उपाधीक्षक ने कहा, मरीज को तत्काल उपचार देना चिकित्सक का पहला कर्तव्य, फिर जारी होगा निर्देश
मुजफ्फरपुर : स्वास्थ्य सेवाओं का दायरा बढ़ रहा है। मेडिकल कॉलेज अस्पतालों के साथ चिकित्सकों की संख्या में भी इजाफा हो रहा है। विदेश से मेडिकल की पढ़ाई पूरी कर लौटने वाले चिकित्सक भी चिकित्सा व्यवस्था का हिस्सा बन रहे हैं और आयुष चिकित्सकों की संख्या भी बढ़ी है। एसकेएमसीएच में शैक्षणिक सत्र 2026-27 से एमबीबीएस की सीटें 120 से बढ़ाकर 150 कर दी गई हैं। लेकिन संसाधनों और चिकित्सकों की बढ़ती संख्या के बीच मरीजों को मिलने वाले इलाज की गुणवत्ता और चिकित्सकों के व्यवहार को लेकर सवाल भी लगातार सामने आ रहे हैं। खासकर इमरजेंसी में जांच से पहले प्राथमिक उपचार शुरू नहीं किए जाने की शिकायत मरीजों और उनके परिजनों की परेशानी बढ़ा रही है।
एसकेएमसीएच उत्तर बिहार के बड़े सरकारी चिकित्सा संस्थानों में शामिल है। यहां मुजफ्फरपुर के अलावा आसपास के जिलों से भी बड़ी संख्या में मरीज इलाज के लिए पहुंचते हैं। गंभीर स्थिति वाले मरीजों के लिए इमरजेंसी सबसे महत्वपूर्ण होती है। ऐसे मरीजों के मामले में उपचार शुरू करने का समय काफी मायने रखता है।
इसके बावजूद मरीजों और परिजनों की शिकायत है कि इमरजेंसी में पहुंचने के बाद कई मामलों में इलाज शुरू करने से पहले विभिन्न जांच कराने की सलाह दी जाती है। पेट दर्द की शिकायत लेकर पहुंचने वाले मरीजों को अल्ट्रासाउंड और सिर में गंभीर चोट वाले मरीजों को सीटी स्कैन कराने की सलाह दी जाती है। जांच और उसकी रिपोर्ट आने में समय लगने के कारण परिजनों को लगता है कि उपचार शुरू होने में देरी हो रही है।
चिकित्सा विज्ञान में बीमारी और चोट की सही स्थिति का पता लगाने के लिए अल्ट्रासाउंड, सीटी स्कैन सहित विभिन्न जांचों की महत्वपूर्ण भूमिका है। गंभीर चोट या बीमारी में सही निदान के लिए जांच आवश्यक भी हो सकती है। सवाल जांच कराने का नहीं, बल्कि इमरजेंसी में मरीज को आवश्यक प्राथमिक उपचार उपलब्ध कराने और उसकी स्थिति स्थिर करने के साथ जांच प्रक्रिया आगे बढ़ाने का है।
मरीजों और उनके परिजनों के बीच चिकित्सकों के व्यवहार को लेकर भी असंतोष सामने आता रहा है। अस्पताल में इलाज के दौरान संवाद की कमी कई बार विवाद का कारण बन जाती है। चिकित्सक और मरीज के बीच विश्वास चिकित्सा व्यवस्था की महत्वपूर्ण कड़ी है। यही विश्वास कमजोर होने पर छोटी बात भी विवाद का रूप ले सकती है और कई बार चिकित्सकों तथा परिजनों के बीच नोकझोंक और मारपीट तक की घटनाएं सामने आती हैं।
सरकारी अस्पताल में पहुंचने वाला मरीज बेहतर इलाज के साथ चिकित्सक से संवेदनशील व्यवहार की भी उम्मीद करता है। बीमारी या दुर्घटना से परेशान परिवार को यदि उपचार की प्रक्रिया, आवश्यक जांच और मरीज की स्थिति के बारे में स्पष्ट जानकारी नहीं मिलती है तो उसकी बेचैनी और बढ़ती है। ऐसे में चिकित्सकों और मरीजों के परिजनों के बीच बेहतर संवाद की जरूरत भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
इलाज शुरू होने में देरी महसूस होने या व्यवस्था से असंतुष्ट होने के कारण कुछ मरीजों के परिजन निजी अस्पतालों का रुख भी करते हैं। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए यह अतिरिक्त बोझ बनता है। सरकारी मेडिकल कॉलेज अस्पतालों पर लोगों का भरोसा बनाए रखने के लिए जरूरी है कि संसाधनों और सीटों की बढ़ोतरी के साथ उपचार की गुणवत्ता और मरीजों के प्रति संवेदनशीलता पर भी उतना ही ध्यान दिया जाए।
एसकेएमसीएच के उपाधीक्षक डॉ. सतीश कुमार सिंह ने स्पष्ट किया कि अस्पताल पहुंचने वाले मरीज का इलाज करना चिकित्सक का पहला कर्तव्य है। मरीज की स्थिति सामान्य होने के बाद ही आवश्यक जांच कराई जानी चाहिए। उन्होंने बताया कि इस संबंध में पहले भी सभी चिकित्सकों को पत्र के माध्यम से निर्देश दिया जा चुका है।
उपाधीक्षक के अनुसार इस व्यवस्था का पालन सुनिश्चित कराने के लिए सभी चिकित्सकों को एक बार फिर पत्र जारी किया जाएगा। अस्पताल प्रशासन का यह निर्देश महत्वपूर्ण है, क्योंकि इमरजेंसी में पहुंचने वाले मरीज के लिए जांच जितनी जरूरी है, उससे पहले उसकी तत्काल चिकित्सा आवश्यकता का आकलन और आवश्यक उपचार भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
एसकेएमसीएच में एमबीबीएस की सीटों का 120 से बढ़कर 150 होना चिकित्सा शिक्षा के विस्तार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। लेकिन मेडिकल कॉलेज की सफलता केवल सीट, डॉक्टर और संसाधनों की संख्या से नहीं आंकी जा सकती। उसकी असली कसौटी मरीज को समय पर मिलने वाला उपचार, चिकित्सक का व्यवहार और अस्पताल से निकलते समय मरीज तथा उसके परिजनों का व्यवस्था पर कायम भरोसा है।
