नई दिल्ली में आयोजित सम्मेलन में उपराष्ट्रपति ने विज्ञान और परंपरा के संतुलन पर जोर दिया, विकसित भारत के विजन में जनजातीय क्षेत्रों की बड़ी भूमिका पर बल दिया गया
नई दिल्ली : भारत मंडपम में आयोजित एक महत्वपूर्ण सम्मेलन ने यह स्पष्ट संदेश दिया कि विकास और परंपरा एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं। कार्यक्रम का उद्घाटन करते हुए उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन ने कहा कि जब विज्ञान और प्रौद्योगिकी को भाषा, आस्था और संस्कृति के साथ जोड़ा जाता है, तो यह न केवल विकास को गति देता है बल्कि समाज को मजबूत भी बनाता है।
यह सम्मेलन विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा उत्तर पूर्वी प्रौद्योगिकी अनुप्रयोग एवं प्रसार केंद्र और आईटीआईटीआई दून संस्कृति स्कूल के सहयोग से आयोजित किया गया। इसमें जनजातीय जीवन में वैज्ञानिक उपायों के जरिए बदलाव और उनकी सांस्कृतिक पहचान को संरक्षित रखने के उपायों पर विस्तार से चर्चा हुई।
अपने संबोधन में उपराष्ट्रपति ने जनजातीय समुदायों की भूमिका को बेहद महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि देश के लाखों जनजातीय गांवों में रहने वाले लोग केवल समाज का हिस्सा नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक विरासत और जैव विविधता के संरक्षक हैं। सदियों से इन समुदायों ने अपने पारंपरिक ज्ञान और जीवनशैली के जरिए प्राकृतिक संसाधनों का संतुलित उपयोग किया है और यही ज्ञान आज भी प्रासंगिक है।
उन्होंने यह भी कहा कि जनजातीय क्षेत्रों में हरित आर्थिक विकास की अपार संभावनाएं हैं। इन समुदायों की पारंपरिक कला, वस्त्र निर्माण और रंग संयोजन की दक्षता को नई पहचान देने की जरूरत है, ताकि यह कौशल आधुनिक बाजार से जुड़कर उनके जीवन स्तर को बेहतर बना सके।
विकसित भारत 2047 के लक्ष्य का उल्लेख करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि देश का मार्गदर्शक सिद्धांत विकास भी और विरासत भी है। उनका मानना है कि आधुनिक तकनीक और पारंपरिक मूल्यों के बीच संतुलन बनाकर ही देश समावेशी विकास की दिशा में आगे बढ़ सकता है।
उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन के अनुभव साझा करते हुए कहा कि अलग-अलग राज्यों के गठन से जनजातीय समुदायों को मुख्यधारा से जोड़ने में मदद मिली है। साथ ही उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा जनजातीय कार्य मंत्रालय की स्थापना को एक ऐतिहासिक कदम बताया, जिसने इन समुदायों के अधिकार और सम्मान को मजबूत किया।
कार्यक्रम के दौरान उन्होंने भगवान बिरसा मुंडा के योगदान को भी याद किया और कहा कि जनजातीय स्वतंत्रता सेनानियों को राष्ट्रीय चेतना में प्रमुख स्थान मिलना चाहिए। उन्होंने इस दिशा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रयासों की सराहना की।
सरकार की विभिन्न योजनाओं का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि जनजातीय क्षेत्रों में सड़क, पुल, शिक्षा, स्वास्थ्य और आजीविका से जुड़ी सुविधाओं को तेजी से बढ़ाया जा रहा है। हजारों गांवों में बुनियादी सुविधाएं पहुंचाने का काम जारी है, जिससे इन इलाकों में विकास की नई राह खुल रही है।
उत्तर पूर्व क्षेत्र में बुनियादी ढांचे और संपर्क व्यवस्था में हुए सुधार का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि सरकार समावेशी विकास के लिए प्रतिबद्ध है और जनजातीय क्षेत्रों को इस प्रक्रिया का केंद्र बनाया जा रहा है।
सम्मेलन में अन्य गणमान्य लोगों की उपस्थिति ने इस विषय की गंभीरता और महत्व को और स्पष्ट कर दिया। यह आयोजन न केवल विचारों का मंच बना, बल्कि इस बात का संकेत भी दिया कि आने वाले समय में विज्ञान, संस्कृति और परंपरा के समन्वय से ही जनजातीय जीवन में वास्तविक बदलाव संभव है।
