चार सितंबर को मनेगा श्रीकृष्ण जन्मोत्सव, रोहिणी नक्षत्र के साथ बन रहा विशेष संयोग
नई दिल्ली : इस बार श्रीकृष्ण जन्माष्टमी केवल कान्हा के जन्मोत्सव का उल्लास लेकर नहीं आ रही, बल्कि ग्रह-नक्षत्रों का ऐसा संयोग भी बन रहा है, जिसे ज्योतिषीय दृष्टि से विशेष माना जा रहा है। अच्छी बात यह है कि इस बार जन्माष्टमी की तिथि को लेकर भी कोई संशय नहीं है। भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि तीन सितंबर की देर रात 1:33 बजे शुरू हो चुकी है और चार सितंबर की रात 12:13 बजे तक रहेगी। उदया तिथि के अनुसार जन्माष्टमी चार सितंबर को मनाई जाएगी। देश के कई प्रमुख मंदिरों में भी इसी दिन कान्हा का जन्मोत्सव मनाने की तैयारी है। मध्यरात्रि में भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के साथ मंदिरों और घरों में विशेष पूजा होगी। पूजा का शुभ समय रात 11:26 बजे से 12:11 बजे तक रहेगा।
इस जन्माष्टमी को खास बना रहा है जयंती योग। मुजफ्फरपुर के ज्योतिषाचार्य संतोष के अनुसार, भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी के साथ रोहिणी नक्षत्र, चंद्रमा का वृष राशि में होना और मध्यरात्रि में वृष लग्न का संयोग जन्माष्टमी के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। इस बार ये सभी स्थितियां एक साथ बन रही हैं। यही वजह है कि श्रद्धालुओं के लिए इस बार कान्हा का जन्मोत्सव विशेष महत्व रखता है।
भगवान श्रीकृष्ण के जन्म से रोहिणी नक्षत्र का संबंध भी बेहद रोचक है। धार्मिक मान्यताओं में रोहिणी को चंद्रदेव का सबसे प्रिय नक्षत्र और उनकी पत्नी माना गया है। मान्यता है कि चंद्रदेव की अभिलाषा थी कि जब उनके वंश में भगवान नारायण अवतार लें, तब वे उनके दर्शन कर सकें। इसी अभिलाषा को पूर्ण करने के लिए भगवान नारायण ने रात्रि बेला में श्रीकृष्ण के रूप में अवतार लिया। श्रीमद्भागवत सहित विभिन्न धर्मग्रंथों में उल्लेख मिलता है कि जिस मध्यरात्रि में धरती पर कान्हा का जन्म हुआ, उसी समय आकाश में चंद्रदेव भी उनके दर्शन के लिए प्रकट हुए। हालांकि उस समय आकाश घने बादलों से घिरा हुआ था।
इस बार ग्रहों की स्थिति भी जन्माष्टमी की विशेषता बढ़ा रही है। देवगुरु बृहस्पति अपनी उच्च राशि कर्क में रहेंगे, जबकि ग्रहों के राजा सूर्य अपनी स्वराशि सिंह में विद्यमान रहेंगे। सौभाग्य, कला, सौंदर्य और प्रेम के कारक शुक्र अपनी राशि तुला में रहेंगे। ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार जयंती योग में की गई पूजा, ध्यान और आराधना को अक्षय फल प्रदान करने वाला माना गया है।
मध्यरात्रि में कान्हा के जन्म के बाद घरों और मंदिरों में उत्सव का रंग और गहरा हो जाएगा। लड्डू गोपाल को स्नान कराकर नए वस्त्र पहनाए जाएंगे और माखन-मिश्री का भोग लगाया जाएगा। शंख बजाकर जन्मोत्सव मनाने के साथ कान्हा के शृंगार में मोरपंख, बांसुरी, वैजयंती के फूलों अथवा बीजों से बनी माला और चांदी की पायल अर्पित करना शुभ माना गया है। जन्माष्टमी का व्रत रखने वाले श्रद्धालु पांच सितंबर को सुबह छह बजे पारण करेंगे।
