छात्र आंदोलन, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शासन की भूमिका पर उठे गंभीर प्रश्न


नई दिल्ली : महाभारत सिर्फ कुरुक्षेत्र में तीर और तलवारों से नहीं लड़ा गया था। महाभारत की नींव उस दिन रख दी गई थी जिस दिन हस्तिनापुर की सभा में सवालों पर मौन धारण कर लिया गया था। जिस दिन राजधर्म को भूलकर सत्ता को धर्म से बड़ा मान लिया गया था। जिस दिन द्रौपदी का चीर खींचते समय भीष्म, द्रोण और विदुर चुप रहे थे। महाभारत हक और न्याय के लिए हुआ था, लेकिन उसकी असली वजह यह थी कि सत्ता ने अपने कर्तव्य को तिलांजलि दे दी थी और न्याय के विरुद्ध युद्ध चुन लिया था।

इतिहास गवाह है। दुनिया में जब भी सत्ता ने सवालों को लाठी से जवाब देना शुरू किया है, उसकी नियति बुरी ही हुई है। दिल्ली की सड़कों पर 20 जुलाई 2026 को जो हुआ उसने 5 जून 1975 की याद ताजा कर दी। फर्क सिर्फ इतना है कि 1975 में आपातकाल की घोषणा हुई थी और 2026 में लोकतंत्र के नाम पर आपातकाल जैसी तस्वीरें सामने आईं।

जंतर मंतर से संसद तक का रास्ता और लाठियों का जवाब

20 जुलाई की सुबह दिल्ली के जंतर मंतर पर देश भर से आए छात्र और छात्राएं इकट्ठा थे। उनकी मांग कोई सत्ता परिवर्तन की नहीं थी। न प्रधानमंत्री के खिलाफ कोई नारेबाजी थी। उनकी मांग सिर्फ इतनी थी कि NEET और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में हुए पेपर लीक पर जवाब मिले। शिक्षा मंत्री से संवाद हो। उनके भविष्य से खिलवाड़ बंद हो।

वह शांतिपूर्ण प्रदर्शन था। हाथों में तख्तियां थीं, नारों में संविधान का जिक्र था। लेकिन दोपहर होते दिल्ली पुलिस ने बैरिकेडिंग बढ़ा दी। प्रदर्शनकारियों को संसद की तरफ बढ़ने से रोका गया। जब छात्र पीछे नहीं हटे तो लाठियां चलनी शुरू हो गईं। 

सबसे ज्यादा दर्दनाक तस्वीरें छात्राओं की आईं। बिना वर्दी के कुछ लोगों को पुलिस के साथ देखा गया। उनके हाथों में लाठी थी और उन्होंने चुन कर छात्रों के सिर, पीठ और सीने पर वार किया। कैमरे के सामने एक छात्रा को बालों से घसीट कर ले जाया गया। दूसरी छात्रा जमीन पर गिरी थी और उसके ऊपर डंडे बरस रहे थे। यह तस्वीरें गोदी मीडिया में दब गईं लेकिन सोशल मीडिया पर आग की तरह फैल गईं। 

एक दिन पहले गांधीवादी कार्यकर्ता और पर्यावरणविद सोनम वांगचुक जंतर मंतर पर अनशन पर बैठे थे। वह छात्रों की मांग के समर्थन में थे। पुलिस उन्हें अपराधियों की तरह उठाकर ले गई। अस्पताल ले जाते समय भी उनके साथ जो व्यवहार हुआ वह लोकतंत्र के माथे पर कलंक है। गांधी के देश में गांधीवादी तरीके से अनशन करने वाले के साथ गुंडागर्दी। यह देखकर युवाओं के मन में जो आक्रोश पैदा हुआ वही 20 जुलाई को सड़क पर उतरा।

सवाल सिर्फ पेपर लीक का नहीं था

इस आंदोलन को सत्ता विरोधी आंदोलन बताकर खारिज करने की कोशिश हुई। लेकिन सच यह है कि यह किसी व्यक्ति के खिलाफ नहीं था। यह व्यवस्था के खिलाफ था। 

NEET का पेपर लीक हुआ। देश भर के 24 लाख बच्चों का भविष्य दांव पर लग गया। जांच के नाम पर लीपापोती हुई। दोषियों को सजा नहीं मिली। केंद्रीय शिक्षा मंत्री ने संसद में बयान दिया और मामला ठंडा कर दिया गया। छात्र चाहते थे कि मंत्री सामने आएं और बताएं कि अगली परीक्षा में पारदर्शिता कैसे होगी। दोषी अफसरों पर क्या कार्रवाई होगी। 

क्या यह पूछना गुनाह है। क्या भारत का संविधान अनुच्छेद 19 में दिए गए अभिव्यक्ति और शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार को रद्द कर चुका है। क्या न्याय मांगना अब देशद्रोह हो गया है। अगर हां, तो फिर संविधान की किताब को अलमारी में रख देना चाहिए।

पटना से दिल्ली तक का कनेक्शन

बिहार के लोग इस तस्वीर को अच्छे से समझते हैं। 1974 में जयप्रकाश नारायण ने पटना की सड़कों से भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन शुरू किया था। तब भी छात्रों को लाठियां खानी पड़ी थीं। तब भी सरकार ने कहा था कि यह साजिश है। लेकिन अंत में क्या हुआ, पूरा देश जानता है।

इतिहास अपने को दोहराता है। जब सत्ता को लगता है कि वह सवालों का जवाब नहीं दे सकती तो वह डंडे का सहारा लेती है। 1975 में आपातकाल लगा। 2026 में आपातकाल नहीं लगा लेकिन जंतर मंतर पर आपातकाल जैसी तस्वीरें आ गईं। 

दर्द सिर्फ उन छात्रों का नहीं है जिनकी पीठ पर डंडे पड़े। दर्द उन माता पिता का है जिन्होंने कर्ज लेकर बच्चों को कोचिंग में भेजा। दर्द उस समाज का है जो देख रहा है कि पढ़ लिख कर सवाल पूछने वाले बच्चों को अपराधी की तरह पीटा जा रहा है।

मीडिया की चुप्पी और सोशल मीडिया का शोर

इस घटना के बाद देश के बड़े अखबारों और टीवी चैनलों में यह खबर दबे शब्दों में आई। कारण बताया गया "ट्रैफिक बाधित करना" और "कानून व्यवस्था"। लेकिन उसी समय सोशल मीडिया पर छात्रों के घायल होने के वीडियो, अस्पताल के बिल और माता पिता के बयान वायरल हो रहे थे। 

आज के समय में सच्चाई को ज्यादा देर तक दबाया नहीं जा सकता। एक मोबाइल और इंटरनेट है। दिल्ली की एक गली की घटना 10 मिनट में कश्मीर से कन्याकुमारी तक पहुंच जाती है। सरकार और मीडिया इसे जितना दबाएंगे, आक्रोश उतना ही बढ़ेगा। यह चिंगारी जिस दिन गांव तक पहुंचेगी, उस दिन परिणाम बहुत खतरनाक होंगे।

गांधी के देश में गांधी के खिलाफ

सबसे बड़ा सवाल नैतिकता का है। यह वही देश है जहां महात्मा गांधी ने सत्याग्रह और अनशन को हथियार बनाया था। उसी गांधी की मूर्ति के सामने सोनम वांगचुक अनशन कर रहे थे। उन्हें उठाकर ले जाया गया। 

छात्र संवाद मांग रहे थे। सरकार ने संवाद की जगह लाठी दी। छात्र न्याय मांग रहे थे। सरकार ने न्याय की जगह बर्बरता दी। यह संदेश साफ है कि अब सत्ता सवाल सुनने के मूड में नहीं है। उसे लगता है कि सवाल पूछने वाला ही दुश्मन है।

लेकिन सत्ता भूल जाती है कि डंडे से विचार नहीं मारा जाता। डंडे से गुस्सा पैदा होता है। और गुस्सा जब जमा होता है तो वह क्रांति बन जाता है।

आगे का रास्ता

सरकार के पास अभी भी समय है। अकड़ छोड़कर छात्रों से बात करनी चाहिए। NEET की पूरी जांच CBI से नहीं, सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में होनी चाहिए। शिक्षा मंत्री को इस्तीफा देना चाहिए या फिर छात्रों के सामने आकर जवाब देना चाहिए। 

दिल्ली पुलिस के उन अधिकारियों पर कार्रवाई होनी चाहिए जिन्होंने बिना वर्दी के लोगों को लाठी चलाने की इजाजत दी। छात्राओं के साथ अभद्रता करने वालों को बर्खास्त किया जाना चाहिए। 

अगर ऐसा नहीं हुआ तो 20 जुलाई सिर्फ एक तारीख नहीं रहेगी। यह एक आंदोलन की शुरुआत बन जाएगी। क्योंकि युवा बेरोजगार है, हताश है और अब डर भी खत्म हो गया है।

अंत में

महाभारत हमें यही सिखाता है। जब सभा में सवालों पर मौन हो जाए, जब धर्म के नाम पर अधर्म हो जाए, जब कर्तव्य को भूलकर सत्ता को बचाना लक्ष्य बन जाए तो युद्ध अवश्यंभावी हो जाता है।

आज दिल्ली की सड़कों पर वही हो रहा है। सत्ता मौन है। सवाल लाठी खा रहे हैं। और शेष लोग अभी देख रहे हैं। लेकिन अब इस घटना से आहत लोग कब तक खुद को रोक सकेंगे यह कहना कठिन है।

इतिहास इस घटना को जरूर याद रखेगा। क्योंकि यह सिर्फ 20 जुलाई 2026 की घटना नहीं थी। यह इस बात का सबूत था कि एक लोकतंत्र अपने ही बच्चों से कितना डर गया है और जब लोकतंत्र अपने बच्चों से डरने लगे, तो समझ लीजिए कि तख्त हिल चुका है।