कई जिलों में रजिस्ट्री कार्यालयों का कामकाज प्रभावित, अधिवक्ताओं ने निजीकरण और बेरोजगारी का खतरा बताते हुए आंदोलन तेज करने की चेतावनी दी है

नोएडा। उत्तर प्रदेश में प्रस्तावित ई-पंजीकरण व्यवस्था को लेकर छिड़ा विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है। एक ओर सरकार रजिस्ट्री प्रक्रिया को पूरी तरह डिजिटल और पेपरलेस बनाकर उसे अधिक पारदर्शी, सरल और समयबद्ध बनाने की तैयारी में है, तो दूसरी ओर अधिवक्ता, दस्तावेज लेखक और स्टाम्प वेंडर इसके खिलाफ सड़क पर उतर आए हैं। प्रदेश के अनेक जिलों में अनिश्चितकालीन हड़ताल जारी है और रजिस्ट्री कार्यालयों का कामकाज प्रभावित हो रहा है।

सरकार की योजना के तहत संपत्ति पंजीकरण से जुड़ी अधिकांश प्रक्रियाएं ऑनलाइन होंगी। पक्षकारों को कागजी दस्तावेज लेकर कार्यालयों के चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे। एग्रीमेंट डिजिटल प्रारूप में तैयार कर ऑनलाइन सत्यापन के लिए उपनिबंधक कार्यालय भेजा जाएगा। स्टाम्प शुल्क का भुगतान भी ऑनलाइन होगा। फोटो और डिजिटल हस्ताक्षर की औपचारिकता पूरी होने के बाद पंजीकरण की प्रक्रिया पूरी की जाएगी तथा रजिस्ट्री की प्रति ईमेल के माध्यम से उपलब्ध कराई जाएगी।

हालांकि इस प्रस्तावित व्यवस्था ने अधिवक्ताओं और उससे जुड़े अन्य पेशेवरों की चिंता बढ़ा दी है। उनका कहना है कि यदि पूरी व्यवस्था ऑनलाइन हो गई तो वर्षों से रजिस्ट्री कार्य से जुड़े लाखों लोगों के सामने रोजगार का संकट खड़ा हो जाएगा। इसी आशंका को लेकर प्रदेश भर में विरोध प्रदर्शन चल रहे हैं।

नोएडा के सेक्टर-33 स्थित स्टाम्प एवं रजिस्ट्रेशन कार्यालय में भी हड़ताल का व्यापक असर देखने को मिल रहा है। आंदोलन में शामिल अधिवक्ता सी.एस. नागर का कहना है कि उनकी हड़ताल छठे दिन में प्रवेश कर चुकी है और यह केवल नोएडा तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रदेश के कई जिलों में विरोध प्रदर्शन चल रहा है। उनका आरोप है कि सरकार द्वारा लागू की जा रही ई-पंजीकरण व्यवस्था लाखों लोगों की आजीविका पर प्रतिकूल प्रभाव डालेगी।

अधिवक्ताओं का कहना है कि रजिस्ट्री व्यवस्था से केवल वकील ही नहीं जुड़े हैं, बल्कि बैनामा लेखक, स्टाम्प विक्रेता, फोटोग्राफर, टाइपिस्ट, मुंशी, फोटोकॉपी संचालक और छोटे-छोटे व्यवसाय भी इसी व्यवस्था पर निर्भर हैं। उनका आरोप है कि सरकार धीरे-धीरे इस पूरी प्रक्रिया को निजी हाथों में सौंपने की दिशा में आगे बढ़ रही है। आंदोलनकारियों ने चेतावनी दी है कि जब तक विवादित आदेश वापस नहीं लिया जाता, तब तक उनकी हड़ताल जारी रहेगी। साथ ही पुतला दहन और कलेक्ट्रेट में प्रदर्शन कर जिलाधिकारी का घेराव करने की भी घोषणा की गई है।

अधिवक्ता श्यामवीर सिंह बैसोया ने दावा किया कि गौतमबुद्ध नगर की चारों बार एसोसिएशन इस मुद्दे पर एकजुट हैं और न्यायिक कार्य से दूरी बनाए हुए हैं। उन्होंने कहा कि पहले परिवहन विभाग में ड्राइविंग लाइसेंस से जुड़े कई कार्य निजी एजेंसियों को सौंपे गए, जिसके बाद आम लोगों का खर्च बढ़ गया। अब रजिस्ट्री व्यवस्था के साथ भी वैसा ही होने की आशंका है। उनका कहना है कि यह केवल पेशे का नहीं बल्कि हजारों परिवारों की रोजी-रोटी का प्रश्न है। जब तक सरकार लिखित रूप से आश्वासन नहीं देती, आंदोलन जारी रहेगा।

विरोध के बीच शासन ने भी स्थिति स्पष्ट करने के लिए कदम उठाया है। महानिरीक्षक निबन्धन कार्यालय, लखनऊ की ओर से अपर महानिरीक्षक निबन्धन निरंजन कुमार ने सभी सहायक महानिरीक्षक निबन्धन को पत्र भेजकर निर्देश दिया है कि अधिवक्ताओं, दस्तावेज लेखकों और आम जनता के बीच फैली भ्रांतियों को दूर किया जाए। पत्र में स्पष्ट किया गया है कि ई-पंजीकरण व्यवस्था को लेकर कई तरह की गलतफहमियां फैल रही हैं, जिन्हें तथ्यात्मक जानकारी देकर समाप्त किया जाना चाहिए।

शासन के ताजा स्पष्टीकरण के अनुसार आम नागरिकों के बीच होने वाली जमीन, मकान और अन्य संपत्तियों की सामान्य रजिस्ट्रियों पर फिलहाल कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। ऐसी रजिस्ट्रियां पहले की तरह पारंपरिक प्रक्रिया के तहत ही संपन्न होती रहेंगी। नई डिजिटल व्यवस्था का दायरा अभी सीमित रखा गया है।

सरकारी पत्र के मुताबिक ई-पंजीकरण व्यवस्था मुख्य रूप से नोएडा, ग्रेटर नोएडा और यमुना एक्सप्रेसवे औद्योगिक विकास प्राधिकरण जैसे विकास प्राधिकरणों तथा आवास विकास परिषदों की संपत्तियों के आवंटन पत्रों और प्रथम ट्रांसफर तक ही लागू होगी। इससे स्पष्ट है कि आम जनता की नियमित खरीद-बिक्री वाली अधिकांश रजिस्ट्रियां फिलहाल पुरानी व्यवस्था के तहत ही जारी रहेंगी।

हालांकि शासन के इस स्पष्टीकरण के बाद भी अधिवक्ताओं का आंदोलन समाप्त होता नहीं दिख रहा है। उनका कहना है कि यदि भविष्य में इस व्यवस्था का दायरा बढ़ाया गया तो व्यापक स्तर पर रोजगार प्रभावित होगा। ऐसे में सरकार और आंदोलनकारी संगठनों के बीच होने वाली आगामी बातचीत पर सभी की नजरें टिकी हैं।