सुप्रीम कोर्ट ने कहा-वरिष्ठ नागरिकों को त्वरित और प्रभावी राहत देना सीनियर सिटीजन्स एक्ट का उद्देश्य

नई दिल्ली : जिस घर को माता-पिता जिंदगी भर की कमाई से बनाते हैं, उम्र के आखिरी पड़ाव में उसी घर में उन्हें अपमान, असुरक्षा या परेशानी झेलनी पड़े तो कानून उन्हें बेसहारा नहीं छोड़ सकता। सुप्रीम कोर्ट ने वरिष्ठ नागरिकों के अधिकारों को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि जरूरत पड़ने पर सीनियर सिटीजन ट्रिब्यूनल बच्चों या अन्य व्यक्तियों को बुजुर्ग की संपत्ति से बेदखल करने का आदेश भी दे सकता है।

हालांकि, शीर्ष अदालत ने इसके साथ एक महत्वपूर्ण सीमा भी तय की है। केवल पारिवारिक विवाद या आपसी मतभेद के आधार पर बच्चों को घर से नहीं निकाला जा सकता। बेदखली का आदेश तभी दिया जा सकता है, जब वरिष्ठ नागरिक के भरण-पोषण, देखभाल, सुरक्षा या संरक्षण को सुनिश्चित करने के लिए ऐसा करना जरूरी हो।

सुप्रीम कोर्ट ने बुजुर्गों की सामाजिक भूमिका का उल्लेख करते हुए कहा कि किसी सभ्य समाज की पहचान इस बात से भी होती है कि वह अपने वरिष्ठ नागरिकों को कितना सम्मान और सुरक्षा देता है। बुजुर्ग अपने साथ ज्ञान, जीवन का लंबा अनुभव और सामूहिक स्मृतियां लेकर चलते हैं। उनका अनुभव परिवार और समाज के लिए महत्वपूर्ण होता है और वे आने वाली पीढ़ियों का मार्गदर्शन कर सकते हैं। अदालत ने भारतीय संस्कृति का उल्लेख करते हुए कहा कि हमारे यहां माता-पिता को अत्यंत सम्मान दिया गया है और उन्हें ईश्वर के समान माना जाता है।

मामला रविकांत गुप्ता की याचिका से जुड़ा है। लखनऊ के विकास नगर में उनका अपना मकान है, जो उनकी स्व-अर्जित संपत्ति बताई गई है। रविकांत गुप्ता की मां की उम्र 81 वर्ष थी। उनका आरोप था कि उनके बेटे ने अपनी दादी को घर में रहने नहीं दिया और उन्हें इतना परेशान किया कि बुजुर्ग महिला को आखिरकार घर छोड़कर वृद्धाश्रम में रहना पड़ा।

इसके बाद रविकांत गुप्ता ने जून 2022 में जिला मजिस्ट्रेट के समक्ष आवेदन देकर अपने बेटे को संपत्ति से बेदखल करने की मांग की। मामले में एसडीएम ने बेटे को मकान से निकालने का आदेश दिया। एडीएम ने भी माना कि संबंधित मकान रविकांत गुप्ता की स्व-अर्जित संपत्ति है। आदेश में यह तथ्य भी दर्ज किया गया कि बेटे ने अपनी दादी को घर में रहने नहीं दिया था।

मामला आगे जिला मजिस्ट्रेट के पास पहुंचा। जिला मजिस्ट्रेट ने 9 अगस्त 2023 को एसडीएम के आदेश को बरकरार रखते हुए रविकांत गुप्ता के बेटे और उसकी पत्नी को मकान खाली करने तथा संपत्ति का कब्जा गुप्ता को सौंपने का निर्देश दिया।

बेटे और उसकी पत्नी ने इन आदेशों को इलाहाबाद हाई कोर्ट में चुनौती दी। हाई कोर्ट ने माना कि सीनियर सिटीजन्स एक्ट 2007 के तहत अधिकारियों के पास किसी व्यक्ति को संपत्ति से बेदखल करने का आदेश देने की शक्ति नहीं है। इसी आधार पर एसडीएम और डीएम की ओर से जारी बेदखली के आदेश को रद्द कर दिया गया।

इसके बाद रविकांत गुप्ता ने हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। शीर्ष अदालत ने सीनियर सिटीजन एक्ट 2007 के उद्देश्य को महत्वपूर्ण मानते हुए कहा कि संसद ने यह कानून इसलिए बनाया है, ताकि बढ़ती उम्र वरिष्ठ नागरिकों के लिए उपेक्षा, असुरक्षा और अपमान का कारण न बने। कानून का उद्देश्य बुजुर्गों को त्वरित और प्रभावी राहत उपलब्ध कराना है।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब कानून किसी ट्रिब्यूनल को कोई उद्देश्य पूरा करने का अधिकार देता है तो उस उद्देश्य को प्रभावी ढंग से हासिल करने के लिए आवश्यक कदम उठाने की शक्ति भी उसके पास होनी चाहिए। इसी सिद्धांत के आधार पर अदालत ने माना कि यदि किसी वरिष्ठ नागरिक की देखभाल, सुरक्षा और संरक्षण के लिए किसी व्यक्ति को उसकी संपत्ति से हटाना जरूरी हो जाता है तो सीनियर सिटीजन ट्रिब्यूनल बेदखली का आदेश दे सकता है।

फैसले का मतलब यह नहीं है कि माता-पिता और बच्चों के बीच हर विवाद अब बेदखली तक पहुंचेगा। सुप्रीम कोर्ट ने इस अधिकार को वरिष्ठ नागरिकों के कल्याण से जोड़ते हुए इसकी सीमा भी स्पष्ट कर दी है। यानी बेदखली कोई सामान्य उपाय नहीं, बल्कि ऐसी परिस्थिति में उपलब्ध राहत है जहां बुजुर्ग की सुरक्षा, सम्मान, देखभाल या भरण-पोषण सुनिश्चित करने के लिए इसकी वास्तविक जरूरत हो।