✍️प्रभात कुमार✍️
आजादी की लड़ाई में अलग-अलग वैचारिक धाराओं की भूमिका आज भी राजनीतिक बहस का हिस्सा।
भारत के स्वतंत्रता संग्राम को जब हम याद करते हैं तो हमारे सामने महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल, भगत सिंह, सुभाषचंद्र बोस और लाखों ज्ञात-अज्ञात स्वतंत्रता सेनानियों की तस्वीर उभरती है। लेकिन इस व्यापक राष्ट्रीय आंदोलन के समानांतर कुछ ऐसी वैचारिक धाराएं भी सक्रिय थीं, जिनकी स्वतंत्रता, राष्ट्र और समाज को लेकर अपनी अलग समझ थी। इनमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और हिंदू महासभा भी शामिल थे। आज जब भारतीय जनता पार्टी केंद्र की सत्ता में है, तब यह सवाल फिर उठता है कि स्वतंत्रता संग्राम में इन संगठनों की भूमिका क्या थी, उनकी प्रत्यक्ष भागीदारी और कुर्बानियों का इतिहास क्या कहता है, राष्ट्रीय प्रतीकों को लेकर उनका दृष्टिकोण कैसा रहा और संविधान के कुछ पहलुओं को लेकर उनकी शुरुआती असहमति के पीछे क्या कारण थे।
स्वतंत्रता संग्राम में भूमिका
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना 1925 में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने नागपुर में की थी। संघ ने अपने उद्देश्य के केंद्र में चरित्र निर्माण, संगठन और राष्ट्र सेवा को रखा। उसका मानना था कि संगठित और चरित्रवान समाज के बिना राजनीतिक स्वतंत्रता को स्थायी आधार नहीं मिल सकता। इसी सोच के कारण संघ ने संगठन के रूप में कांग्रेस के नेतृत्व वाले आंदोलनों में प्रत्यक्ष भागीदारी नहीं की।
1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान भी संघ संगठन के रूप में आंदोलन में शामिल नहीं हुआ। संघ की प्राथमिकता अपने संगठनात्मक और सामाजिक कार्यों को जारी रखने की रही। हालांकि संघ से जुड़े कुछ व्यक्तियों की स्वतंत्रता आंदोलन में व्यक्तिगत भागीदारी को लेकर अलग-अलग ऐतिहासिक संदर्भ मिलते हैं।
हिंदू महासभा की स्थापना बीसवीं सदी के शुरुआती दशकों में हुई और विनायक दामोदर सावरकर 1937 में इसके अध्यक्ष बने। महासभा की राजनीति में हिंदू राष्ट्रवाद प्रमुख वैचारिक आधार था। महासभा ने भी कांग्रेस के असहयोग और सविनय अवज्ञा जैसे आंदोलनों से संगठनात्मक दूरी बनाए रखी। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान सावरकर ने हिंदुओं से ब्रिटिश भारतीय सेना में भर्ती होने की अपील की। इसके पीछे उनका तर्क था कि सैन्य प्रशिक्षण भविष्य में राष्ट्र के लिए उपयोगी सिद्ध हो सकता है।
इन्हीं कारणों से कांग्रेस, समाजवादी और वामपंथी धाराओं की ओर से संघ और हिंदू महासभा पर स्वतंत्रता आंदोलन में पर्याप्त प्रत्यक्ष भागीदारी नहीं करने के आरोप लगाए जाते रहे हैं। दूसरी ओर, संघ और हिंदू महासभा से जुड़े विचारक अपने सामाजिक-सांस्कृतिक कार्यों और हिंदू समाज के संगठन को राष्ट्र निर्माण में योगदान के रूप में प्रस्तुत करते रहे हैं।
ऐतिहासिक अभिलेखों में संगठन के रूप में संघ या हिंदू महासभा की सामूहिक कुर्बानियों का विवरण कांग्रेस, क्रांतिकारी संगठनों और समाजवादी आंदोलन की तुलना में सीमित दिखाई देता है। हालांकि व्यक्तिगत स्तर पर इनसे जुड़े कुछ लोगों की भूमिका को इससे अलग करके देखने की आवश्यकता है।
राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान को लेकर वैचारिक बहस
स्वतंत्रता के आसपास के दौर में तिरंगे और अन्य राष्ट्रीय प्रतीकों को लेकर भी वैचारिक बहस हुई। संघ की परंपरा में भगवा ध्वज को भारतीय संस्कृति और सभ्यता का महत्वपूर्ण प्रतीक माना गया। यही कारण था कि लंबे समय तक संघ के कार्यक्रमों में भगवा ध्वज का विशेष स्थान रहा।
तिरंगे को लेकर संघ के शुरुआती वैचारिक साहित्य और प्रकाशनों में आलोचनात्मक टिप्पणियां भी सामने आई थीं। इसी तरह जन-गण-मन की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को लेकर भी देश में लंबे समय तक बहस होती रही। हालांकि बाद के दशकों में संघ ने तिरंगे को राष्ट्रीय ध्वज के रूप में स्वीकार करने और उसके सम्मान के प्रति अपनी प्रतिबद्धता स्पष्ट रूप से व्यक्त की।
आज परिस्थितियां काफी बदल चुकी हैं। भाजपा सरकार ने हर घर तिरंगा जैसे व्यापक अभियान चलाए हैं और संघ से जुड़े संगठन भी स्वतंत्रता दिवस तथा गणतंत्र दिवस पर राष्ट्रीय ध्वज से जुड़े कार्यक्रम आयोजित करते हैं। आलोचक इस बदलाव को संघ की पुरानी और वर्तमान राजनीति के बीच अंतर के रूप में देखते हैं, जबकि समर्थक इसे समय के साथ विकसित हुए संगठनात्मक दृष्टिकोण और राष्ट्रीय सहमति के स्वीकार के रूप में प्रस्तुत करते हैं।
इस बदलाव की चाहे जैसी व्याख्या की जाए, इतना स्पष्ट है कि तिरंगा आज भारतीय गणराज्य की सबसे व्यापक साझा पहचान और राष्ट्रीय एकता का प्रतीक है। राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय किसी भी दल या संगठन के लिए उसका सम्मान निर्विवाद संवैधानिक और राष्ट्रीय दायित्व है।
संविधान को लेकर शुरुआती असहमति
26 नवंबर 1949 को संविधान सभा ने भारत के संविधान को अंगीकार किया। उस दौर में संघ से जुड़े कुछ प्रकाशनों और हिंदू राष्ट्रवादी विचारकों ने संविधान के स्वरूप की आलोचना की थी। उनकी एक प्रमुख आपत्ति यह थी कि संविधान निर्माण में पश्चिमी संवैधानिक व्यवस्थाओं से अनेक तत्व लिए गए, जबकि उनके अनुसार प्राचीन भारतीय राजनीतिक और सामाजिक परंपराओं को अपेक्षित स्थान नहीं मिला।
संविधान को लेकर उनकी असहमति के पीछे राष्ट्र की प्रकृति, नागरिक अधिकारों, कर्तव्यों, समान नागरिक संहिता और भारतीय सांस्कृतिक परंपराओं की भूमिका जैसे प्रश्न प्रमुख रहे। हिंदू राष्ट्र की अवधारणा और संविधान द्वारा विकसित नागरिक राष्ट्रवाद के बीच वैचारिक अंतर भी इस बहस के केंद्र में रहा।
यहां एक ऐतिहासिक तथ्य ध्यान में रखना जरूरी है कि संविधान की प्रस्तावना में धर्मनिरपेक्ष और समाजवादी शब्द मूल रूप से 1950 में लागू संविधान का हिस्सा नहीं थे। इन्हें 1976 में 42वें संविधान संशोधन के माध्यम से प्रस्तावना में जोड़ा गया। हालांकि संविधान के विभिन्न मूल प्रावधानों में धार्मिक स्वतंत्रता, समानता और राज्य द्वारा धर्म के आधार पर भेदभाव न करने के सिद्धांत शुरुआत से मौजूद रहे।
समय के साथ जनसंघ से लेकर भाजपा तक संविधान के प्रति राजनीतिक दृष्टिकोण में भी महत्वपूर्ण परिवर्तन आया। आज भाजपा स्वयं को संविधान के दायरे में काम करने वाली लोकतांत्रिक पार्टी के रूप में प्रस्तुत करती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी संविधान को सार्वजनिक रूप से अत्यंत सम्माननीय और शासन का आधार बताते रहे हैं।
दूसरी ओर समान नागरिक संहिता, अनुच्छेद 370 के प्रावधानों में बदलाव और शिक्षा व्यवस्था में भारतीय ज्ञान परंपरा को अधिक स्थान देने जैसे कदम भाजपा और संघ के पुराने वैचारिक आग्रहों से भी जुड़े दिखाई देते हैं। समर्थक इन्हें लंबे समय से लंबित सुधार मानते हैं, जबकि आलोचक इनके सामाजिक और संवैधानिक प्रभावों पर सवाल उठाते हैं।
आज सरकार देश को किस दिशा में ले जाना चाहती है?
आज की भाजपा सरकार अपने राजनीतिक और विकास संबंधी विमर्श को नये भारत की अवधारणा से जोड़ती है। इसमें सांस्कृतिक विरासत और राष्ट्रीय गौरव को प्रमुख स्थान दिया गया है। अयोध्या में राम मंदिर, काशी विश्वनाथ धाम का पुनर्विकास, आदिवासी गौरव दिवस और नेताजी सुभाषचंद्र बोस से जुड़े स्मारकीय प्रयास इसी व्यापक राजनीतिक-सांस्कृतिक विमर्श का हिस्सा हैं।
दूसरी ओर मेक इन इंडिया, डिजिटल इंडिया, स्टार्टअप इंडिया और आत्मनिर्भर भारत जैसी योजनाओं के माध्यम से आर्थिक और तकनीकी आत्मनिर्भरता पर जोर दिया गया है। राष्ट्रीय सुरक्षा, सीमा सुरक्षा और आतंकवाद के प्रति कठोर नीति को भी सरकार अपने राष्ट्रवादी राजनीतिक दृष्टिकोण का महत्वपूर्ण हिस्सा बताती है।
संघ और भाजपा इस व्यापक सोच को सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के रूप में प्रस्तुत करते हैं। इस विचार के समर्थकों का मानना है कि राजनीतिक स्वतंत्रता के बाद अब भारत अपनी सांस्कृतिक पहचान को अधिक मजबूती से स्थापित कर रहा है। इसके विपरीत आलोचकों की चिंता है कि सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का अत्यधिक राजनीतिक प्रयोग संविधान में निहित बहुलतावाद, समान नागरिकता और धर्मनिरपेक्ष शासन व्यवस्था को प्रभावित कर सकता है।यही वह बिंदु है जहां वर्तमान भारत की सबसे महत्वपूर्ण वैचारिक बहस खड़ी दिखाई देती है।
क्या संविधान से असहमति रखना गलत है
भारत एक लोकतांत्रिक गणराज्य है। लोकतंत्र में किसी कानून, नीति या संवैधानिक प्रावधान की आलोचना करने और उसमें बदलाव की मांग करने का अधिकार नागरिकों तथा राजनीतिक दलों को है। संविधान स्वयं अनुच्छेद 368 के माध्यम से संशोधन की प्रक्रिया निर्धारित करता है। इसलिए संविधान के किसी प्रावधान से असहमति रखना अपने आप में असंवैधानिक नहीं है।लेकिन असहमति और संविधान को अस्वीकार करने के बीच महत्वपूर्ण अंतर है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में सत्ता संभालने वाला प्रत्येक दल संविधान के प्रति निष्ठा की शपथ के आधार पर शासन करता है। इसलिए उससे अपेक्षा होती है कि वह संविधान और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा मान्यता प्राप्त उसके मूल ढांचे का सम्मान करे।
संविधान में संशोधन संभव है, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय के केशवानंद भारती मामले से विकसित मूल ढांचा सिद्धांत संसद की संशोधन शक्ति पर भी संवैधानिक सीमा निर्धारित करता है। लोकतंत्र, न्यायिक समीक्षा, संघीय व्यवस्था, धर्मनिरपेक्षता और संविधान की सर्वोच्चता जैसे सिद्धांत इसी व्यापक संवैधानिक व्यवस्था से जुड़े हैं।
इतिहास हमें बताता है कि भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसकी विविधता और संवाद की परंपरा है। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान भी गंभीर वैचारिक मतभेद थे और स्वतंत्र भारत में भी राजनीतिक असहमतियां बनी रहीं। लेकिन लोकतांत्रिक भारत को एक सूत्र में बांधने वाली सबसे महत्वपूर्ण संस्थागत शक्ति उसका संविधान है।
अतीत पर सवाल उठाना इतिहास को समझने के लिए आवश्यक है। वर्तमान सरकार की नीतियों की आलोचना या समर्थन करना लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा है। लेकिन भविष्य का भारत तभी मजबूत होगा जब राजनीतिक और वैचारिक संघर्ष संविधान की मर्यादा के भीतर लड़ा जाए।
विचार अलग हो सकते हैं, इतिहास की व्याख्याएं अलग हो सकती हैं और सत्ता बदल सकती है, लेकिन लोकतांत्रिक गणराज्य की अंतिम कसौटी संविधान ही रहेगा।संघर्ष विचारों का हो सकता है, लेकिन देश संविधान से ही चलेगा। यही भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति है।

