आज से शुरू होगा शारदीय नवरात्र, कलश स्थापना के साथ नौ दिनों तक होगी आदिशक्ति की आराधना

नई दिल्ली। भक्तों की पुकार सुनने और अपने बच्चों पर कृपा बरसाने के लिए जगत जननी मां दुर्गा के आगमन की घड़ी अब निकट आ गई है। मंदिरों में तैयारियां शुरू हो गई हैं, घरों में पूजा की सामग्री जुटाई जा रही है और श्रद्धालुओं के मन में माता के स्वागत का उत्साह बढ़ने लगा है। हर वर्ष की तरह इस बार भी शारदीय नवरात्र में नौ दिनों तक मां भगवती के अलग-अलग स्वरूपों की आराधना की जाएगी। कहीं दुर्गा सप्तशती के मंत्र गूंजेंगे तो कहीं माता के भजन और जयकारों से वातावरण भक्तिमय होगा। इस वर्ष शारदीय नवरात्र का शुभारंभ 11 अक्टूबर, रविवार को होगा और 20 अक्टूबर, मंगलवार को विजयादशमी के साथ यह पावन उत्सव संपन्न होगा।

इस बार नवरात्र का एक विशेष धार्मिक महत्व भी बताया जा रहा है। परंपरागत मान्यताओं के अनुसार, मां दुर्गा का आगमन हाथी पर होगा। देवी का हाथी पर आना अत्यंत शुभ माना जाता है। हाथी को सुख, समृद्धि, स्थिरता और ऐश्वर्य का प्रतीक माना गया है। धार्मिक विश्वास है कि माता के इस वाहन पर आगमन से अच्छी वर्षा, खेती में उन्नति और समाज में खुशहाली के संकेत मिलते हैं। हालांकि, देवी की सवारी से जुड़े ऐसे फलादेश धार्मिक परंपराओं और ज्योतिषीय मान्यताओं पर आधारित हैं।

शारदीय नवरात्र हिंदू धर्म के प्रमुख पर्वों में शामिल है। यह केवल नौ दिनों तक व्रत रखने और पूजा करने का अवसर नहीं, बल्कि मन में भक्ति, संयम और सकारात्मक विचारों को स्थान देने का भी पर्व है। मान्यता है कि सच्चे मन से मां भगवती की आराधना करने पर भक्तों को आत्मिक शांति और कठिन परिस्थितियों का सामना करने की शक्ति मिलती है। माता के नौ स्वरूप जीवन में साहस, धैर्य, करुणा, ज्ञान और विश्वास का संदेश देते हैं।

11 अक्टूबर को कलश स्थापना से शुरू होगी आराधना

आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि पर 11 अक्टूबर को शारदीय नवरात्र का आरंभ होगा। इसी दिन श्रद्धालु अपने घरों और मंदिरों में विधि-विधान से कलश स्थापना करेंगे। नवरात्र के प्रथम दिन मां दुर्गा के पहले स्वरूप मां शैलपुत्री की पूजा की जाती है। धार्मिक मान्यता है कि मां शैलपुत्री पर्वतराज हिमालय की पुत्री हैं और उनकी आराधना से जीवन में धैर्य, स्थिरता और आत्मविश्वास बढ़ता है।

कलश स्थापना के साथ ही नौ दिनों की पूजा का संकल्प लिया जाता है। श्रद्धालु अपनी आस्था और सामर्थ्य के अनुसार व्रत रखते हैं। कुछ भक्त पूरे नौ दिन उपवास करते हैं, जबकि कुछ प्रतिपदा और अष्टमी अथवा नवमी को व्रत रखते हैं। घरों में अखंड ज्योति जलाने, देवी मंत्रों का जाप करने और दुर्गा सप्तशती का पाठ करने की भी परंपरा है।

पूजा के दौरान स्वच्छता, पवित्रता और मन की एकाग्रता को विशेष महत्व दिया जाता है। मान्यता है कि माता की आराधना में बाहरी आडंबर से अधिक सच्ची श्रद्धा और निर्मल भावना का महत्व होता है।

कलश स्थापना के लिए अभिजीत मुहूर्त का महत्व

दिए गए पंचांग विवरण के अनुसार, 11 अक्टूबर को चित्रा नक्षत्र और वैधृति योग का उल्लेख है। इस दिन कलश स्थापना के लिए अभिजीत मुहूर्त सुबह 11 बजकर 36 मिनट से दोपहर 12 बजकर 24 मिनट तक बताया गया है।

धार्मिक परंपरा में कलश स्थापना का विशेष महत्व है। कलश को मंगल, पवित्रता और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। श्रद्धालु पूजा स्थान को साफ करके कलश स्थापित करते हैं और मां भगवती का आह्वान करते हैं। इसके बाद दीप, धूप, पुष्प और नैवेद्य अर्पित कर देवी की आराधना की जाती है।

हालांकि, कलश स्थापना का शुभ समय स्थान के अनुसार बदल सकता है। सूर्योदय, स्थानीय पंचांग और अन्य ज्योतिषीय गणनाओं के कारण मुहूर्त में अंतर संभव है। इसलिए श्रद्धालुओं को अपने शहर के पंचांग अथवा जानकार पुरोहित से शुभ समय की पुष्टि कर लेनी चाहिए।

नौ दिनों तक होगी माता के नौ स्वरूपों की पूजा

नवरात्र के प्रत्येक दिन मां दुर्गा के एक विशेष स्वरूप की आराधना करने की परंपरा है। पहले दिन मां शैलपुत्री, दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी और तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की पूजा की जाती है। चौथे दिन मां कूष्मांडा, पांचवें दिन मां स्कंदमाता और छठे दिन मां कात्यायनी की आराधना होती है। सातवें दिन मां कालरात्रि, आठवें दिन मां महागौरी और नौवें दिन मां सिद्धिदात्री की पूजा का विधान है।

माता के इन नौ स्वरूपों को शक्ति के अलग-अलग रूपों का प्रतीक माना जाता है। मां शैलपुत्री स्थिरता और विश्वास का संदेश देती हैं, तो मां ब्रह्मचारिणी तप और संयम की प्रेरणा देती हैं। मां चंद्रघंटा साहस, मां कूष्मांडा सृजन शक्ति और मां स्कंदमाता मातृत्व तथा करुणा का प्रतीक मानी जाती हैं। इसी तरह मां कात्यायनी अन्याय के विरुद्ध संघर्ष, मां कालरात्रि भय से मुक्ति, मां महागौरी पवित्रता और मां सिद्धिदात्री आध्यात्मिक पूर्णता का संदेश देती हैं।

16 अक्टूबर को बेलवरण पूजा की परंपरा

शारदीय दुर्गा पूजा में 16 अक्टूबर, शुक्रवार को बेलवरण पूजा का विशेष महत्व रहेगा। यह परंपरा विशेष रूप से पश्चिम बंगाल और पूर्वी भारत के अनेक क्षेत्रों में प्रचलित है। बेलवरण के माध्यम से देवी के स्वागत और पूजा के महत्वपूर्ण चरणों की शुरुआत की जाती है।

दुर्गा पूजा की परंपराओं में माता के आगमन को बेटी के मायके आने के समान भी देखा जाता है। यही कारण है कि बंगाल सहित अनेक क्षेत्रों में मां दुर्गा के स्वागत का भाव अत्यंत आत्मीय और उत्साहपूर्ण होता है। श्रद्धालु देवी को अपने परिवार का हिस्सा मानकर उनकी पूजा करते हैं।

17 अक्टूबर को महासप्तमी, खुलेंगे माता के पट

17 अक्टूबर, शनिवार को महासप्तमी से संबंधित धार्मिक अनुष्ठान किए जाएंगे। दिए गए पंचांग विवरण में सुबह 8 बजकर 58 मिनट के बाद सप्तमी से जुड़ी पूजा का उल्लेख किया गया है।

इस दिन नवपत्रिका प्रवेश सहित दुर्गा पूजा की अनेक महत्वपूर्ण परंपराएं निभाई जाती हैं। विभिन्न पूजा पद्धतियों के अनुसार निशा पूजा और मूल नक्षत्र से जुड़े अनुष्ठानों का भी विशेष महत्व बताया गया है। पूजा पंडालों में मां दुर्गा की प्रतिमाओं की विधिवत पूजा की जाएगी।

कई स्थानों पर इसी दिन श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए माता के पट खोले जाते हैं। इसके साथ ही दुर्गा पूजा का उत्साह और बढ़ जाता है। भव्य पंडालों, रोशनी और देवी के भजनों से वातावरण भक्तिमय हो उठता है। श्रद्धालु परिवार के साथ माता के दर्शन करने पहुंचते हैं और सुख-शांति की कामना करते हैं।

18 अक्टूबर को महाअष्टमी, मां महागौरी की होगी आराधना

18 अक्टूबर, रविवार को दुर्गा अष्टमी का पर्व मनाया जाएगा। नवरात्र में अष्टमी तिथि का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। इस दिन मां दुर्गा के आठवें स्वरूप मां महागौरी की पूजा की जाती है।धार्मिक मान्यता है कि मां महागौरी की आराधना से मन की अशांति दूर होती है और जीवन में पवित्रता तथा सकारात्मक विचारों का संचार होता है।

अष्टमी के अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु व्रत रखते हैं। घरों और मंदिरों में विशेष पूजा की जाती है। अनेक परिवारों में कन्या पूजन की परंपरा है। छोटी कन्याओं को देवी का स्वरूप मानकर उनका आदर-सत्कार किया जाता है और श्रद्धापूर्वक भोजन कराया जाता है।

इस दिन विशेष पूजा और महानिशा पूजा की भी परंपरा है। दुर्गा पूजा पंडालों में माता की आराधना के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु जुटते हैं। भक्त देवी से अपने परिवार की रक्षा, सुख और मंगल की प्रार्थना करते हैं।

19 अक्टूबर को संधि पूजा और महानवमी का विशेष महत्व

19 अक्टूबर, सोमवार को अष्टमी और नवमी के मिलन की संधि बेला में विशेष पूजा की जाएगी। धार्मिक परंपरा में संधि पूजा का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। यह वह समय माना जाता है, जब अष्टमी तिथि समाप्त होकर नवमी का आरंभ होता है।

दिए गए पंचांग विवरण में संधि पूजा के लिए सुबह 6 बजकर 53 मिनट का समय बताया गया है। हालांकि, संधि पूजा का वास्तविक समय तिथियों के संधिकाल पर निर्भर करता है। इसलिए पूजा से पहले स्थानीय पंचांग के अनुसार समय की पुष्टि आवश्यक है।

संधि पूजा में मां दुर्गा की विशेष आराधना की जाती है। इसे शक्ति की उपासना का महत्वपूर्ण अवसर माना जाता है। इसी दिन महानवमी से जुड़े धार्मिक अनुष्ठान भी किए जाएंगे। अनेक श्रद्धालु नवमी पर हवन, कन्या पूजन और देवी पाठ का आयोजन करते हैं।

मान्यता है कि नवमी की पूजा नवरात्र साधना की पूर्णता का प्रतीक है। भक्त माता से प्रार्थना करते हैं कि उनके जीवन में सद्बुद्धि, साहस और सदाचार बना रहे।

20 अक्टूबर को विजयादशमी, होगा माता की प्रतिमाओं का विसर्जन

20 अक्टूबर, मंगलवार को विजयादशमी का पर्व मनाया जाएगा। दिए गए पंचांग विवरण के अनुसार, इस दिन उदया तिथि में नवमी रहेगी और नवमी तिथि सुबह 9 बजकर 35 मिनट तक बताई गई है। इसके बाद व्रत पारण का उल्लेख है। हालांकि, पारण और विजयादशमी के अनुष्ठानों का समय स्थानीय पंचांग तथा संबंधित परंपराओं के अनुसार निर्धारित करना उचित होगा।

विजयादशमी को बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इसी पर्व का संबंध भगवान श्रीराम की रावण पर विजय से है। इसलिए दशहरा केवल उत्सव नहीं, बल्कि सत्य, धर्म और न्याय के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देने वाला पर्व भी है।

इसी अवसर पर अनेक स्थानों पर मां दुर्गा की प्रतिमाओं का विसर्जन किया जाएगा। भक्त नम आंखों से माता को विदाई देंगे और अगले वर्ष फिर आने की प्रार्थना करेंगे। विशेष रूप से बंगाल की दुर्गा पूजा परंपरा में देवी की विदाई का दृश्य अत्यंत भावुक होता है।

हाथी पर माता का आगमन क्यों माना जाता है शुभ

इस वर्ष मां दुर्गा के हाथी पर आगमन की मान्यता श्रद्धालुओं के बीच विशेष चर्चा का विषय है। धार्मिक परंपराओं में देवी के आगमन और प्रस्थान के वाहनों का अलग-अलग महत्व बताया गया है।

हाथी को राजसी वैभव, स्थिरता, समृद्धि और वर्षा से जोड़कर देखा जाता है। ऐसी मान्यता है कि जब माता हाथी पर आती हैं, तो यह अच्छी वर्षा और कृषि के लिए अनुकूल परिस्थितियों का संकेत होता है। खेती पर निर्भर परिवारों के लिए वर्षा का विशेष महत्व है। इसलिए देवी का हाथी पर आगमन खुशहाली की आशा से भी जोड़ा जाता है।

भारतीय धार्मिक संस्कृति में प्रकृति और देवी की आराधना का गहरा संबंध रहा है। वर्षा, अन्न, जल और धरती की उर्वरता को जीवन के लिए आवश्यक माना गया है। इसी कारण माता के वाहन से जुड़ी परंपराओं में भी प्रकृति और लोकजीवन की झलक दिखाई देती है।

यह स्पष्ट रखना आवश्यक है कि हाथी पर आगमन से वर्षा या समृद्धि होने की बात धार्मिक विश्वास है, मौसम अथवा आर्थिक परिस्थितियों की वैज्ञानिक भविष्यवाणी नहीं।

दुर्गा सप्तशती के पाठ से जुड़ी है विशेष आस्था

नवरात्र में दुर्गा सप्तशती का पाठ करने की प्राचीन परंपरा है। इसमें मां भगवती की महिमा, असुरों पर विजय और देवी की शक्ति का वर्णन मिलता है। श्रद्धालु अपनी सुविधा और सामर्थ्य के अनुसार स्वयं पाठ करते हैं या योग्य पुरोहित से संकल्प लेकर पाठ करवाते हैं।

इसके अतिरिक्त देवी कवच, सिद्ध कुंजिका स्तोत्र और देवी मंत्रों का जाप भी किया जाता है। मान्यता है कि नियमित पूजा और पाठ से मन को शांति मिलती है तथा भक्त के भीतर विश्वास और सकारात्मक भावनाएं मजबूत होती हैं।

नवरात्र में पूजा के साथ आचरण की शुद्धता को भी महत्वपूर्ण माना गया है। क्रोध, कटु वचन, अहंकार और दूसरों के प्रति गलत भावनाओं से दूर रहने की सीख दी जाती है। माता की आराधना का उद्देश्य केवल अपनी मनोकामनाएं पूरी करने की प्रार्थना करना नहीं, बल्कि अपने व्यवहार को भी बेहतर बनाना है।

भक्ति के साथ सेवा और सदाचार का भी लें संकल्प

नवरात्र का पर्व हमें यह याद दिलाता है कि शक्ति का वास्तविक अर्थ केवल सामर्थ्य नहीं, बल्कि उस सामर्थ्य का सही उपयोग भी है। मां दुर्गा की आराधना अन्याय के विरुद्ध खड़े होने, कमजोरों की सहायता करने और जीवन में अच्छे विचार अपनाने की प्रेरणा देती है।

इन नौ दिनों में श्रद्धालु अपनी सामर्थ्य के अनुसार व्रत, पूजा, पाठ और साधना कर सकते हैं। जो लोग कठोर उपवास नहीं रख सकते, वे भी सच्ची श्रद्धा से माता की आराधना कर सकते हैं। धार्मिक आस्था में भावना का विशेष महत्व माना गया है।

इस नवरात्र जरूरतमंद परिवारों की सहायता करना, भूखे व्यक्ति को भोजन कराना, बुजुर्गों का सम्मान करना और किसी दुखी व्यक्ति के चेहरे पर मुस्कान लाने का प्रयास करना भी भक्ति की भावना को सार्थक बना सकता है।