व करने, राष्ट्रहित के लिए काम करने तथा दुनिया के विभिन्न देशों के साथ भारत के संबंधों को मजबूत करने का गौरव और बड़ी जिम्मेदारी मिलने जा रही है।
राष्ट्रपति ने कहा कि भारत की आर्थिक प्रगति से दुनिया के साथ जुड़ाव के नए अवसर पैदा हो रहे हैं। युवा राजनयिकों को निवेश, प्रौद्योगिकी, विनिर्माण, नवीकरणीय ऊर्जा और नवाचार जैसे क्षेत्रों में उभरती संभावनाओं पर नजर रखनी चाहिए। ऐसी भागीदारियां विकसित करने की जरूरत है, जिनसे भारत के राष्ट्रीय हित पूरे हों। उन्होंने कहा कि कूटनीति का भारत की समृद्धि में प्रत्यक्ष योगदान दिखाई देना चाहिए।
उन्होंने कहा कि वर्ष 2047 तक विकसित भारत बनाने के लक्ष्य की दिशा में देश जैसे-जैसे आगे बढ़ रहा है, कूटनीति की भूमिका भी बढ़ती जा रही है। ऐसे में भारत की वैश्विक सहभागिता का आधार देशवासियों की आकांक्षाएं और राष्ट्रहित होना चाहिए। उन्होंने इसे भारतीय विदेश सेवा के अधिकारियों के पेशेवर जीवन का स्थायी सिद्धांत बनाए रखने की सलाह दी।
राष्ट्रपति ने युवा राजनयिकों से कहा कि विदेशों में उनका संपर्क केवल सरकारी कार्यालयों और आधिकारिक बैठकों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। उन्हें विश्वविद्यालयों, कारोबारी जगत, शोधकर्ताओं, नवप्रवर्तकों, सांस्कृतिक संस्थानों, सिविल सोसायटी और स्थानीय समुदायों के साथ भी संपर्क बढ़ाना चाहिए। उन्होंने प्रवासी भारतीयों से सार्थक जुड़ाव पर विशेष जोर दिया। खासकर प्रवासी समुदाय के युवाओं को भारत से जोड़े रखने और उन्हें देश की विकास यात्रा में योगदान देने के अवसर उपलब्ध कराने की दिशा में प्रयास करने को कहा।
राष्ट्रपति ने बदलती कूटनीति में प्रौद्योगिकी की भूमिका का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि तकनीक ने देशों के बीच संवाद, कारोबार के संचालन और नागरिकों तक सार्वजनिक सेवाएं पहुंचाने के तरीकों को तेजी से बदला है। विदेशों में स्थित भारतीय मिशनों को भी इस बदलाव के साथ आगे बढ़ना होगा। प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल केवल संवाद के माध्यम के रूप में नहीं, बल्कि सुशासन और व्यापक भागीदारी के लिए भी होना चाहिए।
हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि तकनीक कभी मानवीय संवेदनशीलता की जगह नहीं ले सकती। विदेशों में जरूरत के समय भारतीय नागरिकों के लिए भारतीय मिशनों के दरवाजे हमेशा सुलभ और उपलब्ध रहने चाहिए। राष्ट्रपति ने हाल के वर्षों में भारत की ओर से बड़े स्तर पर चलाए गए बचाव और मानवीय सहायता अभियानों की परंपरा को आगे बढ़ाने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि सहायता की जरूरत वाले प्रत्येक भारतीय को यह भरोसा होना चाहिए कि उसका मिशन सहज-सुलभ, संवेदनशील और विश्वसनीय है।
राष्ट्रपति ने भारत की सभ्यतागत विरासत का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय विदेश सेवा के अधिकारी हजारों वर्ष पुराने सभ्यतागत इतिहास वाले देश के साथ एक युवा, गतिशील और आकांक्षी भारत का भी प्रतिनिधित्व करते हैं। शांति, बहुलतावाद, संवाद, सह-अस्तित्व और विविधता के प्रति सम्मान भारत के ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के सभ्यतागत लोकाचार में गहराई से समाहित हैं।
उन्होंने कहा कि लगातार अनिश्चित और जटिल होती दुनिया में राजनयिकों को सजग और जिज्ञासु रहने के साथ निरंतर सीखने के लिए तैयार रहना चाहिए। सबसे बढ़कर उनमें विनम्रता बनी रहनी चाहिए। विदेश यात्रा के दौरान उन्हें हमेशा याद रखना चाहिए कि वे केवल भारत सरकार नहीं, बल्कि 140 करोड़ भारतीयों की उम्मीदों और आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। राष्ट्रपति ने प्रशिक्षु अधिकारियों को ईमानदारी, सत्यनिष्ठा और पेशेवर आचरण के उच्चतम मानदंड बनाए रखने की भी सलाह दी।

