पिता जीवन भर अपनी जरूरतों का गला घोंटकर बच्चों का भविष्य बनाता है, वह धन नहीं, सम्मान और अपनापन चाहता है

अरुण शाही, बिहार

एक पिता अपने बच्चे को चलना सिखाता है, गिरने पर संभालता है, खुद की इच्छाओं को त्यागकर उसकी खुशियों का संसार रचता है। लेकिन वही बच्चा जब बड़ा होकर पिता की सलाह को तिरस्कार समझने लगे, उसकी बातों का जवाब देने लगे या उसे बोझ मानने लगे, तो सबसे ज्यादा चोट किसी और को नहीं, उसी पिता के दिल को लगती है। आधुनिकता और भागदौड़ भरे जीवन के इस दौर में रिश्तों की परिभाषाएं तेजी से बदल रही हैं। पूरी दुनिया में जून के तीसरे रविवार को मनाए जाने वाले फादर्स डे के अवसर पर यह सवाल पहले से अधिक प्रासंगिक हो गया है कि क्या नई पीढ़ी अपने पिता के त्याग और संघर्ष को उतनी ही गंभीरता से समझ रही है, जितनी पहले की पीढ़ियां समझती थीं।

समय के साथ संबोधनों से लेकर संबंधों तक बहुत कुछ बदल गया है। कभी घरों में बाबूजी, पिताजी और बाऊजी जैसे शब्द सम्मान और आत्मीयता के प्रतीक माने जाते थे। अब उनकी जगह पापा, डैडी और डैड ने ले ली है। बदलाव केवल शब्दों का नहीं है, बल्कि जीवनशैली और सोच का भी है। पहले पिता परिवार के अनुशासन और मार्गदर्शन का केंद्र होते थे। उनकी बात अंतिम मानी जाती थी। आज का दौर संवाद का है, जहां पिता और पुत्र मित्रों की तरह बातचीत करते हैं। यह बदलाव सकारात्मक भी है, लेकिन कई बार इसी खुलापन की आड़ में मर्यादाओं का क्षरण भी देखने को मिलता है।

साहित्यकार उदय नारायण सिंह बताते हैं कि पहले पिता कम बोलते थे और परिवार की अधिकांश बातें मां के माध्यम से बच्चों तक पहुंचती थीं। आज के पिता अपने बच्चों के अधिक करीब हैं। वे उनके साथ हंसते हैं, खेलते हैं, उनकी समस्याएं सुनते हैं और उन्हें समझने का प्रयास करते हैं। इसके बावजूद कई बार बच्चे पिता की भावनाओं और उनके संघर्षों को समझ नहीं पाते। यही दूरी आगे चलकर रिश्तों में खटास का कारण बनती है।

पटना निवासी पंकज कुमार और संजय कुमार कहते हैं कि उनके जीवन में पिता ही सबसे बड़े प्रेरणास्रोत रहे हैं। उनका मानना है कि एक पिता केवल परिवार का मुखिया नहीं होता, बल्कि वह अपने बच्चों के लिए जीवन का पहला शिक्षक, पहला मार्गदर्शक और सबसे भरोसेमंद साथी होता है। पिता की सीख कई बार उस समय कठोर लगती है, लेकिन जीवन के कठिन मोड़ों पर वही सीख सबसे बड़ी ताकत बनकर सामने आती है।

पुरातत्ववेत्ता रामशरण अग्रवाल का कहना है कि कुछ भटके हुए युवाओं को छोड़ दिया जाए तो अधिकांश बेटे अपने पिता का सम्मान करते हैं। फिर भी समाज में ऐसे उदाहरण बढ़ रहे हैं जहां वृद्ध माता-पिता उपेक्षा और अकेलेपन का शिकार हो रहे हैं। यह स्थिति केवल परिवारों के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए चिंता का विषय है। उनका मानना है कि जिस पिता ने अंगुली पकड़कर चलना सिखाया, उसके बुढ़ापे में सम्मान और साथ देना हर संतान का नैतिक दायित्व है।

अहियापुर के शहबाजपुर निवासी वयोवृद्ध समाजसेवी साधु शरण शाही कहते हैं कि पिता घर का माली होता है। वह अपने परिवार रूपी बगीचे को सींचता है, बच्चों के भविष्य के लिए दिन-रात मेहनत करता है और उनकी खुशियों के लिए स्वयं की इच्छाओं का बलिदान कर देता है। उनके अनुसार नई पीढ़ी का एक वर्ग मोबाइल, इंटरनेट और आभासी दुनिया में इतना खो गया है कि उसे घर के भीतर मौजूद उस व्यक्ति का दर्द दिखाई नहीं देता, जिसने उसके लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया।

विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिकता अपनाना गलत नहीं है, लेकिन यदि इसके कारण परिवार, संस्कार और रिश्तों का महत्व कम होने लगे तो यह चिंता का विषय बन जाता है। जिस दिन बेटा अपने पिता की आंखों में छिपे संघर्ष को पढ़ना सीख जाएगा, उस दिन पीढ़ियों के बीच बढ़ रही अधिकांश दूरियां स्वतः समाप्त हो जाएंगी। फादर्स डे केवल उपहार देने या सोशल मीडिया पर तस्वीर साझा करने का अवसर नहीं है, बल्कि यह उस व्यक्ति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का दिन है, जिसकी छांव में पूरा परिवार सुरक्षित महसूस करता है।

फादर्स डे की शुरुआत 20वीं सदी के प्रारंभ में हुई थी। सबसे पहले 5 जुलाई 1908 को पश्चिम वर्जीनिया के फेयरमोंट में इसका आयोजन किया गया था। इसके बाद सोनोरा स्मार्ट डोड के प्रयासों से 19 जून 1910 को वाशिंगटन के स्पोकेन शहर में इसे व्यापक रूप से मनाया गया। समय के साथ यह दिवस दुनिया के अनेक देशों में पिता के सम्मान और उनके योगदान को याद करने के अवसर के रूप में स्थापित हो गया।

आज जब दुनिया तेजी से बदल रही है, तब शायद पहले से अधिक जरूरत इस बात की है कि बच्चे अपने पिता को केवल एक अभिभावक नहीं, बल्कि संघर्ष, त्याग, अनुशासन और प्रेम की जीवंत मिसाल के रूप में देखें। क्योंकि जीवन की सबसे बड़ी सच्चाइयों में से एक यह भी है कि पिता की डांट में छिपा प्रेम और उनके त्याग की गहराई अक्सर तब समझ आती है, जब उन्हें समझने में बहुत देर हो चुकी होती है।