टीएमसी छोड़ NCPI के साथ जाने वाले सांसदों के भविष्य पर अब स्पीकर के फैसले का इंतजार
नई दिल्ली : तृणमूल कांग्रेस से अलग होकर नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) के साथ जाने वाले 20 सांसदों की लोकसभा सदस्यता पर संकट गहरा गया है। टीएमसी की ओर से दायर अयोग्यता याचिकाओं पर लोकसभा सचिवालय ने सभी सांसदों को नोटिस भेजकर सात दिनों के भीतर अपना पक्ष रखने को कहा है। मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है, जहां टीएमसी नेता अभिषेक बनर्जी ने कार्यवाही में हो रही देरी पर सवाल उठाते हुए जल्द फैसला कराने की मांग की है।
लोकसभा सचिवालय की ओर से जारी नोटिस दलबदल के आधार पर अयोग्यता से संबंधित 1985 के नियमों के तहत भेजे गए हैं। इसके साथ अभिषेक बनर्जी की ओर से 18 जून को दाखिल अयोग्यता याचिकाओं की प्रतियां भी सांसदों को उपलब्ध कराई गई हैं।
इस राजनीतिक और कानूनी लड़ाई की शुरुआत उस समय हुई जब टीएमसी के 20 सांसदों ने पार्टी से अलग होकर NCPI के साथ विलय का दावा किया। सांसदों ने लोकसभा में अलग समूह के रूप में पहचान देने की मांग भी की। दूसरी तरफ टीएमसी का कहना है कि ये सभी उसके चुनाव चिह्न पर निर्वाचित हुए थे और दूसरी राजनीतिक पार्टी के साथ जाने का उनका फैसला संविधान की दसवीं अनुसूची यानी दलबदल विरोधी कानून के दायरे में आता है।
स्पीकर के समक्ष अयोग्यता की याचिकाएं लंबित रहने के बाद अभिषेक बनर्जी ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उनकी मांग है कि लोकसभा स्पीकर को इन मामलों पर निश्चित समय-सीमा के भीतर निर्णय लेने का निर्देश दिया जाए।
सुप्रीम कोर्ट ने 20 सांसदों को नोटिस जारी कर उनका जवाब मांगा। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के सामने लोकसभा स्पीकर और सदन के महासचिव की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता पेश हुए। उन्होंने अदालत को बताया कि स्पीकर की ओर से सांसदों को अयोग्यता याचिकाओं पर नोटिस पहले ही जारी किए जा चुके हैं।
इस पर अदालत ने साफ किया कि मुद्दा केवल नोटिस भेजने तक सीमित नहीं है, बल्कि कार्यवाही को एक निश्चित समय-सीमा में पूरा करने का भी है। इसी टिप्पणी के साथ मामला अब इस सवाल पर केंद्रित हो गया है कि स्पीकर अयोग्यता याचिकाओं पर अंतिम फैसला कब तक लेते हैं।
टीएमसी का आरोप है कि दूसरी राजनीतिक पार्टी के साथ जाने के बाद इन सांसदों ने स्वेच्छा से अपनी मूल पार्टी की सदस्यता छोड़ने जैसा आचरण किया है। ऐसे में उनके खिलाफ दलबदल विरोधी प्रावधान लागू होने चाहिए। दूसरी ओर बागी खेमे का दावा है कि उनका कदम वैध विलय की श्रेणी में आता है।
अब सभी 20 सांसदों को लोकसभा सचिवालय के नोटिस का जवाब देना होगा। उनके जवाब और दोनों पक्षों की दलीलों के बाद अयोग्यता पर आगे की कार्यवाही होगी। इस पूरे घटनाक्रम पर सुप्रीम कोर्ट की भी नजर है, जिससे टीएमसी के भीतर शुरू हुई राजनीतिक टूट अब एक महत्वपूर्ण संवैधानिक और कानूनी लड़ाई में बदल गई है।

