जल बजट के आधार पर बनेगी रबी की फसल योजना, कम पानी वाले क्षेत्रों पर विशेष जोर।चना, मसूर और सरसों का रकबा बढ़ाकर दलहन-तिलहन में आत्मनिर्भरता की तैयारी

नई दिल्ली : खेत में कौन सी फसल बोई जाए, अब इसका फैसला केवल परंपरा से नहीं, बल्कि उपलब्ध पानी, मिट्टी की नमी और मौसम की स्थिति देखकर करना होगा। रबी की बुवाई के मुहाने पर खड़े देश के लिए केंद्र ने राज्यों को यही संदेश दिया है। केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने सोमवार को दिल्ली में दो दिवसीय ‘राष्ट्रीय कृषि सम्मेलन–रबी अभियान 2026’ का शुभारंभ करते हुए कहा कि जलवायु परिवर्तन, अनिश्चित बारिश और पानी की कमी के बीच वैज्ञानिक और आंकड़ा आधारित योजना से ही उत्पादन-उत्पादकता बढ़ाने और किसानों की आय में वृद्धि का लक्ष्य हासिल किया जा सकता है।

पूसा स्थित भारत रत्न सी. सुब्रमण्यम सभागार में आयोजित सम्मेलन में केंद्रीय कृषि राज्य मंत्री रामनाथ ठाकुर और भागीरथ चौधरी, कृषि सचिव अतीश चंद्रा, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के महानिदेशक डॉ. एमएल जाट सहित केंद्र और राज्यों के वरिष्ठ अधिकारी, कृषि विश्वविद्यालयों के कुलपति, वैज्ञानिक और अन्य प्रतिनिधि शामिल हुए।

पानी के हिसाब से बने फसल की योजना

कृषि मंत्री ने राज्यों से ‘जल बजट’ तैयार करने पर विचार करने को कहा। इसके तहत राज्य और जिले आकलन करें कि रबी के दौरान सिंचाई के लिए कितना पानी उपलब्ध रहेगा और मिट्टी में कितनी नमी है। जहां पानी कम है, वहां दलहन और तिलहन जैसी कम पानी वाली फसलों को प्राथमिकता देने और पर्याप्त सिंचाई वाले क्षेत्रों के लिए अलग योजना बनाने को कहा गया। देर से बुवाई होने पर अंकुरण और उत्पादन प्रभावित होने की आशंका को देखते हुए समय पर तैयारी पूरी करने पर जोर दिया गया।

महाराष्ट्र-कर्नाटक में जाएगी केंद्रीय टीम

चौहान ने महाराष्ट्र और कर्नाटक में सूखे की स्थिति पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि महाराष्ट्र में लगभग दो-तिहाई इलाके प्रभावित हैं और वहां राज्य स्तर पर सूखा घोषित किया जा चुका है। कर्नाटक में भी सूखे की स्थिति बनी हुई है। तीन अक्टूबर को केंद्रीय टीम कर्नाटक में जमीनी स्थिति का आकलन करेगी और महाराष्ट्र में भी टीम भेजी जाएगी। कृषि मंत्री स्वयं भी प्रभावित राज्यों का दौरा करेंगे। महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश जैसे प्रभावित क्षेत्रों में पानी और मिट्टी की नमी के आधार पर फसल चुनने की सलाह दी गई है।

सही बीज समय पर किसानों तक पहुंचे

रबी की तैयारी में बीज को सबसे महत्वपूर्ण कड़ी बताते हुए राज्यों से अभी तय करने को कहा गया कि किस इलाके के लिए कौन सी किस्म उपयुक्त है। बीज की मांग, उठाव, मिनी किट और वितरण का पूरा खाका पहले तैयार करने पर जोर दिया गया। कई बार उपयोगी बीज किसानों तक पहुंचने से पहले बुवाई पूरी हो जाती है और वह सामान्य अनाज के भाव बिक जाता है। वैज्ञानिकों और कृषि विज्ञान केंद्रों की मदद से किसानों तक सही किस्म पहुंचाने को कहा गया।

दलहन-तिलहन का रकबा बढ़ाने की तैयारी

धान की कटाई के बाद खाली रहने वाले खेतों में चना, मसूर और सरसों सहित दलहन-तिलहन की खेती बढ़ाने पर विशेष जोर दिया गया। राज्यों से इन फसलों के लिए रकबा और उत्पादन लक्ष्य तय करने को कहा गया है। इसके साथ खरीद की व्यवस्था पहले से सुनिश्चित करने पर जोर दिया गया, ताकि किसानों को उपज बेचने की चिंता न रहे।

मूल्य समर्थन योजना के तहत दलहन और तिलहन की खरीद के लिए बड़े पैमाने पर प्रस्ताव मंजूर किए गए हैं। राज्य समय पर खरीद नहीं करते हैं तो नेफेड और एनसीसीएफ जैसी केंद्रीय एजेंसियां किसानों से सीधे खरीद कर सकती हैं। इसके लिए राज्यों को मंडी टैक्स में छूट सहित जरूरी व्यवस्था समय पर करनी होगी।

रबी में भी चलेगा ‘खेत बचाओ अभियान’

उर्वरकों के संतुलित इस्तेमाल पर भी सम्मेलन में जोर दिया गया। चौहान ने कहा कि यदि एक बोरी खाद से काम हो सकता है तो दो बोरी डालने की जरूरत नहीं है। इससे लागत बढ़ने के साथ मिट्टी भी प्रभावित होती है। खरीफ में चलाए गए ‘खेत बचाओ अभियान’ को रबी में भी चलाने की सलाह दी गई। खाद के भंडारण से लेकर वितरण तक ऐसी व्यवस्था बनाने को कहा गया, जिससे कालाबाजारी रोकी जा सके और किसानों को समय पर खाद मिले।

फार्मर आईडी के आधार पर प्रत्येक राज्य के दो-दो जिलों में खाद वितरण का पायलट किया गया था। इसके अनुभव के आधार पर व्यवस्था को मजबूत करने पर जोर दिया गया। केंद्र सरकार उर्वरक सब्सिडी पर करीब दो लाख करोड़ रुपये खर्च कर रही है, इसलिए किसानों को संतुलित उर्वरक इस्तेमाल के लिए जागरूक करने को कहा गया।

प्राकृतिक खेती को बाजार से जोड़ने पर जोर

प्राकृतिक खेती के लिए किसानों का पंजीकरण बढ़ने के बाद अब इसके उत्पादों की ब्रांडिंग, मार्केटिंग और प्रमाणन पर ध्यान देने को कहा गया है। आंध्र प्रदेश, गुजरात और हिमाचल प्रदेश के उदाहरण देते हुए राज्यों से प्राकृतिक उत्पादों की अलग पहचान बनाने की दिशा में काम करने का आग्रह किया गया, ताकि किसानों को बेहतर बाजार और कीमत मिल सके।

किसान क्रेडिट कार्ड और फार्मर आईडी को गति

कृषि मंत्री ने बताया कि प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि से करीब 9.54 करोड़ किसान परिवार जुड़े हैं, लेकिन छोटे और सीमांत किसानों में किसान क्रेडिट कार्ड की पहुंच अभी बढ़ाने की जरूरत है। राज्यों से बैंक स्तर पर ऋण मिलने में आ रही दिक्कतों की पहचान करने को कहा गया। फार्मर आईडी और एग्रीस्टैक का काम भी तेजी से पूरा करने पर जोर दिया गया, ताकि सरकारी योजनाओं का लाभ सीधे किसानों तक पहुंच सके।

हर सप्ताह फसल से बाजार तक समीक्षा

राज्यों को हर सप्ताह बुवाई, अंकुरण, फसल की स्थिति, रोगों के प्रकोप और बाजार भाव की समीक्षा करने को कहा गया। वास्तविक समय के आंकड़ों के आधार पर निगरानी बढ़ाने पर जोर दिया गया, ताकि समस्या सामने आते ही उसका समाधान किया जा सके।

कृषि सचिव अतीश चंद्रा ने कृषि विविधीकरण, सतत खेती, मृदा स्वास्थ्य, सिंचाई, आधुनिक कृषि ढांचे और डिजिटल कृषि समाधान को किसानों तक पहुंचाने पर जोर दिया। आईसीएआर महानिदेशक डॉ. एमएल जाट ने बताया कि आगामी सीजन में छह राज्यों के 37 जिलों में 10 हजार एकड़ क्षेत्र में ग्रीन अमोनिया का बड़े स्तर पर प्रदर्शन करने की योजना है।

सम्मेलन के पहले दिन आत्मनिर्भरता और फसल विविधीकरण, जलवायु-अनुकूल एवं सतत कृषि तथा डिजिटल कृषि, बुनियादी ढांचा, वित्तपोषण और जोखिम प्रबंधन पर विषयगत चर्चा रखी गई है। दूसरे दिन 29 सितंबर को राज्यों के कृषि मंत्रियों के साथ विस्तृत मंथन होगा। मौसम पूर्वानुमान, उर्वरक उपलब्धता, डिजिटल कृषि मिशन, किसान रजिस्ट्री, दलहन और खाद्य तेल मिशन, पीएम धन-धान्य कृषि योजना, विपणन सुधार और एटीएमए-केवीके के जरिए योजनाओं के क्रियान्वयन पर चर्चा होगी। इसके आधार पर रबी अभियान 2026 के लिए केंद्र और राज्यों की समन्वित कार्ययोजना तैयार की जाएगी।