सुप्रीम कोर्ट ने उठाए गंभीर सवाल। दवाओं की बिक्री बढ़ाने के लिए दिए जाने वाले प्रलोभनों पर कानूनी नियंत्रण की तैयारी, केंद्र को तीन सदस्यीय समिति बनाने का निर्देश

नई दिल्ली: मरीजों के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवाओं का चुनाव चिकित्सा जरूरतों के आधार पर होना चाहिए या दवा कंपनियों के प्रलोभनों पर? इसी गंभीर सवाल के बीच सुप्रीम कोर्ट ने फार्मास्युटिकल कंपनियों की कारोबारी गतिविधियों पर कानूनी निगरानी की जरूरत पर महत्वपूर्ण कदम उठाया है। अदालत ने केंद्र सरकार को तीन सदस्यीय समिति गठित करने का निर्देश दिया है, जो डॉक्टरों को दिए जाने वाले उपहारों, आर्थिक लाभ और अन्य प्रोत्साहनों से जुड़ी कंपनियों की विपणन नीतियों की जांच करेगी।

न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने यह आदेश दवा कंपनियों और चिकित्सकों के बीच कथित अनैतिक लेनदेन पर रोक लगाने की मांग वाली याचिका की सुनवाई के दौरान दिया।अदालत ने मौजूदा व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण कमी की ओर ध्यान दिलाया। वर्तमान नियमों के तहत डॉक्टरों के ऐसे लाभ स्वीकार करने पर कार्रवाई की जा सकती है, लेकिन उन्हें उपहार या अन्य सुविधाएं उपलब्ध कराने वाली दवा कंपनियों के खिलाफ प्रभावी वैधानिक नियंत्रण का अभाव है।

प्रस्तावित समिति विभिन्न संबंधित पक्षों से सुझाव लेकर यह तय करने में मदद करेगी कि दवा कंपनियों की प्रचार और बिक्री संबंधी गतिविधियों को नियंत्रित करने के लिए अलग कानून की आवश्यकता है या नहीं। यदि इसकी जरूरत सामने आती है, तो समिति संभावित कानूनी व्यवस्था के स्वरूप पर भी विचार करेगी।सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इस मामले में हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है। अगली सुनवाई 29 जनवरी 2027 को निर्धारित की गई है।

इस बीच दवाओं की कीमतों का मुद्दा भी न्यायिक जांच के दायरे में है। एक अन्य मामले में कैंसर की दवा के खुदरा मूल्य और अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) के बीच लगभग दस गुना अंतर सामने आया है। दवा कंपनियों की विपणन नीतियों और दवाओं की कीमतों से जुड़े ये सवाल मरीजों के हितों तथा स्वास्थ्य सेवाओं में पारदर्शिता के लिहाज से महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं। हालांकि, अदालत ने अभी किसी नए कानून का आदेश नहीं दिया है, बल्कि उसकी आवश्यकता का परीक्षण करने को कहा है।