साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए 20 दिसंबर को कोलकाता में होंगे सम्मानित, रचनाकार भारत फाउंडेशन के राष्ट्रीय अधिवेशन में दिया जाएगा प्रतिष्ठित सम्मान

पश्चिम बंगाल। पश्चिम बंगाल की प्रमुख साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्था रचनाकार भारत फाउंडेशन के राष्ट्रीय अधिवेशन में चर्चित कवि-गीतकार डॉ. संजय पंकज को साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में निरंतर श्रेष्ठ लेखन तथा उत्कृष्ट योगदान के लिए ‘रचनाकार साहित्यश्री सम्मान’ से सम्मानित किया जाएगा। यह सम्मान उन्हें 20 दिसंबर 2026 को कोलकाता में प्रदान किया जाएगा। फाउंडेशन के संस्थापक सभापति एवं सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुरेश चौधरी ने स्वीकृति-निवेदन पत्र के माध्यम से इसकी जानकारी दी है।

डॉ. संजय पंकज छंदसिद्ध कवि एवं गीतकार हैं। उन्होंने विभिन्न छंदों में अपनी काव्य प्रतिभा और रचनात्मक कौशल का परिचय देते हुए सौंदर्यपूर्ण रचनाएं की हैं। स्वतंत्र पत्रकारिता और गद्य लेखन में भी उन्होंने विशिष्ट पहचान बनाई है। उनके चर्चित गीत संग्रहों में ‘मंजर-मंजर आग लगी है’, ‘यहां तो सब बंजारे’, ‘शब्दों के फूल खिले’ और ‘बजे शून्य में अनहद बाजा’ शामिल हैं। इन कृतियों ने साहित्य जगत में विशेष पहचान बनाई है।

उनकी कृति ‘मां है शब्दातीत, शब्द नहीं मां चेतना’ दोहा छंद में रचित एक महत्वपूर्ण साहित्यिक रचना है। प्रसिद्ध रामकथा वाचक मोरारी बापू और रमेश भाई ओझा जैसे संत एवं विद्वान अपने प्रवचनों में इस कृति को उद्धृत करते रहे हैं।

डॉ. संजय पंकज की प्रमुख गद्य कृतियों में ‘समय बोलता है’, ‘मौसम लेता अंगड़ाई’ और ‘बिहार केसरी श्रीकृष्ण सिंह’ शामिल हैं। उनके संपादन में प्रकाशित महत्वपूर्ण पुस्तकों में जानकीवल्लभ शास्त्री संचयिता के पांच भाग ‘मेरे पथ में न विराम रहा’, ‘वह तान कहां से आई’, ‘समुद्र की गहरी हरी आत्मा’, ‘मेरा रास्ता आसान नहीं’ और ‘बरगद के साए में’ उल्लेखनीय हैं। इसके अतिरिक्त ‘कल्पतरु’ और ‘अविराम’ जैसी कृतियां भी उनके संपादकीय योगदान में शामिल हैं।

विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के संपादन से जुड़े डॉ. संजय पंकज दूरदर्शन, आकाशवाणी और साहित्यिक मंचों पर प्रभावशाली कवि-गीतकार एवं वक्ता के रूप में भी अपनी पहचान बना चुके हैं। ‘रचनाकार साहित्यश्री सम्मान’ गीतों के प्रति निष्ठा और साहित्यिक सृजन के लिए समर्पित कवि-गीतकारों एवं साहित्यकारों को प्रदान किया जाता है।

साहित्य के साथ अभिनय के क्षेत्र में भी डॉ. संजय पंकज सक्रिय रहे हैं। उन्होंने रंगमंच के अतिरिक्त वृत्तचित्र ‘खड़ी बोली का चाणक्य’, टीवी धारावाहिक ‘सांझ के हमसफर’ और हिंदी फिल्म ‘भूमि’ में अभिनय कर अपनी बहुमुखी प्रतिभा का परिचय दिया है।

वर्तमान में वे निराला निकेतन की पत्रिका ‘बेला’, ‘कला अभिप्राय’ और ‘ऑनेस्ट रिपोर्टर’ के संपादन से जुड़े हुए हैं। साहित्य, संस्कृति और कला के क्षेत्र में निरंतर सक्रिय डॉ. संजय पंकज को अब तक अनेक प्रांतीय एवं राष्ट्रीय पुरस्कारों तथा सम्मानों से अलंकृत किया जा चुका है। आध्यात्मिक चेतना और सामाजिक सरोकारों से जुड़ा उनका रचनात्मक व्यक्तित्व साहित्य जगत में विशेष स्थान रखता है।