गरीब बच्चों के हक पर अड़ंगा डालने वाले स्कूलों पर जुर्माने का प्रावधान, लेकिन असली परीक्षा इसके सख्त क्रियान्वयन की

दीपक श्रीवास्तव

शिक्षा का अधिकार कानून देश के उन लाखों बच्चों के लिए उम्मीद की किरण है, जो आर्थिक तंगी के कारण बेहतर शिक्षा से वंचित रह जाते हैं। लेकिन विडंबना यह रही है कि जिन निजी विद्यालयों को इस कानून के तहत जिम्मेदारी दी गई, वही अक्सर इससे बचने के रास्ते तलाशते रहे हैं। अब बिहार सरकार ने ऐसे विद्यालयों पर शिकंजा कसने की तैयारी कर ली है, जो 25 प्रतिशत सीटों पर वंचित वर्ग के बच्चों का नामांकन नहीं लेते।

सरकार द्वारा जुर्माने का जो प्रावधान तय किया गया है, वह इस बात का संकेत है कि अब नियमों की अनदेखी करना आसान नहीं होगा। पहली बार उल्लंघन पर आर्थिक दंड और बार-बार नियम तोड़ने पर जुर्माने की बढ़ती राशि यह स्पष्ट करती है कि प्रशासन अब केवल औपचारिकता निभाने के मूड में नहीं है। बिना स्वीकृति के विद्यालय चलाने या निर्देशों की अनदेखी करने वालों के लिए यह एक कड़ा संदेश है।

वास्तविकता यह है कि आरटीई कानून लागू होने के वर्षों बाद भी इसकी भावना पूरी तरह जमीन पर नहीं उतर पाई है। कई निजी स्कूल प्रवेश प्रक्रिया में साक्षात्कार या टेस्ट के नाम पर गरीब बच्चों को बाहर करने की कोशिश करते हैं। यह न केवल कानून का उल्लंघन है, बल्कि सामाजिक असमानता को भी बढ़ावा देता है। अब ऐसे किसी भी प्रयास पर दंडात्मक कार्रवाई का प्रावधान इस व्यवस्था को अधिक पारदर्शी बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।

हालांकि, केवल नियम बनाना ही पर्याप्त नहीं है। सबसे बड़ी चुनौती इसके प्रभावी क्रियान्वयन की है। जिलास्तर पर निगरानी तंत्र मजबूत किए बिना यह संभव नहीं है कि हर स्कूल नियमों का पालन करे। शिक्षा विभाग के निर्देश तभी सार्थक होंगे, जब जिला शिक्षा पदाधिकारी और संबंधित अधिकारी नियमित जांच और कार्रवाई सुनिश्चित करें।

यह भी समझना जरूरी है कि शिक्षा केवल ज्ञान अर्जित करने का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक समानता की नींव है। जब एक गरीब परिवार का बच्चा भी उसी विद्यालय में पढ़ता है, जहां समाज के संपन्न वर्ग के बच्चे पढ़ते हैं, तभी वास्तविक समावेशी विकास संभव है। आरटीई का उद्देश्य भी यही है कि हर बच्चे को समान अवसर मिले, चाहे उसकी आर्थिक स्थिति कैसी भी हो।

राज्य सरकार की यह पहल निश्चित रूप से स्वागत योग्य है, लेकिन इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि इसे कितनी सख्ती और ईमानदारी से लागू किया जाता है। यदि यह केवल कागजी आदेश बनकर रह गया, तो हालात जस के तस बने रहेंगे। लेकिन अगर प्रशासन सक्रिय रहा और जवाबदेही तय हुई, तो यह कदम हजारों बच्चों के भविष्य को नई दिशा दे सकता है।