कभी अंधेरी रातों में जहाजों को रास्ता दिखाते थे लाइटहाउस, अब इतिहास और आधुनिक तकनीक के साथ पर्यटकों को भी आकर्षित कर रहे हैं
नई दिल्ली : समुद्र में चारों तरफ अंधेरा हो, ऊंची लहरें उठ रही हों और जहाज को किनारे तक पहुंचने का रास्ता दिखाई न दे तो दूर से चमकती एक रोशनी कितनी बड़ी राहत देती होगी। कभी समुद्री यात्रियों के लिए यही रोशनी जीवन और मौत के बीच का अंतर बन जाती थी। समुद्र किनारे खड़े ऊंचे प्रकाश स्तंभ, जिन्हें लाइटहाउस कहा जाता है, सदियों से जहाजों को सुरक्षित रास्ता दिखाते रहे हैं। समय बदला, समुद्री यात्रा के साधन बदले और तकनीक भी बदल गई, लेकिन इनकी उपयोगिता समाप्त नहीं हुई। अब भारत में इन पुराने प्रकाश स्तंभों को एक नई पहचान दी जा रही है। जहाजों को रास्ता दिखाने के साथ ये लोगों को समुद्री इतिहास से परिचित करा रहे हैं और पर्यटन के नए केंद्र बन रहे हैं।
भारत की समुद्री तटरेखा 11 हजार किलोमीटर से अधिक लंबी है। देश में कुल 205 लाइटहाउस हैं। इनमें से 75 को पर्यटन स्थलों के रूप में विकसित किया जा चुका है। कभी जिन लाइटहाउसों को लोग दूर से देखकर आगे बढ़ जाते थे, अब वहां रुककर समुद्र का नजारा देखने, इतिहास जानने और परिवार के साथ समय बिताने की सुविधाएं मिल रही हैं। कई स्थानों पर संग्रहालय, बगीचे, घूमने के रास्ते और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए स्थान बनाए गए हैं।
इस बदलाव का असर पर्यटकों की संख्या पर भी दिखाई देने लगा है। वर्ष 2014 में लगभग चार लाख लोग लाइटहाउस देखने पहुंचे थे। वर्ष 2024-25 में यह संख्या बढ़कर 18.63 लाख हो गई। यानी दस वर्षों में पर्यटकों की संख्या चार गुने से भी अधिक हो गई। यह केवल पर्यटन की बढ़ती लोकप्रियता नहीं, बल्कि पुरानी धरोहरों को नए तरीके से उपयोगी बनाने की एक मिसाल भी है।
गुजरात के मांडवी और द्वारका, कर्नाटक के तादरी, तमिलनाडु के पंबन और केरल के विझिनजम जैसे लाइटहाउस अब पर्यटकों को आकर्षित कर रहे हैं। टिकट लेने की सुविधा भी आसान बनाई गई है। इसके लिए ऑनलाइन व्यवस्था शुरू की गई है, ताकि पर्यटक बिना अनावश्यक परेशानी के अपनी यात्रा की योजना बना सकें।
इस पहल का लाभ केवल घूमने आने वालों तक सीमित नहीं है। जब किसी लाइटहाउस पर पर्यटकों की संख्या बढ़ती है, तो आसपास के छोटे कारोबार भी आगे बढ़ते हैं। होटल, रेस्तरां, चाय-नाश्ते की दुकानें, वाहन चालक, स्थानीय दुकानदार और हस्तशिल्प से जुड़े लोगों की आमदनी बढ़ने की संभावनाएं बनती हैं। इस तरह समुद्र किनारे खड़ा एक पुराना प्रकाश स्तंभ स्थानीय लोगों के लिए रोजगार का नया रास्ता भी खोल सकता है।
लाइटहाउसों की कहानी में सबसे दिलचस्प बदलाव उनकी रोशनी का है। एक समय समुद्र में जहाजों को दिशा दिखाने के लिए लकड़ी जलाकर आग की जाती थी। बाद में तेल के दीपकों और विशेष लैंप का इस्तेमाल होने लगा। आज उनकी जगह आधुनिक एलईडी लाइटों ने ले ली है। पीआईबी के अनुसार, देश के सभी लाइटहाउसों की प्रकाश व्यवस्था में सौर ऊर्जा का उपयोग किया जा रहा है। इससे बिजली पर निर्भरता कम हुई है और पर्यावरण के अनुकूल तकनीक को बढ़ावा मिला है।
गुजरात के सामियानी द्वीप पर पुराने तेल के दीपक की जगह पहले सौर ऊर्जा से चलने वाली आधुनिक लाइट लगाई गई। वर्ष 2016 में वहां एलईडी प्रकाश व्यवस्था शुरू हुई। इसी तरह जोड़िया लाइटहाउस की रोशनी को 2021 में और बेहतर बनाया गया। अब समुद्री सुरक्षा के लिए केवल दूर तक चमकने वाली रोशनी ही नहीं, बल्कि जहाजों की पहचान और उनकी स्थिति की जानकारी देने वाली तकनीक भी इस्तेमाल हो रही है।
देश के तटीय लाइटहाउसों पर 87 स्वचालित पहचान प्रणाली केंद्र लगाए गए हैं। आसान भाषा में समझें तो ये ऐसी व्यवस्था है, जिसके जरिए जहाज और तट पर मौजूद केंद्र एक-दूसरे को जरूरी जानकारी भेज सकते हैं। इससे जहाजों की आवाजाही पर नजर रखने और समुद्री दुर्घटनाओं का खतरा कम करने में मदद मिलती है।
भारत इन प्रकाश स्तंभों के इतिहास को भी सहेज रहा है। चेन्नई, महाबलीपुरम, अलाप्पुझा, कन्नूर, मुट्टोम, द्वारका और गोपनाथ में लाइटहाउस संग्रहालय बनाए गए हैं। यहां पुराने उपकरणों, तस्वीरों और ऐतिहासिक वस्तुओं के जरिए बताया जाता है कि समुद्री यात्राएं पहले कितनी कठिन होती थीं और नाविक किस तरह सुरक्षित रास्ता तलाशते थे।
मिलनाडु का महाबलीपुरम इस इतिहास का महत्वपूर्ण उदाहरण है। सातवीं शताब्दी में यह समुद्री व्यापार का प्रमुख केंद्र था। यहां से दक्षिण-पूर्व एशिया और भूमध्यसागर के देशों के साथ व्यापार होता था। उस दौर में समुद्र की ओर आने वाले जहाजों को दिशा दिखाने के लिए लकड़ी जलाकर रोशनी की जाती थी।
वर्ष 1887 में यहां एक मंदिर की छत पर पारंपरिक लाइटहाउस बनाया गया था। बाद में पत्थरों से बना 26 मीटर ऊंचा प्रकाश स्तंभ इसकी पहचान बना। वर्ष 2020 में इसकी मुख्य रोशनी को 236 वाट की आधुनिक एलईडी प्रणाली से बेहतर बनाया गया। आज यहां आने वाले लोग एक ही स्थान पर सदियों पुराना समुद्री इतिहास और आधुनिक तकनीक का मेल देख सकते हैं।
इससे भी बड़ी पहल गुजरात के लोथल में हो रही है। लोथल भारत की प्राचीन समुद्री व्यापार परंपरा से जुड़ा ऐतिहासिक स्थल है। यहां राष्ट्रीय समुद्री विरासत परिसर बनाया जा रहा है, जिसमें 77 मीटर ऊंचा लाइटहाउस संग्रहालय बनाने की योजना है। इसे दुनिया के सबसे ऊंचे लाइटहाउस संग्रहालय के रूप में विकसित करने का लक्ष्य रखा गया है। इसकी अनुमानित लागत 266.11 करोड़ रुपये है।
इस संग्रहालय की खासियत केवल इसकी ऊंचाई नहीं होगी। यहां आधुनिक तकनीक के जरिए पर्यटकों को ऐसा अनुभव देने की तैयारी है, मानो वे स्वयं पुराने समय की समुद्री यात्रा कर रहे हों। विशेष चश्मों और डिजिटल दृश्यों की मदद से भारत के विभिन्न लाइटहाउसों का इतिहास दिखाया जाएगा। पांच आयामों वाला थिएटर, रोशनी और आवाज के विशेष कार्यक्रम तथा समुद्री इतिहास से जुड़ी प्रदर्शनियां भी आकर्षण का हिस्सा होंगी।
लोथल में समुद्री अनुसंधान से जुड़ी सुविधाएं भी विकसित करने की योजना है। इसका उद्देश्य भारत की पांच हजार वर्ष से अधिक पुरानी समुद्री विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाना है। विशाखापत्तनम में भी पुराने लाइटहाउस क्षेत्र की 3,156 वर्ग मीटर भूमि पर नया संग्रहालय बनाने की योजना है।
लाइटहाउसों को लोगों से जोड़ने के लिए महोत्सवों की शुरुआत भी की गई है। पहला भारतीय लाइटहाउस महोत्सव 2023 में गोवा के फोर्ट अगुआडा में आयोजित हुआ था। दूसरा महोत्सव 2024 में ओडिशा के पुरी में और तीसरा 2026 में विशाखापत्तनम में आयोजित किया गया।
इन आयोजनों में केवल लाइटहाउसों का इतिहास नहीं बताया गया, बल्कि संगीत, लोकनृत्य, स्थानीय खानपान, हस्तशिल्प और सांस्कृतिक कार्यक्रमों को भी जगह मिली। पुरी के आयोजन में ओडिशा के गोपालपुर, पुरी, चंद्रभागा, पारादीप और फॉल्स पॉइंट लाइटहाउसों को प्रमुखता से प्रस्तुत किया गया। तटीय क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को इन ऐतिहासिक स्थलों के संरक्षण और पर्यटन गतिविधियों से जोड़ने की योजना भी सामने आई।
गोवा के अगुआडा लाइटहाउस पर रोशनी और आवाज के जरिए इतिहास दिखाने की आधुनिक व्यवस्था शुरू की गई है। रात के समय पुराने प्रकाश स्तंभ पर उभरते दृश्य पर्यटकों को उसकी कहानी से परिचित कराते हैं। इस तरह इतिहास को केवल पढ़ने के बजाय देखने और महसूस करने का अवसर मिलता है।
सरकार की योजना अब 25 और लाइटहाउसों को पर्यटन स्थलों के रूप में विकसित करने की है। लेकिन इस बदलाव की सबसे खास बात यह है कि लाइटहाउस अब समुद्र तटों से आगे नदियों तक पहुंच रहे हैं।
असम में ब्रह्मपुत्र नदी के किनारे पांडु, बोगीबील, सिलघाट और विश्वनाथ घाट पर चार लाइटहाउस बनाए जा रहे हैं। यह देश के अंतर्देशीय जलमार्गों पर अपनी तरह की पहली लाइटहाउस परियोजना होगी। लगभग 84 करोड़ रुपये की लागत से बनने वाले इन प्रकाश स्तंभों की ऊंचाई 20 मीटर होगी। इनमें सौर ऊर्जा और मौसम की जानकारी देने वाले उपकरण लगाए जाएंगे।
इन स्थानों पर संग्रहालय, खुले मंच, कैफेटेरिया, बच्चों के खेलने की जगह, स्थानीय वस्तुओं की दुकानें और सुंदर सार्वजनिक स्थल विकसित करने की भी योजना है। इसका मतलब है कि नदी में चलने वाले जहाजों को सुरक्षित रास्ता दिखाने के साथ ये स्थान आसपास के लोगों और पर्यटकों के लिए घूमने-फिरने के केंद्र भी बनेंगे।
हालांकि, इस विकास के साथ कुछ जिम्मेदारियां भी जुड़ी हैं। पर्यटन बढ़ने पर ऐतिहासिक इमारतों की सुरक्षा, समुद्र तटों की सफाई और पर्यावरण संरक्षण पर विशेष ध्यान देना होगा। स्थानीय समुदायों की भागीदारी भी जरूरी है। यदि आसपास रहने वाले लोगों को रोजगार और पर्यटन से होने वाली आय का लाभ मिलेगा, तो वे इन धरोहरों के संरक्षण में भी अधिक रुचि लेंगे।
भारत के लाइटहाउसों की बदलती कहानी हमें यह समझाती है कि पुरानी धरोहरें केवल अतीत की यादगार नहीं होतीं। सही देखभाल और नई सोच के साथ वे वर्तमान की जरूरतें भी पूरी कर सकती हैं। जो प्रकाश स्तंभ कभी समुद्र में भटके जहाजों को किनारे तक पहुंचाते थे, वे आज लोगों को इतिहास से जोड़ने और स्थानीय अर्थव्यवस्था को नई दिशा देने का माध्यम बन रहे हैं।
जरूरत इस बात की है कि पर्यटन की चमक में लाइटहाउसों का मूल उद्देश्य पीछे न छूटे। समुद्री सुरक्षा उनकी पहली जिम्मेदारी थी और आगे भी बनी रहनी चाहिए। यदि सुरक्षा, विरासत और पर्यटन के बीच संतुलन बनाए रखा गया, तो समुद्र के ये पुराने पहरेदार आने वाली पीढ़ियों के लिए भी रोशनी फैलाते रहेंगे।
