मोदी-शाह की रणनीति ने बदली बंगाल की सियासत की दिशा

सेंट्रल डेस्क, नई दिल्ली

पश्चिम बंगाल की राजनीति में 2026 का जनादेश केवल एक चुनावी नतीजा नहीं, बल्कि पिछले 46 वर्षों की राजनीतिक यात्रा का निर्णायक पड़ाव है। भारतीय जनता पार्टी ने 206 सीटों के साथ दो तिहाई बहुमत हासिल कर उस राज्य में सत्ता स्थापित की है, जहां कभी कांग्रेस, फिर वाम मोर्चा और बाद में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस का वर्चस्व रहा। इस जीत की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह किसी एक चुनाव का परिणाम नहीं, बल्कि दशकों के संघर्ष, संगठन विस्तार और रणनीतिक बदलाव का नतीजा है।

1971 में जनसंघ के रूप में शुरू हुई यह कहानी आज भाजपा की पूर्ण बहुमत वाली सरकार तक पहुंच चुकी है। बंगाल में भाजपा की जड़ें जनसंघ के दौर से जुड़ी हैं। 1971 के विधानसभा चुनाव में जनसंघ के प्रफुल्ल कुमार सरकार जलांगी सीट से जीतकर विधानसभा पहुंचे थे। उस चुनाव में जनसंघ ने 23 सीटों पर उम्मीदवार उतारे और मात्र 0.82 प्रतिशत वोट हासिल किया। इसके बाद 1972 में जनसंघ ने 16 सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन एक भी सीट नहीं जीत सका और उसका वोट शेयर घटकर 0.19 प्रतिशत रह गया।

1977 में विधानसभा चुनाव जनता पार्टी के बैनर तले लड़ा गया। 289 सीटों पर हुए इस चुनाव में जनता पार्टी ने करीब 20 प्रतिशत वोट हासिल कर 29 सीटें जीतीं। इसके बाद जनसंघ घटक अलग होकर भारतीय जनता पार्टी के रूप में सामने आया। हालांकि इसके बाद भी लंबे समय तक भाजपा को बंगाल में राजनीतिक जमीन बनाने के लिए संघर्ष करना पड़ा और 36 वर्षों तक पार्टी का कोई विधायक विधानसभा में नहीं पहुंच पाया।

2016 का विधानसभा चुनाव भाजपा के लिए टर्निंग पॉइंट साबित हुआ। उस चुनाव में पार्टी ने गोरखा जनमुक्ति मोर्चा (विमल गुरुंग) के साथ गठबंधन किया था। भाजपा ने 10.16 प्रतिशत वोट के साथ 3 सीटें जीतीं, जबकि गुरुंग की पार्टी 3 सीटों पर चुनाव लड़कर भी शून्य पर रही। यहीं से भाजपा की बंगाल में सक्रिय राजनीतिक यात्रा शुरू हुई।

2021 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने पूरी ताकत झोंक दी और 38 प्रतिशत वोट हासिल कर 77 सीटों के साथ मुख्य विपक्षी दल बनकर उभरी, जबकि तृणमूल कांग्रेस ने 48 प्रतिशत वोट के साथ तीसरी बार सरकार बनाई। लेकिन 2026 में तस्वीर पूरी तरह बदल गई। भाजपा ने 45.84 प्रतिशत वोट शेयर के साथ 206 सीटें जीत लीं और तृणमूल कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर दिया।

सबसे बड़ा बदलाव यह रहा कि भाजपा ने 2021 के मुकाबले करीब 8 प्रतिशत वोट बढ़ाया, जबकि तृणमूल कांग्रेस का वोट शेयर 48 प्रतिशत से घटकर 40.80 प्रतिशत पर आ गया। यानी 2021 में जहां दोनों दलों के बीच करीब 10 प्रतिशत का अंतर था, 2026 में भाजपा ने उसे पाटते हुए करीब 5 प्रतिशत की बढ़त बना ली।

इस बार चुनाव आयोग ने मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण कराया, जिसके बाद बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने की चर्चा रही। कई लोगों ने इस पर सवाल भी उठाए, लेकिन चुनावी प्रक्रिया पूरी होने के बाद इसका असर नतीजों में साफ दिखा। हालांकि इस मुद्दे पर विवाद जारी है, लेकिन यह भी माना जा रहा है कि चुनावी गणित में इसका योगदान रहा।

भाजपा का बंगाल में सफर केवल विधानसभा तक सीमित नहीं रहा। 1998 में ममता बनर्जी ने तृणमूल कांग्रेस बनाकर भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए से गठबंधन किया। उसी साल लोकसभा चुनाव में एनडीए को 42 में 9 सीटें मिलीं, जिसमें टीएमसी के 7 और भाजपा के 2 सांसद शामिल थे। 1999 में यह आंकड़ा बढ़कर 10 सीट हो गया-टीएमसी को 8 और भाजपा को 2 सीटें मिलीं।

लेकिन 2004 में एनडीए को बड़ा झटका लगा। तृणमूल कांग्रेस सिर्फ 1 सीट जीत सकी और भाजपा शून्य पर आ गई। 2009 में ममता बनर्जी कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूपीए के साथ चली गईं और भाजपा को केवल 1 सीट मिली। 2014 में मोदी लहर के बावजूद बंगाल में भाजपा को केवल 2 सीटें मिलीं, जबकि तृणमूल कांग्रेस ने 42 में से 34 सीटों पर जीत दर्ज की।

2019 में भाजपा ने बड़ा उछाल लेते हुए 18 सीटें जीतीं और ममता बनर्जी की पार्टी 22 सीटों तक सिमट गई। हालांकि 2024 के लोकसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने वापसी करते हुए 29 सीटें जीतीं, जबकि भाजपा 12 सीटों पर सिमट गई। इसके बावजूद भाजपा ने अपने संगठनात्मक विस्तार को जारी रखा और 2026 के विधानसभा चुनाव में इसका परिणाम सामने आया।

भाजपा की इस ऐतिहासिक जीत के पीछे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता और गृह मंत्री अमित शाह की चुनावी रणनीति को अहम माना जा रहा है। ‘डबल इंजन सरकार’ के नारे के साथ भाजपा ने यह संदेश दिया कि केंद्र और राज्य में एक ही पार्टी की सरकार होने से विकास तेज होगा, और इस रणनीति ने मतदाताओं को प्रभावित किया।

ममता बनर्जी ने 2011 में वाम मोर्चा के 34 साल के शासन को खत्म कर सत्ता हासिल की थी और तीन बार सरकार बनाई, लेकिन 2026 में उनका यह किला ढह गया। यह केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि बंगाल की राजनीति में एक नई दिशा का संकेत है, जहां राष्ट्रीय दल ने क्षेत्रीय वर्चस्व को चुनौती दी और उसे पराजित कर दिया।

अब बंगाल की राजनीति में कांग्रेस और वाम दल पहले ही कमजोर हो चुके हैं, और तृणमूल कांग्रेस के सामने भी अपनी जमीन बचाने की चुनौती है। भाजपा की यह जीत आने वाले चुनावों के लिए भी संकेत दे रही है कि पार्टी अब केवल हिंदी भाषी राज्यों तक सीमित नहीं रही, बल्कि पूर्वी भारत में भी मजबूत पकड़ बना चुकी है।

स्पष्ट है कि 2026 का यह जनादेश केवल एक जीत नहीं, बल्कि एक नई राजनीतिक धारा की शुरुआत है, जहां दशकों का संघर्ष, रणनीति और बदलते जनमत ने मिलकर इतिहास रच दिया है।