डॉ. संजय पंकज बोले, रश्मिरथी सामाजिक चेतना और मानवीय मूल्यों का अमर महाकाव्य है
मुंबई : राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर स्मृति न्यास, दिल्ली के तत्वावधान में आयोजित रश्मिरथी पर्व अभियान के अंतर्गत मुंबई के रवींद्र नाट्य मंदिर में भव्य साहित्यिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम में रश्मिरथी पर संवाद, सुख्यात रंगनिर्देशक मुजीब खान के निर्देशन में रश्मिरथी का प्रभावशाली नाट्य मंचन, सुप्रसिद्ध चित्रकार मनजीत सिंह की रश्मिरथी पर आधारित चित्र प्रदर्शनी तथा रश्मिरथी से संवाद स्मारिका का लोकार्पण किया गया। इसके साथ ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मन की बात, भारतीय संस्कृति, शौर्य, पराक्रम, सनातन और अध्यात्म जैसे गौरवशाली विषयों पर आधारित चित्र प्रदर्शनी भी आकर्षण का प्रमुख केंद्र रही।
दिनकर स्मृति न्यास के ऊर्जावान अध्यक्ष नीरज कुमार के संकल्प से प्रारंभ हुआ यह अभियान उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की गरिमामयी उपस्थिति तथा मंत्रिमंडल के सहयोगियों के साथ लखनऊ से आरंभ हुआ था। कई राज्यों में सफल आयोजन के बाद यह अभियान मुंबई पहुंचा है, जबकि 23 जुलाई को लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक की जन्मभूमि रत्नागिरी में इसका आयोजन प्रस्तावित है। आयोजन के दौरान यह भाव भी मुखर हुआ कि सच्चे राष्ट्र-साधकों की दीप्ति ही देश की दिव्यता और भव्यता है।
कार्यक्रम के केंद्रीय विषय प्रकाश और प्रेरणा का पुंज रश्मिरथी पर विस्तार से अपने विचार रखते हुए प्रख्यात कवि एवं साहित्यकार डॉ. संजय पंकज ने कहा कि रश्मिरथी राष्ट्रकवि दिनकर की सामाजिक चेतना, मानवीय संवेदना और रचनात्मक सृजनशीलता का उत्कर्ष है। यह हिंदी साहित्य की अत्यंत लोकप्रिय और कालजयी काव्यकृति है, जिसमें सत्ता के अहंकार, समाज के पाखंड और समय के संक्रमण पर करारा प्रहार किया गया है।
उन्होंने कहा कि अन्याय का विवेकपूर्ण प्रतिकार, प्रतिभा का यथोचित सम्मान, जातिवाद का विखंडन, सत्ता का समावेशी विकास और समरस समाज का निर्माण रश्मिरथी का मूल ध्येय है। यह कृति सामाजिक रूढ़ियों, नैतिक जड़ताओं और राजशाही व्यवस्थाओं की विकृतियों को उजागर करने वाला आलोक सृजन है।
संघर्षशील और दलित युवाओं के मनोबल को मजबूत करने वाली यह उत्कृष्ट रचना रूढ़िबद्ध सामाजिक मान्यताओं और निरंकुश राजसत्ता के छल-छद्म को तोड़ते हुए शील, शौर्य, प्रतिभा, प्रेम और पराक्रम जैसे जीवन मूल्यों को प्रतिष्ठित करती है। भारतीय दर्शन और साहित्य की यह अनमोल कृति आज भी समाज को नई दिशा और नई चेतना प्रदान करती है।
डॉ. संजय पंकज ने अपने उद्बोधन में मराठी साहित्य के सुप्रसिद्ध उपन्यासकार शिवाजी सावंत का भी उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि जब शिवाजी सावंत कर्ण के जीवन पर आधारित अपने प्रसिद्ध उपन्यास मृत्युंजय की रचना कर रहे थे, तब उन्होंने उसे अधिक प्रामाणिक और तर्कसंगत बनाने के लिए राष्ट्रकवि दिनकर से रश्मिरथी पर संवाद किया था। उन्होंने रश्मिरथी को सराहनीय और प्रेरक कृति बताया था। यह प्रसंग हिंदी और मराठी साहित्य की दो महान कृतियों के वैचारिक संबंध का भी सशक्त उदाहरण है।
भारत सरकार के पूर्व मंत्री अश्विनी कुमार चौबे ने रश्मिरथी को राष्ट्रकवि दिनकर की प्रतिभा का अनुपम सृजन बताते हुए कहा कि इसके प्रत्येक सर्ग में जीवनोपयोगी सूक्तियों की भरमार है। उन्होंने कहा कि यह महाकाव्य केवल साहित्य नहीं, बल्कि जीवन जीने की प्रेरणा देने वाला ग्रंथ है, जो प्रत्येक पीढ़ी को राष्ट्रभक्ति, स्वाभिमान और मानवीय मूल्यों का संदेश देता है।
मुजीब खान के निर्देशन में प्रस्तुत रश्मिरथी के नाट्य मंचन ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। कलाकारों के सशक्त अभिनय, ओजस्वी संवादों और प्रभावशाली प्रस्तुति ने पूरे प्रेक्षागृह को बार-बार तालियों की गड़गड़ाहट से गुंजायमान कर दिया। कर्ण का संघर्ष, उसका स्वाभिमान, दानवीरता और सामाजिक उपेक्षा की पीड़ा मंच पर इतनी सजीवता से उभरी कि दर्शक भावनात्मक रूप से उससे जुड़ गए।
कार्यक्रम में राष्ट्रकवि दिनकर के पौत्र ऋत्विक उदयन, पुत्रवधू कल्पना सिंह तथा नाती गौतम सहित बड़ी संख्या में साहित्यकार, कलाकार, बुद्धिजीवी और संस्कृति प्रेमी उपस्थित रहे। पूरे आयोजन ने यह संदेश दिया कि साहित्य केवल समाज का दर्पण नहीं होता, बल्कि वह राष्ट्र की चेतना को आलोकित करने और आने वाली पीढ़ियों को संस्कार, स्वाभिमान तथा मानवीय मूल्यों से जोड़ने का सबसे सशक्त माध्यम भी है।