- कार्यक्रम में उमड़ी भीड़ ने नीतीश कुमार के प्रति भरोसा जताया। मंच पर मौजूद नेताओं की भूमिका और सक्रियता पर उठे सवाल
Panchayat Voice: आज मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के पुत्र निशांत ने जनता दल यूनाइटेड की सदस्यता ग्रहण की। ऊंट, हाथी, राजा-बाजा और भीड़ भी मौजूद थी, लेकिन निशांत के चेहरे पर खुशी दिखाई नहीं दी। सब कुछ औपचारिकता जैसा लग रहा था। ऐसा प्रतीत हुआ मानो वह पिता के आदेश का पालन कर रहे हों। निशांत के जॉइनिंग कार्यक्रम में भी वही लोग उनके आसपास साए की तरह मौजूद थे, जो हमेशा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के साथ दिखाई देते हैं। वहां केंद्रीय मंत्री ललन प्रसाद सिंह, पार्टी के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा, प्रदेश अध्यक्ष उमेश कुशवाहा, विधान परिषद सदस्य संजय गांधी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के अंगरक्षक से सेवानिवृत्त हरेंद्र सिंह मौजूद थे। आज की तारीख में जनता दल यूनाइटेड का मतलब यही चंद लोग दिखते हैं, जो जॉइनिंग की पूरी भूमिका में प्रमुख नजर आए।
इस मौके पर मंत्री विजय चौधरी और अशोक चौधरी, मंत्री श्रवण कुमार, बिजली मंत्री विजेंद्र बाबू, लेसी सिंह, मदन साहनी, जमा खान और मनीष वर्मा भी दिखाई दिए, लेकिन उनकी उपस्थिति मात्र औपचारिक लगी। भीड़ इतनी अधिक थी कि कई चेहरों को पहचान पाना भी कठिन था। आज हजारों की संख्या में उमड़ी भीड़ ने निशांत के प्रति जो प्रेम दिखाया, उससे यह साफ लगता है कि जनता दल यूनाइटेड को भाजपा में विलय करने की कोशिश आसान नहीं होगी। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के प्रति लोगों का प्रेम अब भी बना हुआ है, घटा नहीं है।
आज भी जनता दल यूनाइटेड के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार ही बिहार के मुख्यमंत्री हैं, फिर भी पार्टी कुछ ही लोगों के प्रभाव में चलती हुई दिखाई देती है, जो चिंताजनक है। राज्यसभा प्रकरण हो या कोई अन्य महत्वपूर्ण अवसर, कुछ खास लोग हमेशा उनकी छाया की तरह साथ दिखाई देते हैं। होली से कई दिन पहले ही पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव मनीष वर्मा को पूरे प्रकरण से बाहर रखा गया। उनके समर्थकों को अब मुख्यमंत्री के आसपास पहुंचना तो दूर, उनका चेहरा देख पाना भी मुश्किल हो गया है।
राज्यसभा चुनाव प्रकरण के दौरान मंत्री अशोक चौधरी की जो स्थिति दिखाई दी, उससे साफ हो गया कि आगे ऐसी स्थिति अन्य नेताओं के साथ भी हो सकती है। अब गिने-चुने लोगों को भी तरसना पड़े, तो कोई बड़ी बात नहीं होगी। इस पूरे प्रकरण में विजय चौधरी भी लगभग किनारे कर दिए गए, जबकि मुख्य भूमिका संजय झा और ललन सिंह की रही। राज्यसभा प्रकरण में बार-बार कहा जा रहा है कि इसमें कोई साजिश या षड्यंत्र नहीं है, लेकिन कई लोगों को लगता है कि यह सच को झुठलाने की कोशिश है। यह मुख्यमंत्री की इच्छा प्रतीत नहीं होती।
ऐसी स्थिति में पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव रहे मनीष वर्मा की एंट्री पर रोक का क्या मतलब है। समता पार्टी के स्थापना काल से साथ रहे और हाल ही में पार्टी में लौटे जहानाबाद के पूर्व सांसद अरुण कुमार सिंह को समय मांगने के बावजूद होली की बधाई देने का अवसर भी नहीं मिला। पहले होली के अवसर पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का आवास आमजन के लिए खुला रहता था और टेलीफोन पर भी लोग उन्हें बधाई दे पाते थे, लेकिन इस बार सुरक्षा घेराबंदी और लगभग घोषित नजरबंदी जैसी स्थिति क्यों दिखाई दी। ये कुछ ऐसे सवाल हैं, जो यह विश्वास नहीं होने देते कि स्थितियां सामान्य हैं।
अगर थोड़ा और पीछे जाकर देखें, तो पार्टी का आम कार्यकर्ता विशेष रूप से ललन सिंह और संजय झा से नाराज दिखाई देता है। विजय चौधरी और अशोक चौधरी के खिलाफ भी गुस्सा क्यों है, यह सवाल उठ रहा है। विधान परिषद सदस्य संजय गांधी के साथ धक्का-मुक्की की स्थिति क्यों बनी। प्रदेश अध्यक्ष उमेश कुशवाहा को विरोध का सामना क्यों करना पड़ा। विधानसभा चुनाव के समय भी उनकी भूमिका पर सवाल उठे थे और संदेह की स्थिति बनी रही।
यह भी सच है कि समता पार्टी के पुराने साथी और जहानाबाद के पूर्व सांसद अरुण कुमार सिंह को बार-बार अनुमति मांगने के बावजूद रोका गया। चुनाव से कुछ महीने पहले सब कुछ तय हो जाने के बाद भी उनकी पार्टी में एंट्री केंद्रीय मंत्री ललन सिंह ने रोक दी। बाद में आपसी सुलह के बाद, जब जगदीश शर्मा के पुत्र राहुल शर्मा ने लालटेन थाम ली, तब मजबूरी में उन्हें प्रवेश मिला।
इस पूरे प्रकरण पर कई महत्वपूर्ण टिप्पणियां भी सामने आईं। पार्टी के वरिष्ठ नेता वशिष्ठ बाबू ने कहा कि यह अच्छा फैसला नहीं है। उन्होंने बाद में स्थिति को संभालने की बात कही, लेकिन संभव है कि यह किसी दबाव का हिस्सा हो। सबसे कठोर टिप्पणी समता पार्टी के पुराने साथी और नीतीश कुमार के करीबी रहे पूर्व विधान पार्षद प्रेम कुमार मणि की रही, जिसमें उन्होंने कनपटी पर कट्टा रखकर हस्ताक्षर कराने जैसी बात कही।
मुख्यमंत्री के करीबी माने जाने वाले भाजपा नेता सरयू राय का बयान भी बहुत कुछ संकेत देता है। जहां तक मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के तथाकथित मित्र नरेंद्र सिंह और आपदा प्रबंधन समिति के अध्यक्ष उदय नारायण चौधरी के बयान का सवाल है, वह अधिकतर अवसरवादी टिप्पणी जैसा प्रतीत होता है।
आज की स्थिति यह है कि कई महिलाएं, बच्चे और आम लोग, जिनका राजनीति से कोई सीधा संबंध नहीं है, वे भी मंत्री के राज्यसभा जाने और बिहार छोड़ने के फैसले से असहज महसूस कर रहे हैं। लोगों के बीच एक तरह की असुरक्षा और खालीपन की भावना दिखाई दे रही है।