राष्ट्रपति के मनोनयन से फिर पहुंचे उच्च सदन, बिहार की सियासत में राज्यसभा चुनाव बना चर्चा का केंद्र

दीपक श्रीवास्तव

राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश को एक बार फिर उच्च सदन में जगह मिल गई है। गृह मंत्रालय की ओर से जारी अधिसूचना के बाद यह साफ हो गया है कि वे अब नए कार्यकाल के साथ संसद के ऊपरी सदन में अपनी भूमिका निभाते रहेंगे। उनके मनोनयन ने उन सभी अटकलों को खत्म कर दिया है, जिनमें उनके राजनीतिक भविष्य को लेकर सवाल उठाए जा रहे थे।

गृह मंत्रालय द्वारा जारी गजट के मुताबिक, राज्यसभा में एक सीट खाली होने के बाद राष्ट्रपति ने हरिवंश को मनोनीत सदस्य के रूप में चुना है। उनका पिछला कार्यकाल 9 अप्रैल को समाप्त हो चुका था, जिसके बाद यह निर्णय लिया गया। इस फैसले के साथ ही यह स्पष्ट हो गया है कि वे आगामी वर्षों तक संसद की कार्यवाही में सक्रिय भूमिका निभाते रहेंगे।

हरिवंश का राजनीतिक और संसदीय सफर लंबे अनुभव से भरा रहा है। वे 2014 में पहली बार राज्यसभा पहुंचे थे और तब से लगातार इस सदन का हिस्सा बने हुए हैं। 2018 में उन्हें राज्यसभा का उपसभापति चुना गया, जिसके बाद 2020 में एक बार फिर इस पद के लिए उनका चयन हुआ। अब नए मनोनयन के साथ उनका कार्यकाल 2032 तक जारी रहने वाला है।

बिहार की राजनीति में हरिवंश को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के करीबी सहयोगी के रूप में देखा जाता रहा है। हालांकि इस बार राज्यसभा चुनाव के दौरान उनका नाम उम्मीदवारों की सूची में शामिल नहीं था, जिससे यह माना जा रहा था कि शायद उनका कार्यकाल यहीं समाप्त हो जाएगा। लेकिन राष्ट्रपति के इस फैसले ने सभी कयासों को गलत साबित कर दिया है।

पत्रकारिता की पृष्ठभूमि से आने वाले हरिवंश नारायण सिंह ने सार्वजनिक जीवन में एक अलग पहचान बनाई है। उत्तर प्रदेश के बलिया में जन्मे हरिवंश ने काशी हिंदू विश्वविद्यालय से अपनी शिक्षा पूरी की और इसके बाद लंबे समय तक पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय रहे। उनकी यही पृष्ठभूमि उन्हें संसद में एक गंभीर और संतुलित वक्ता के रूप में स्थापित करती है।

इस बार राज्यसभा चुनाव ने बिहार की राजनीति में खासा उत्साह और चर्चा पैदा की थी। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने के फैसले ने राजनीतिक समीकरणों को नया मोड़ दिया। इसके अलावा भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन, उपेंद्र कुशवाहा, रामनाथ ठाकुर और शिवेश कुमार जैसे नेताओं का उच्च सदन में चयन भी राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

हरिवंश का दोबारा मनोनयन यह संकेत देता है कि संसद में उनके अनुभव और कार्यशैली पर अब भी भरोसा कायम है और आने वाले समय में वे राज्यसभा की कार्यवाही को उसी संतुलन और गंभीरता के साथ आगे बढ़ाते