देश में लगभग तीन दशक बाद फिर शुरू हुआ पेनिसिलिन जी का उत्पादन, जरूरी दवाओं के कच्चे माल के लिए आयात पर निर्भरता होगी कम।

भारत दुनिया के बड़े दवा उत्पादक देशों में शामिल है, लेकिन इस उपलब्धि के बीच एक कमजोरी लंबे समय से बनी हुई थी। देश में बड़े पैमाने पर दवाएं बनने के बावजूद उनके लिए जरूरी कई प्रमुख शुरुआती पदार्थों, दवा मध्यवर्ती और सक्रिय औषधीय सामग्री के लिए विदेशों पर निर्भर रहना पड़ता था। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आपूर्ति बाधित होने या कीमतों में अचानक उछाल आने का असर भारतीय दवा उद्योग पर भी पड़ सकता है। अब इस निर्भरता को कम करने की दिशा में बदलाव दिखाई देने लगा है।

थोक दवाओं के लिए उत्पादन आधारित प्रोत्साहन यानी पीएलआई योजना का उद्देश्य देश में जरूरी दवाओं के प्रमुख शुरुआती पदार्थ, दवा मध्यवर्ती और सक्रिय औषधीय सामग्री का उत्पादन बढ़ाना है। योजना के तहत शुरू हुई पांच ग्रीनफील्ड परियोजनाएं बताती हैं कि भारत तैयार दवाओं के साथ उनके लिए जरूरी सामग्री के घरेलू उत्पादन को भी मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में पेनिसिलिन जी का घरेलू उत्पादन दोबारा शुरू होना है। आंध्र प्रदेश के काकीनाडा विशेष आर्थिक क्षेत्र में 2,270.05 करोड़ रुपये के निवेश से इसकी बड़ी उत्पादन इकाई स्थापित की गई है। इसकी सालाना उत्पादन क्षमता 15 हजार मीट्रिक टन है और इससे 2,353 प्रत्यक्ष रोजगार सृजित हुए हैं। परियोजना में अब तक 1,191 करोड़ रुपये का संचयी उत्पादन दर्ज किया गया है। लगभग तीन दशकों के अंतराल के बाद देश में पेनिसिलिन जी का उत्पादन फिर शुरू हुआ है।

इसकी अहमियत आम आदमी की जरूरत से सीधे जुड़ी है। पेनिसिलिन जी का इस्तेमाल ऐसे मध्यवर्ती पदार्थों के उत्पादन में होता है, जिनसे एमोक्सिसिलिन और एम्पीसिलिन जैसी व्यापक रूप से इस्तेमाल होने वाली एंटीबायोटिक दवाएं बनाई जाती हैं। 90 प्रतिशत से अधिक घरेलू मूल्यवर्धन वाली यह परियोजना एंटीबायोटिक दवाओं की आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करने में मददगार साबित हो सकती है।

हिमाचल प्रदेश के नालागढ़ में क्लैवुलैनिक एसिड की सालाना 400 मीट्रिक टन क्षमता वाली इकाई स्थापित की गई है। इस पर 504.68 करोड़ रुपये का निवेश हुआ है और 465 प्रत्यक्ष रोजगार सृजित हुए हैं। परियोजना में 413 करोड़ रुपये का संचयी उत्पादन दर्ज किया गया है। यह देश में पोटेशियम क्लैवुलनेट की पहली किण्वन आधारित विनिर्माण सुविधा है। इसका इस्तेमाल एमोक्सिसिलिन जैसे एंटीबायोटिक के साथ किया जाता है, जिससे प्रतिरोधी बैक्टीरिया के खिलाफ उसकी प्रभावशीलता बढ़ती है।

आंध्र प्रदेश के श्रीकाकुलम जिले में सल्फेडियाज़िन, टेल्मिसार्टन और ओल्मेसार्टन के उत्पादन संयंत्र भी शुरू हुए हैं। इन परियोजनाओं पर कुल 151.47 करोड़ रुपये का निवेश हुआ और 221 प्रत्यक्ष रोजगार सृजित हुए हैं। टेल्मिसार्टन और ओल्मेसार्टन उच्च रक्तचाप की दवाओं में व्यापक रूप से इस्तेमाल होने वाली सक्रिय औषधीय सामग्री हैं। सल्फेडियाज़िन का घरेलू उत्पादन बढ़ने से आयात में भी उल्लेखनीय कमी आई है। वर्ष 2022 में घरेलू आपूर्ति शुरू होने के बाद वित्त वर्ष 2019-20 की तुलना में इसके आयात में लगभग 73 प्रतिशत गिरावट दर्ज की गई है।

पैरासिटामोल लगभग हर घर में पहचानी जाने वाली दवा है। बुखार और दर्द से राहत के लिए इस्तेमाल होने वाली इस दवा के निर्माण में पैरा अमीनो फिनोल महत्वपूर्ण शुरुआती सामग्री है। गुजरात के दहेज में इसकी सालाना 13,500 मीट्रिक टन क्षमता वाली इकाई 60.46 करोड़ रुपये के निवेश से स्थापित की गई है। परियोजना ने 687 करोड़ रुपये का संचयी उत्पादन दर्ज किया है। इससे पैरासिटामोल के निर्माण के लिए जरूरी सामग्री की घरेलू उपलब्धता मजबूत होगी और आयात पर निर्भरता घटाने में मदद मिलेगी।

पंजाब के नवांशहर में एटोरवास्टेटिन की सालाना 206 मीट्रिक टन क्षमता वाली इकाई भी स्थापित की गई है। 161.13 करोड़ रुपये के निवेश वाली इस परियोजना में 432 करोड़ रुपये का संचयी उत्पादन दर्ज किया गया है। एटोरवास्टेटिन का इस्तेमाल कोलेस्ट्रॉल कम करने और हृदय संबंधी बीमारियों के जोखिम को घटाने के लिए किया जाता है। इस परियोजना में 80 प्रतिशत से अधिक घरेलू मूल्यवर्धन वाली आपूर्ति श्रृंखला विकसित हुई है।

इन परियोजनाओं को केवल नए कारखानों और निवेश के आंकड़ों तक सीमित करके नहीं देखा जाना चाहिए। इनका बड़ा महत्व इस बात में है कि जरूरी दवाओं के निर्माण की पूरी श्रृंखला को देश के भीतर मजबूत करने की कोशिश हो रही है। कच्चे माल से लेकर सक्रिय औषधीय सामग्री और फिर तैयार दवा तक घरेलू क्षमता बढ़ने से बाहरी आपूर्ति में व्यवधान और कीमतों में तेज उतार-चढ़ाव का जोखिम कम किया जा सकता है।

दवा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता का सीधा संबंध स्वास्थ्य सुरक्षा से भी है। जरूरी दवाओं के साथ उन्हें बनाने वाली महत्वपूर्ण सामग्री की उपलब्धता सुनिश्चित रहना आवश्यक है। पीएलआई योजना के तहत शुरू हुई ये परियोजनाएं घरेलू मूल्यवर्धन, आयात प्रतिस्थापन, रोजगार सृजन और आपूर्ति श्रृंखला की मजबूती की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं।

अब जरूरत इस बात की है कि घरेलू उत्पादन की यह रफ्तार बनी रहे और स्वदेशी तकनीकी क्षमता लगातार मजबूत हो। यदि भारत जरूरी दवाओं के साथ उनके निर्माण में इस्तेमाल होने वाली प्रमुख सामग्री के उत्पादन में भी अपनी क्षमता बढ़ाता रहा, तो वैश्विक दवा बाजार में उसकी स्थिति और मजबूत हो सकती है।