सत्र 2026-28 से लागू होगा नया पाठ्यक्रम, एक विषय के रूप में बज्जिका साहित्य पढ़ेंगे छात्र
मुजफ्फरपुर : शहर की चर्चित लेखिका डॉ. भावना का बज्जिका उपन्यास ‘लाडो’ बीआरए बिहार विश्वविद्यालय के भोजपुरी के एमए पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है। क्षेत्रीय भाषा के एक विषय के रूप में छात्र ‘लाडो’ उपन्यास का अध्ययन करेंगे। यह पहली बार है जब बज्जिका की किसी पुस्तक को भोजपुरी के एमए पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है। इससे पहले अन्य क्षेत्रीय भाषाओं के रूप में अवधी, मगही और अंगिका की कहानियां पाठ्यक्रम में शामिल थीं।
भोजपुरी विभाग के विभागाध्यक्ष और नए पाठ्यक्रम के समन्वयक डॉ. जयकांत सिंह ने बताया कि एमए का नया पाठ्यक्रम तैयार हो चुका है। इसमें एक विषय के रूप में डॉ. भावना के बज्जिका उपन्यास ‘लाडो’ को शामिल किया गया है। सत्र 2026-28 से छात्र नए पाठ्यक्रम के अनुसार एमए की पढ़ाई करेंगे। इससे पहले डॉ. भावना की गजलें उत्तर महाराष्ट्र विश्वविद्यालय, जलगांव के एमए हिंदी पाठ्यक्रम में शामिल हो चुकी हैं।
गजल, कविता और आलोचना की 26 पुस्तकें प्रकाशित
डॉ. भावना समकालीन हिंदी गजल, कविता, आलोचना और बज्जिका साहित्य की प्रमुख रचनाकार हैं। अब तक उनकी 26 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। उनके चर्चित गजल संग्रहों में ‘अक्स कोई तुम-सा’, ‘शब्दों की कीमत’, ‘चुप्पियों के बीच’, ‘धुंध में धूप’ और ‘चिड़ियों की दावेदारी’ शामिल हैं। आलोचना, बज्जिका साहित्य और संपादन के क्षेत्र में भी उनका उल्लेखनीय योगदान रहा है। वह हिंदी की ई-साहित्यिक मासिक पत्रिका ‘आंच’ का संपादन भी कर रही हैं।
अक्टूबर में मिलेगा नंदलाल पाठक साहित्य पुरस्कार
डॉ. भावना को वर्ष 2026 के लिए साहित्यायन फाउंडेशन, मुंबई का नंदलाल पाठक साहित्य पुरस्कार प्रदान किया जाएगा। यह सम्मान 17 अक्टूबर को मुंबई स्थित आदित्य बिड़ला परफॉर्मिंग आर्ट्स एकेडमी में आयोजित समारोह में दिया जाएगा। पुरस्कार के तहत उन्हें ढाई लाख रुपये की सम्मान राशि, सम्मान-पत्र और स्मृति-चिह्न प्रदान किया जाएगा। फाउंडेशन ने साहित्य में उत्कृष्ट योगदान, साहित्यिक साधना और उल्लेखनीय उपलब्धियों के आधार पर उनका चयन किया है।
इससे पहले उन्हें बिहार सरकार के महादेवी वर्मा पुरस्कार सहित अंबिका प्रसाद दिव्य अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार, राजभाषा पांडुलिपि पुरस्कार, दुष्यंत कुमार रजत स्मृति सम्मान, अपराजिता सम्मान, लिच्छवी महोत्सव सम्मान, तिलकामांझी राष्ट्रीय सम्मान और साहित्य सर्जक सम्मान से सम्मानित किया जा चुका है।
बज्जिकांचल की बेटी के संघर्ष की गाथा है ‘लाडो’
बज्जिकांचल के ग्रामीण अंचल में रहने वाली एक लड़की के जीवन-संघर्ष की कहानी ‘लाडो’ उपन्यास में चित्रित की गई है। रूढ़िवादी सामाजिक परिवेश में जन्मी लड़की की कम उम्र में ही अपने से अधिक उम्र के युवक से शादी कर दी जाती है। ससुराल पहुंचने के बाद उसकी पढ़ाई-लिखाई छूट जाती है, लेकिन वह हौसला नहीं छोड़ती। संघर्ष करते हुए अपनी पहचान बनाती है और आखिरकार अपनी मंजिल हासिल करती है।
‘लाडो’ में बज्जिकांचल की सभ्यता, परंपरा, रीति-रिवाज, विभिन्न अवसरों पर गाए जाने वाले लोकगीतों के साथ क्षेत्र की समस्याओं को भी जीवंत रूप से प्रस्तुत किया गया है। उपन्यास की कहानी मुख्य पात्र लाडो के जीवन के इर्द-गिर्द घूमती है। लेखिका डॉ. भावना ने इसके माध्यम से समाज की वास्तविक तस्वीर सामने रखने का प्रयास किया है।
