एक ही कनेक्शन के दो अलग-अलग रिकॉर्ड ने डिजिटल व्यवस्था की विश्वसनीयता पर उठाए सवाल

बिजली व्यवस्था को आधुनिक बनाने के लिए स्मार्ट प्रीपेड मीटर लगाए जा रहे हैं। इसका सीधा उद्देश्य है कि उपभोक्ता जितनी बिजली इस्तेमाल करना चाहता है, उसके लिए पहले भुगतान करे और अपने खर्च तथा बैलेंस का हिसाब आसानी से देख सके। लेकिन नोएडा की कुछ सोसाइटियों से सामने आया मामला इस डिजिटल व्यवस्था की बुनियाद पर ही सवाल खड़ा करता है। 

वर्ष 2023 में प्रीपेड मीटर लगने के बाद नियमित रूप से रिचार्ज कर बिजली इस्तेमाल कर रहे कुछ उपभोक्ताओं ने करीब तीन साल बाद जब जरूरत पड़ने पर बिल निकाला तो किसी के खाते में करीब डेढ़ लाख और किसी में ढाई लाख रुपये तक बकाया दिखाई दिया।

प्रीपेड व्यवस्था में सामान्यतः आगे बिजली इस्तेमाल करने के लिए खाते में पर्याप्त बैलेंस होना जरूरी होता है। ऐसे में सवाल स्वाभाविक है कि नियमित भुगतान करने वाले उपभोक्ता के नाम पर इतनी बड़ी देनदारी कैसे दिखाई दे रही है? उससे भी गंभीर सवाल तब खड़ा होता है, जब विभाग की ओर से कहा जाए कि बिल में दिखाई दे रही रकम पर ध्यान न दें, ऑनलाइन प्रीपेड खाते को देखें क्योंकि वास्तविक बकाया वहां शून्य है।

यदि ऑनलाइन रिकॉर्ड सही है तो आधिकारिक बिल गलत क्यों है? और यदि बिल सही है तो ऑनलाइन खाते में बकाया शून्य क्यों दिखाई दे रहा है? किसी उपभोक्ता से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह सरकारी व्यवस्था के दो अलग-अलग आंकड़ों में स्वयं तय करे कि किसे सही माना जाए।

नोएडा का यह मामला केवल कुछ उपभोक्ताओं की शिकायत मानकर छोड़ देने वाला नहीं है। देश में स्मार्ट प्रीपेड मीटर का दायरा बढ़ रहा है। इसलिए जहां भी पुराने बिलिंग सिस्टम से नई प्रीपेड व्यवस्था में उपभोक्ताओं को स्थानांतरित किया जा रहा है, वहां दोनों प्रणालियों के आंकड़ों का सही मिलान बेहद जरूरी है। तकनीक का बड़े पैमाने पर विस्तार तभी उपयोगी है, जब उसके साथ रिकॉर्ड की विश्वसनीयता भी सुनिश्चित हो।

डिजिटलीकरण का अर्थ केवल पुराने मीटर को हटाकर नया मीटर लगा देना नहीं है। मीटर, रिचार्ज, बिजली की खपत, भुगतान, बचा बैलेंस और आधिकारिक बिल—सभी को एक-दूसरे से जुड़ा होना चाहिए। एक ही कनेक्शन के लिए मोबाइल ऐप कुछ बताए, ऑनलाइन खाता कुछ और और आधिकारिक बिल तीसरी तस्वीर पेश करे तो तकनीक सुविधा के बजाय भ्रम पैदा करेगी।

मामला केवल बिजली भुगतान तक सीमित भी नहीं है। बिजली बिल पते और संपत्ति से जुड़ी विभिन्न प्रक्रियाओं में दस्तावेज के रूप में इस्तेमाल होता है। ऐसे में नियमित भुगतान करने वाले व्यक्ति के बिल पर यदि बड़ी रकम बकाया दिखाई दे तो उसे अनावश्यक परेशानी उठानी पड़ सकती है। अधिकारी का मौखिक आश्वासन कि “इसे मत देखिए” किसी आधिकारिक रिकॉर्ड की त्रुटि का स्थायी समाधान नहीं हो सकता।

इसलिए जरूरत केवल शिकायत मिलने पर किसी एक उपभोक्ता का बिल ठीक करने की नहीं है। ऐसे मामलों की व्यवस्थित तकनीकी जांच होनी चाहिए। यह देखा जाना चाहिए कि प्रीपेड व्यवस्था में स्थानांतरण के दौरान पुराने और नए बिलिंग सिस्टम के बीच कोई विसंगति तो नहीं रह गई। यदि वास्तविक देनदारी नहीं है तो गलत बकाया स्वतः हटना चाहिए। इसके लिए उपभोक्ता को कार्यालयों के चक्कर लगाने या आवेदन पर आवेदन देने की जरूरत नहीं पड़नी चाहिए।

स्मार्ट प्रीपेड मीटर भविष्य की जरूरत हो सकते हैं, लेकिन भविष्य की व्यवस्था पुराने और विरोधाभासी हिसाब के सहारे नहीं चल सकती। सरकार और बिजली कंपनियों को यह सुनिश्चित करना होगा कि मीटर ही नहीं, उसके पीछे चलने वाला पूरा बिलिंग सिस्टम भी स्मार्ट, पारदर्शी और भरोसेमंद हो।