इस्लामाबाद में बैठक, लेकिन अमेरिकी प्रतिनिधियों से मिलने से ईरान का साफ इनकार
सेंट्रल डेस्क, नई दिल्ली
ईरान और अमेरिका के बीच चल रहा कूटनीतिक टकराव एक बार फिर ऐसे मोड़ पर आ खड़ा हुआ है, जहां बातचीत का रास्ता निकलकर भी ठहर गया है। पाकिस्तान की कोशिशों के बावजूद ईरान ने साफ संकेत दे दिया है कि वह अमेरिका से सीधे बातचीत करने के मूड में नहीं है और अपने तय रुख से पीछे हटने को तैयार नहीं है।
दरअसल, पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख आसिम मुनीर की पहल के बाद ईरान का प्रतिनिधिमंडल इस्लामाबाद पहुंचा। माना जा रहा था कि यह दौरा अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत का पूल बनेगा, लेकिन हुआ इसके उलट। 25 अप्रैल को ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने शहबाज शरीफ से बंद कमरे में लंबी बैठक की और उन्हें 10 सूत्रीय मांगों का एक प्रस्ताव सौंप दिया। इसके बाद ईरानी प्रतिनिधिमंडल बिना अमेरिकी अधिकारियों से मिले ही पाकिस्तान से रवाना हो गया।
ईरान पहले ही यह स्पष्ट कर चुका था कि वह अमेरिका के साथ आमने-सामने बैठकर बातचीत नहीं करेगा। तेहरान का मानना है कि वह केवल पाकिस्तान के जरिए अपने संदेश अमेरिका तक पहुंचाएगा। यही वजह रही कि इस्लामाबाद में मौजूद होने के बावजूद ईरानी डेलिगेशन ने अमेरिकी प्रतिनिधियों से दूरी बनाए रखी।
इस पूरे घटनाक्रम ने उस वक्त और दिलचस्प मोड़ ले लिया, जब यह संकेत मिले कि अमेरिकी पक्ष से ट्रंप के करीबी सहयोगी स्टीव विटकॉफ और जारेड कुशनर भी बातचीत के लिए सक्रिय हो सकते हैं। हालांकि, ईरान के रुख ने इस संभावना को फिलहाल ठंडे बस्ते में डाल दिया है।
इससे पहले 11-12 अप्रैल को इस्लामाबाद में दोनों देशों के बीच बातचीत का पहला दौर हुआ था, जो करीब 21 घंटे तक चला, लेकिन कोई ठोस नतीजा नहीं निकल सका। परमाणु कार्यक्रम और होर्मुज जलडमरूमध्य पर नियंत्रण जैसे मुद्दों पर दोनों पक्षों के बीच गहरे मतभेद बने हुए हैं।
ईरान की ओर से यह भी संकेत दिए गए हैं कि वह बाहरी दबावों के बावजूद अपने फैसलों में बदलाव नहीं करेगा। वहीं, देश के भीतर भी नेतृत्व ने जनता से संयम बरतने और संसाधनों के उपयोग में सावधानी की अपील की है, जिससे मौजूदा हालात से निपटा जा सके।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या आने वाले दिनों में कोई नई रणनीति सामने आएगी या फिर यह गतिरोध और गहराएगा। फिलहाल दुनिया की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि अमेरिका इस पूरे घटनाक्रम पर क्या रुख अपनाता है और क्या पाकिस्तान की मध्यस्थता कभी वास्तविक समाधान तक पहुंच पाएगी।