मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग के बीच पूर्व आईएएस-आईएफएस अधिकारियों ने जारी किया खुला पत्र

नई दिल्ली : देश में चुनाव आयोग की निष्पक्षता को लेकर छिड़ी बहस अब दो अलग-अलग मोर्चों पर दिखाई दे रही है। एक तरफ मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने की मांग को लेकर विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं तो दूसरी तरफ देश के 124 पूर्व आईएएस, आईएफएस और संबद्ध सेवाओं के अधिकारियों के समूह ने चुनाव आयोग के समर्थन में खुला पत्र जारी किया है। पूर्व अधिकारियों ने चुनावी धांधली के आरोप लगाने वालों से ठोस सबूत पेश करने की मांग की है। उनका कहना है कि बिना प्रमाण चुनावी प्रक्रिया को बार-बार संदिग्ध बताने से लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति जनता का भरोसा कमजोर होता है।

‘भारत के नागरिकों के नाम खुला पत्र’ में पूर्व अधिकारियों ने कहा है कि उन्होंने अपने सेवाकाल में मतदाता सूची तैयार करने, मतदान दलों को प्रशिक्षित करने, स्ट्रांग रूम की निगरानी और मतगणना जैसी जिम्मेदारियां निभाई हैं। वे किसी राजनीतिक दल से जुड़े होने का दावा नहीं करते और चुनावी व्यवस्था को लेकर अपने अनुभवों के आधार पर यह पत्र लिख रहे हैं।

पत्र में पुराने दौर की बूथ कैप्चरिंग, मतपेटियों की लूट और मतदाताओं को मतदान से रोकने जैसी घटनाओं का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि चुनावी व्यवस्था में व्यापक बदलाव आया है। पूर्व अधिकारियों ने दावा किया कि बिहार का 2025 विधानसभा चुनाव बिना किसी पुनर्मतदान के संपन्न हुआ। उनके अनुसार, राज्य में मतदान प्रतिशत ऐतिहासिक स्तर पर पहुंचा और महिलाओं ने रिकॉर्ड संख्या में मतदान किया।

अधिकारियों ने इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों की सीलिंग, प्रत्याशियों के एजेंटों की मौजूदगी, स्ट्रांग रूम की निगरानी और वीवीपैट पर्चियों के मिलान जैसी व्यवस्थाओं का हवाला देकर चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली का बचाव किया। उनका तर्क है कि बड़े पैमाने पर चुनावी धांधली के लिए बड़ी संख्या में अधिकारियों और विभिन्न दलों के प्रतिनिधियों की मिलीभगत जरूरी होगी।

बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) का समर्थन करते हुए पत्र में दावा किया गया कि इस प्रक्रिया में लगभग 22 लाख मृत मतदाताओं और सात लाख दोहरी प्रविष्टियों की पहचान हुई। बड़ी संख्या में स्थायी रूप से दूसरे स्थानों पर जा चुके मतदाताओं के नाम भी सामने आए। वहीं, करीब 21.5 लाख नए मतदाताओं को सूची में शामिल किया गया।

पूर्व अधिकारियों ने कहा कि मतदाता सूची से नाम हटाने की प्रक्रिया में नोटिस, सुनवाई और अपील के प्रावधान मौजूद हैं। उन्होंने एसआईआर से संबंधित सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों का उल्लेख करते हुए कहा कि त्रुटियों को सुधारना जरूरी है, लेकिन पूरी प्रक्रिया को बिना प्रमाण अवैध बताना उचित नहीं है।

पत्र में यह सवाल भी उठाया गया कि एक ही चुनाव आयोग के कार्यकाल में केंद्र की सत्तारूढ़ पार्टी कई राज्यों में चुनाव हार चुकी है। ऐसे में जीत मिलने पर चुनाव को निष्पक्ष और हार होने पर धांधलीपूर्ण बताना तर्कसंगत नहीं है।

पूर्व अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठाना प्रत्येक नागरिक का अधिकार है, लेकिन आरोपों को प्रमाणित करने की जिम्मेदारी भी आरोप लगाने वाले की है। उन्होंने नागरिकों से मतदाता सूची में अपने नाम की जांच करने और नाम छूटने पर निर्धारित प्रक्रिया के तहत दावा प्रस्तुत करने की अपील की।