विपक्ष बिखरा, मोदी के सामने मजबूत चेहरा अब भी गाय, स्थानीय मुद्दों से ऊपर उठा चुनाव, राष्ट्रीय नेतृत्व बना निर्णायक
एनके मिश्रा, नई दिल्ली
2026 में हुए पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों ने एक बार फिर यह साफ कर दिया है कि भारतीय राजनीति में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का प्रभाव अब भी निर्णायक बना हुआ है। आम तौर पर राज्य चुनावों को स्थानीय मुद्दों और क्षेत्रीय नेताओं के इर्द-गिर्द देखा जाता रहा है, लेकिन इस बार तस्वीर बिल्कुल अलग नजर आई। इन चुनावों में प्रधानमंत्री मोदी ने ‘विकसित भारत’ के अपने विजन को केंद्र में रखकर चुनावी नैरेटिव को पूरी तरह बदल दिया और इसे केवल राज्य की सत्ता का नहीं, बल्कि देश के भविष्य का चुनाव बना दिया।
इस रणनीति का सबसे बड़ा फायदा भारतीय जनता पार्टी को यह हुआ कि जिन राज्यों में सरकार के खिलाफ नाराजगी थी, वहां भी एंटी-इन्कंबेंसी का असर काफी हद तक कम हो गया। मतदाताओं ने स्थानीय असंतोष को नजरअंदाज करते हुए राष्ट्रीय नेतृत्व पर भरोसा जताया। साफ शब्दों में कहें तो ‘मोदी फैक्टर’ भाजपा के लिए ढाल की तरह काम कर रहा है, जो हर चुनाव में पार्टी को संभावित नुकसान से बचाता है और नए इलाकों में भी जमीन तैयार करता है।
4 मई को आए नतीजों ने इस बात को और मजबूत किया। भाजपा ने असम और पुडुचेरी में अपनी सत्ता बरकरार रखी, जबकि पश्चिम बंगाल में उसने ऐतिहासिक बढ़त के साथ 15 साल से सत्ता में मौजूद ममता बनर्जी को सत्ता से बाहर कर दिया। यह सिर्फ एक चुनावी जीत नहीं, बल्कि उस धारणा का अंत है कि मजबूत क्षेत्रीय नेता ही अपने राज्य में अजेय होते हैं। ममता बनर्जी, जिन्हें कभी विपक्ष का संभावित प्रधानमंत्री चेहरा माना जाता था, वह अपने ही गढ़ में अपनी राजनीतिक पकड़ नहीं बचा सकीं।
चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने लगातार यह संदेश दिया कि मजबूत केंद्र और स्थिर राज्य ही विकास की गारंटी दे सकते हैं। ‘डबल इंजन’ की इसी सोच को उन्होंने हर राज्य में आक्रामक तरीके से आगे बढ़ाया। नतीजा यह हुआ कि चुनाव स्थानीय मुद्दों से हटकर राष्ट्रीय नेतृत्व बनाम बिखरे हुए क्षेत्रीय विकल्प के बीच की लड़ाई बन गया।
भाजपा की एक और बड़ी उपलब्धि यह रही कि उसने भाषाई और क्षेत्रीय सीमाओं को भी चुनौती दी। पुडुचेरी में सत्ता बचाना इस बात का संकेत है कि पार्टी दक्षिण भारत में अपनी पकड़ मजबूत कर रही है। केरल जैसे राज्यों में भी, जहां लंबे समय से वामपंथी राजनीति हावी रही है, वहां युवा वर्ग में बदलाव की चाह दिखाई दे रही है और भाजपा धीरे-धीरे अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही है।
तमिलनाडु में तो स्थिति और दिलचस्प रही, जहां जनता ने पारंपरिक राजनीतिक ताकतों को किनारे कर एक नई पार्टी को मौका दिया। डीएमके के नेतृत्व वाली सरकार को सत्ता से बाहर कर दिया गया और महज कुछ साल पुरानी पार्टी को मजबूत विकल्प के तौर पर सामने लाया गया। यह संकेत है कि दक्षिण भारत का मतदाता अब पुराने समीकरणों से आगे बढ़कर नए विकल्प तलाश रहा है।
अगर विपक्ष की बात करें तो उसकी स्थिति इन चुनावों के बाद और कमजोर होती नजर आ रही है। ममता बनर्जी का कद कम हुआ है, वहीं राहुल गांधी अब भी राष्ट्रीय स्तर पर एक ठोस विकल्प के रूप में स्थापित नहीं हो पाए हैं। केरल में कांग्रेस को मिली जीत को भी पूरी तरह राहुल गांधी की उपलब्धि नहीं कहा जा सकता, क्योंकि वहां की जीत कई स्थानीय कारणों और नेताओं के सामूहिक प्रयास का नतीजा है।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या विपक्ष के पास कोई ऐसा चेहरा है, जो प्रधानमंत्री मोदी के सामने राष्ट्रीय स्तर पर भरोसेमंद विकल्प बन सके। फिलहाल इसका जवाब न में ही दिखाई देता है। विपक्ष के पास न तो स्पष्ट नेतृत्व है और न ही एकजुट रणनीति, जिससे वह भाजपा के मुकाबले खड़ा हो सके।
इन चुनावी नतीजों का असर आने वाले समय में और साफ दिखाई देगा। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव और 2029 के लोकसभा चुनाव के लिए यह परिणाम एक ट्रेंड सेट कर रहे हैं। भाजपा अब भी चुनाव को स्थानीय मुद्दों से ऊपर उठाकर ‘मजबूत नेतृत्व बनाम अस्थिर विकल्प’ की लड़ाई में बदलने में सफल हो रही है।
2029 के चुनाव की दिशा भी इन नतीजों से तय होती नजर आ रही है। जब तक विपक्ष एक मजबूत, विश्वसनीय और सर्वमान्य चेहरा सामने नहीं लाता, तब तक भाजपा के लिए चुनौती सीमित ही रहने वाली है। प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता और उनका राष्ट्रीय नैरेटिव फिलहाल भारतीय राजनीति में सबसे बड़ा फैक्टर बना हुआ है, जिसे नजरअंदाज करना किसी भी विपक्षी दल के लिए आसान नहीं होगा।