लोकसभा में डॉ. जितेंद्र सिंह ने बताया 70 से 90 प्रतिशत संभावना, लेकिन मानसून पर असर कई जलवायु कारकों पर करेगा निर्भर
नई दिल्ली : देश में मानसून को लेकर उठ रहे सवालों के बीच केंद्र सरकार ने अल नीनो की स्थिति पर आज बड़ा अपडेट दिया है। सरकार के अनुसार मई 2026 में विकसित हुई अल नीनो की स्थिति फरवरी 2027 तक बनी रह सकती है। हालांकि सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि केवल अल नीनो के आधार पर मानसून का आकलन नहीं किया जा सकता, क्योंकि भारतीय मानसून कई वैश्विक और क्षेत्रीय जलवायु प्रणालियों के संयुक्त प्रभाव से संचालित होता है। सरकार लगातार अत्याधुनिक तकनीकों और स्वदेशी कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित पूर्वानुमान प्रणाली की मदद से स्थिति पर नजर बनाए हुए है।
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी तथा पृथ्वी विज्ञान राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. जितेंद्र सिंह ने लोकसभा में एक प्रश्न के लिखित उत्तर में बताया कि भारतीय राष्ट्रीय महासागर सूचना सेवा केंद्र (आईएनसीओआईएस) के नवीनतम आकलन के अनुसार जून 2026 से फरवरी 2027 तक अल नीनो के बने रहने की संभावना 70 से 90 प्रतिशत के बीच है। यह आकलन भारत में विकसित कृत्रिम बुद्धिमत्ता और मशीन लर्निंग आधारित ईएनएसओ पूर्वानुमान प्रणाली तथा वैश्विक महासागरीय आंकड़ों के विश्लेषण पर आधारित है।
उन्होंने कहा कि अल नीनो का इतिहास कई बार भारत के कुछ हिस्सों में सामान्य से कम वर्षा से जुड़ा रहा है, लेकिन मानसून का व्यवहार केवल इसी एक कारक से तय नहीं होता। हिंद महासागर द्विध्रुव, मैडेन-जूलियन दोलन, महासागर और वायुमंडल के बीच होने वाली परस्पर क्रियाएं तथा पवन प्रणालियों में होने वाले बदलाव भी मानसून की दिशा और तीव्रता को प्रभावित करते हैं। इसलिए अंतिम प्रभाव का आकलन मौसम के दौरान विकसित होने वाली परिस्थितियों के आधार पर ही किया जा सकता है।
डॉ. जितेंद्र सिंह ने बताया कि अल नीनो का असर अरब सागर और बंगाल की खाड़ी के ऊपर वायुमंडलीय परिसंचरण को प्रभावित कर सकता है। इससे समुद्र की सतह के तापमान में वृद्धि, समुद्री लू जैसी परिस्थितियां, समुद्री जैव विविधता में बदलाव और मछलियों के वितरण पर असर पड़ने की आशंका रहती है। इसके अलावा लहरों, ज्वार-भाटे और समुद्री धाराओं में परिवर्तन होने से नौवहन, अपतटीय गतिविधियों और तटीय क्षेत्रों के सामान्य संचालन पर भी प्रभाव पड़ सकता है।
उन्होंने कहा कि इन संभावित चुनौतियों को देखते हुए सरकार ने महासागरीय स्थिति पूर्वानुमान और समुद्री बहु-खतरा प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली को और अधिक मजबूत बनाया है। आईएनसीओआईएस अब उच्च-विभेदन पूर्वानुमान मॉडल, महासागरीय ग्लाइडर, लंगरयुक्त बुआ, आर्गो फ्लोट, ज्वार गेज, उपग्रह प्रेक्षण और उन्नत डेटा एसिमिलेशन प्रणाली की मदद से चौबीसों घंटे निगरानी कर रहा है। तटीय राज्यों को लहरों, हवाओं, समुद्री धाराओं, ज्वार-भाटे और समुद्र की सतह के तापमान से जुड़े दस दिन पहले तक के पूर्वानुमान उपलब्ध कराए जा रहे हैं।
मंत्री ने बताया कि सरकार केवल तकनीकी निगरानी तक सीमित नहीं है, बल्कि तटीय समुदायों की तैयारी बढ़ाने के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम, मॉक ड्रिल, जागरूकता अभियान और प्रभाव आधारित पूर्वानुमान प्रणाली पर भी लगातार काम कर रही है। आपदा की स्थिति में समय पर चेतावनी पहुंचाने के लिए बहु-प्लेटफॉर्म सूचना तंत्र को भी मजबूत किया गया है।
डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि समुद्री अनुसंधान को बढ़ावा देने के लिए दीप महासागर मिशन के तहत चालू वित्त वर्ष में समुद्री संसाधनों के मानचित्रण के लिए 145.06 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं। भारतीय अनन्य आर्थिक क्षेत्र में समुद्री पर्वतों की जैव विविधता का अध्ययन तेज किया जा रहा है। इसके साथ ही जलतापीय स्रोतों, खनिज संपदा और समुद्री संसाधनों की खोज के लिए अत्याधुनिक स्वायत्त अंडरवाटर व्हीकल और रिमोटली ऑपरेटेड व्हीकल का उपयोग किया जा रहा है।
उन्होंने दोहराया कि सरकार का उद्देश्य स्वदेशी वैज्ञानिक तकनीकों और उन्नत महासागरीय अवलोकन प्रणालियों के जरिए मौसम और महासागर संबंधी पूर्वानुमानों की सटीकता बढ़ाना है, ताकि राज्यों, तटीय समुदायों, मछुआरों और अन्य हितधारकों को समय पर विश्वसनीय सलाह उपलब्ध कराई जा सके तथा जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों के बीच देश की तैयारी और क्षमता को और मजबूत बनाया जा सके।
