जिंक-एयर बैटरी के लिए भारतीय वैज्ञानिकों ने खोजा महंगी और दुर्लभ धातु का नया विकल्प। हवा से मिलने वाली ऑक्सीजन को बिजली में बदलने की प्रक्रिया को प्रभावी बनाने में मिली बड़ी सफलता
कल्पना कीजिए ऐसी बैटरी की, जो अपने काम के लिए जरूरी ऑक्सीजन हमारे आसपास की हवा से ले और उसे बेहतर ढंग से चलाने के लिए बेहद महंगे प्लैटिनम की जरूरत भी न पड़े। अभी यह तकनीक हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा नहीं बनी है, लेकिन भारतीय वैज्ञानिकों की एक नई खोज ने इसकी संभावना जरूर बढ़ा दी है। वैज्ञानिकों ने ऐसा धातु-रहित पदार्थ तैयार किया है, जिसने प्रयोगशाला में प्लैटिनम के मुकाबले करीब 96 प्रतिशत प्रदर्शन किया है। अगर आगे भी इसके नतीजे अच्छे रहे तो भविष्य में स्वच्छ ऊर्जा को सस्ता बनाने की दिशा में यह महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है।
इस खोज की अहमियत समझने के लिए जिंक-एयर बैटरी को समझना जरूरी है। नाम थोड़ा तकनीकी जरूर है, लेकिन इसका तरीका काफी दिलचस्प है। इस बैटरी में जिंक का इस्तेमाल होता है और काम करने के लिए जरूरी ऑक्सीजन आसपास की हवा से मिलती है। यानी बैटरी के भीतर हर जरूरी सामग्री को अलग से जमा करके रखने की आवश्यकता नहीं होती।
जिंक अपेक्षाकृत सस्ता, पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध और सुरक्षित है। यही कारण है कि जिंक-एयर बैटरियों को आने वाले समय में ऊर्जा भंडारण के अच्छे विकल्प के रूप में देखा जा रहा है। इनमें पारंपरिक लिथियम-आयन बैटरियों के मुकाबले अधिक ऊर्जा संग्रह करने, कम लागत, बेहतर सुरक्षा और अधिक टिकाऊपन की संभावना है। हालांकि इन्हें बार-बार चार्ज करने, लंबे समय तक चलाने और ऑक्सीजन से होने वाली रासायनिक प्रक्रिया को तेज बनाए रखने जैसी समस्याएं अभी पूरी तरह हल नहीं हुई हैं।
सबसे बड़ी चुनौती ऑक्सीजन से जुड़ी प्रक्रिया को प्रभावी बनाने की है। इसके लिए उत्प्रेरक की जरूरत पड़ती है। आसान शब्दों में कहें तो उत्प्रेरक वह पदार्थ है, जो किसी रासायनिक प्रक्रिया को तेजी और बेहतर तरीके से पूरा करने में मदद करता है। अभी कई स्वच्छ ऊर्जा तकनीकों, खासकर हाइड्रोजन ईंधन सेल में इस काम के लिए प्लैटिनम का इस्तेमाल होता है।
प्लैटिनम काम तो शानदार करता है, लेकिन इसकी कीमत इस तकनीक की राह मुश्किल बनाती है। यह दुनिया की दुर्लभ और महंगी धातुओं में शामिल है। अगर करोड़ों बैटरियों और दूसरे ऊर्जा उपकरणों में इसका बड़े पैमाने पर इस्तेमाल करना पड़े तो लागत काफी बढ़ सकती है। इसलिए वैज्ञानिक लंबे समय से ऐसा पदार्थ तलाश रहे हैं, जो प्लैटिनम जैसा काम करे, लेकिन उसमें किसी महंगी धातु की जरूरत न पड़े।
इसी कोशिश में कोलकाता स्थित एसएन बोस राष्ट्रीय बुनियादी विज्ञान केंद्र, मोहाली स्थित नैनो विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संस्थान और अमरावती स्थित एसआरएम विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने एक विशेष कार्बनिक पदार्थ तैयार किया है। इसे टीटीटी-डीएचटीडी नाम दिया गया है। नाम भले ही कठिन लगे, लेकिन इसकी खासियत आसानी से समझी जा सकती है।
यह पदार्थ कार्बन, सल्फर, नाइट्रोजन और हाइड्रोजन जैसे पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध तत्वों से बनाया गया है। इसकी बनावट मधुमक्खी के छत्ते की तरह छिद्रयुक्त है। इन्हीं बेहद छोटे छिद्रों में ऑक्सीजन के अणुओं को प्रतिक्रिया करने के लिए अनुकूल जगह मिलती है। इससे बिजली पैदा करने वाली प्रक्रिया तेजी और कुशलता से आगे बढ़ती है।
प्रयोगशाला में जब इस नए पदार्थ को जिंक-एयर बैटरी के वायु इलेक्ट्रोड में उत्प्रेरक के रूप में इस्तेमाल किया गया तो इसने व्यावसायिक प्लैटिनम उत्प्रेरक के प्रदर्शन का करीब 96 प्रतिशत हासिल किया। यानी बिना किसी कीमती धातु के यह प्लैटिनम के काफी करीब पहुंच गया।
एक और नतीजे ने वैज्ञानिकों की उम्मीद बढ़ाई। नए पदार्थ को लगातार 120 घंटे तक चलाया गया और इस दौरान उसने अपना प्रदर्शन बनाए रखा। किसी भी नई बैटरी तकनीक के लिए यह बेहद जरूरी है। केवल शुरुआत में अच्छा प्रदर्शन करना पर्याप्त नहीं होता, लंबे समय तक स्थिर रहना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
वैज्ञानिकों ने कंप्यूटर की मदद से यह भी जानने की कोशिश की कि आखिर यह पदार्थ इतनी अच्छी तरह काम क्यों करता है। अध्ययन से पता चला कि इसकी खास आणविक बनावट ऑक्सीजन के अणुओं के लिए ऐसी जगह तैयार करती है, जहां वे आसानी से जुड़कर प्रतिक्रिया कर सकते हैं। इसी कारण बिजली पैदा करने की प्रक्रिया अधिक प्रभावी हो जाती है।
इस शोध का महत्व केवल जिंक-एयर बैटरी तक सीमित नहीं है। स्वच्छ परिवहन, पोर्टेबल बिजली उपकरण और सौर तथा पवन ऊर्जा से बनी बिजली को संग्रहित करने के लिए भविष्य में ऐसी सस्ती तकनीकों की जरूरत तेजी से बढ़ने वाली है। अगर महंगे प्लैटिनम की जगह आसानी से उपलब्ध तत्वों से बने पदार्थ इस्तेमाल किए जा सकें तो इन तकनीकों की लागत कम करने में मदद मिल सकती है।
हाइड्रोजन ईंधन सेल की तुलना में जिंक-एयर बैटरियों का एक फायदा यह भी हो सकता है कि इनमें बहुत अधिक दबाव पर हाइड्रोजन जमा करने या उसके लिए व्यापक ढांचा तैयार करने की जरूरत नहीं पड़ती। हालांकि दोनों ही तकनीकों की सफलता के लिए ऑक्सीजन से जुड़ी रासायनिक प्रक्रिया का कुशल होना जरूरी है।
यहां उत्साह के साथ सावधानी भी जरूरी है। प्रयोगशाला में अच्छे परिणाम मिलने का मतलब यह नहीं है कि अगले ही दिन ऐसी बैटरियां बाजार में पहुंच जाएंगी। जिंक-एयर बैटरियों की रिचार्ज क्षमता, लंबे समय तक इस्तेमाल और बड़े पैमाने पर उत्पादन से जुड़ी चुनौतियां अभी बाकी हैं। नए पदार्थ को भी वास्तविक परिस्थितियों में कई और परीक्षणों से गुजरना होगा। इस शोध के नतीजे वैज्ञानिक पत्रिका ‘साइंस एडवांसेज’ में प्रकाशित हुए हैं।
फिर भी यह खोज एक महत्वपूर्ण संदेश देती है। स्वच्छ ऊर्जा के लिए जरूरी नहीं कि हम हमेशा दुर्लभ और बेहद महंगी धातुओं पर निर्भर रहें। सही वैज्ञानिक डिजाइन के जरिए आसानी से उपलब्ध तत्वों से भी ऐसे पदार्थ तैयार किए जा सकते हैं, जो महंगी धातुओं के प्रदर्शन के काफी करीब पहुंच सकें।
आने वाले वर्षों में दुनिया को केवल अधिक ऊर्जा की जरूरत नहीं होगी, बल्कि ऐसी ऊर्जा चाहिए होगी जो स्वच्छ, सुरक्षित और आम लोगों की पहुंच में हो। इसलिए असली चुनौती सिर्फ नई तकनीक बनाने की नहीं, उसकी कीमत घटाने की भी है। भारतीय वैज्ञानिकों की यह खोज उसी दिशा में उम्मीद जगाती है। यदि सस्ती सामग्री महंगे प्लैटिनम का काम करने लगे तो स्वच्छ ऊर्जा केवल भविष्य का सपना नहीं, आम आदमी की पहुंच वाली तकनीक भी बन सकती है।
