पूर्वी चंपारण : गांधी जयंती पर देश ने एक बार फिर महात्मा गांधी को याद किया। उनके सत्य, अहिंसा और स्वच्छता के संदेशों की चर्चा हुई, लेकिन गांधी को केवल एक दिन याद करने से आगे बढ़कर उन स्थानों को भी देखना जरूरी है, जहां उनके विचार आंदोलन बनकर जमीन पर उतरे। बिहार का चंपारण ऐसी ही धरती है। यहां किसानों की कराह ने मोहनदास करमचंद गांधी को उस संघर्ष से जोड़ा, जिसने आगे चलकर भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को नई दिशा दी। इस कहानी के केंद्र में एक ऐसा किसान था, जिसने गांधी तक चंपारण की पीड़ा पहुंचाने की ठान ली थी—पंडित राजकुमार शुक्ल।
किसानों की पुकार और राजकुमार शुक्ल की पहल पर गांधी 15 अप्रैल 1917 को चंपारण पहुंचे। यहां उन्होंने किसानों के बीच जाकर उनकी समस्याएं देखीं और उनकी पीड़ा सुनी। इसके बाद 18 अप्रैल 1917 को चंपारण की धरती से आंदोलन का शंखनाद हुआ। यह केवल नील की खेती के खिलाफ संघर्ष नहीं था, बल्कि वर्षों से अन्याय सह रहे किसानों के भीतर अपने अधिकार के लिए खड़े होने का साहस पैदा करने वाला आंदोलन था।
नील की नीली चमक के पीछे किसानों का दर्द
चंपारण में नील की खेती का इतिहास काफी पुराना था। 1813 में कर्नल हिक ने बारा में पहला नील उद्योग स्थापित किया था। इसके उत्प्रेरक फ्रैंकौस ग्रेड थे, जो 1782 से 1785 तक तिरहुत के कलक्टर रहे। 1892-97 के एक सर्वेक्षण के अनुसार चंपारण जिले में 21 से अधिक नील कारखाने थे। इनके 48 बाहरी केंद्र और 3300 घोषित मजदूर थे। 1899 तक चंपारण के लगभग आधे भाग पर निलहों का मालिकाना या दरमियारी हक कायम हो चुका था।
किसानों की मुश्किल तब और बढ़ी जब 1900 में तीनकठिया प्रणाली लागू की गई। इसके तहत किसानों के लिए एक बीघा जमीन में तीन कट्ठा पर नील की खेती करना अनिवार्य कर दिया गया। इसके अलावा चालीस से अधिक तरह के कर उन पर जबरन लादे जाते थे। किसानों और रैयतों ने अपनी फरियाद रखी, लेकिन उनकी सुनवाई नहीं हुई। धीरे-धीरे दबा हुआ असंतोष आक्रोश में बदलने लगा।
1907 में ढाका थाने के तेलहारा में निलहा कोठी के मैनेजर ब्लूम फील्ड की हत्या के साथ किसानों का आक्रोश खुलकर सामने आया। उसी वर्ष बेतिया के साठी में शेख गुलाब के नेतृत्व में सभाएं हुईं और किसानों ने नील की खेती करने से इनकार कर दिया। वर्ष 1908 में शीतल राय की अगुआई में बेतिया मेले में तीनकठिया व्यवस्था के खिलाफ किसानों ने निर्णय लिया। किसान संगठित हुए और परसा, मलहिया, बैरिया तथा कुंडिया में आंदोलन तेज हो गया।
किसानों के खिलाफ फौजदारी मुकदमे दर्ज कर उन्हें प्रताड़ित किया गया। 226 किसानों को दोषी करार दिया गया और आंदोलन वाले इलाके से 30 हजार रुपये दंड के रूप में वसूले गए। हर तरफ निलहों के जुल्म-ओ-सितम, उत्पीड़न, अपमान और अनाचार से किसान त्रस्त थे। उन्हें इस व्यवस्था से मुक्ति दिलाने के संघर्ष को गांधी के चंपारण पहुंचने के बाद नई ताकत और दिशा मिली।
आंदोलन के साथ शिक्षा की लौ भी जलाई
गांधी की दृष्टि केवल किसानों को तत्काल राहत दिलाने तक सीमित नहीं थी। चंपारण सत्याग्रह के दौरान गरीब और प्रताड़ित जनता में जो निर्भयता पैदा हो रही थी, उसे कायम रखने के लिए उन्होंने शिक्षा को जरूरी माना। इसी सोच के साथ चंपारण में तीन बुनियादी विद्यालय स्थापित किए गए।
पहला विद्यालय ढाका के बड़हरवा लखनसेन में 14 नवंबर 1917 को खुला। इसके छह दिन बाद 20 नवंबर को पश्चिम चंपारण के भितिहरवा में दूसरे बुनियादी विद्यालय की नींव पड़ी। तीसरा विद्यालय मधुबन में 17 जनवरी 1918 को खोला गया। गांधी ने अपनी आत्मकथा में भी इस तथ्य का उल्लेख किया कि निर्भयता के लिए चंपारण के लोगों का शिक्षित होना जरूरी है।
आजादी के बाद कुछ वर्षों तक इन विद्यालयों की स्थिति ठीक रही, लेकिन बाद में स्थिति खराब होती गई। सत्याग्रह शताब्दी वर्ष में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने तीनों विद्यालयों के कायाकल्प के लिए तीस-तीस लाख रुपये की राशि दी।
गांधी के आईने में आज का चंपारण
चंपारण के लोगों में आज भी बापू के प्रति अपार प्रेम दिखाई देता है। इसके बावजूद एक सवाल सामने खड़ा है—जिस धरती को गांधी ने अपने संघर्ष और प्रयोग की भूमि बनाया, वहां उनके सपने अब तक पूरी तरह हकीकत क्यों नहीं बन सके?
चंपारण में आज भी पूर्ण स्वच्छता का लक्ष्य हासिल नहीं हो सका है और शिक्षण व्यवस्था को अपेक्षित रूप से सुदृढ़ करने की चुनौती बनी हुई है। गरीबी और अशिक्षा की समस्याओं से जूझते इस इलाके ने एक दौर में नक्सल प्रभाव भी देखा। गांधी जिस शिक्षा, स्वच्छता, आत्मसम्मान और निर्भयता की नींव मजबूत करना चाहते थे, उस दिशा में अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है।
हालांकि चंपारण की तस्वीर अब बदल भी रही है। यहां के कई युवा वैज्ञानिक बनकर दुनिया में नाम रोशन कर रहे हैं और नई पीढ़ी अलग-अलग क्षेत्रों में अपनी पहचान बना रही है। आने वाले समय में यह बदलाव और तेज हो सकता है। चंपारण की ऐतिहासिक विरासत को सही ढंग से सहेजा जाए तो दुनिया भर के लोग यहां आकर बापू के संदेश, उनके सत्याग्रह और किसानों के ऐतिहासिक संघर्ष को और करीब से जान और समझ सकेंगे।
