- परिसीमन से बदलेगा चुनावी नक्शा, महिला आरक्षण लागू करने की तैयारी तेज
नई दिल्ली : देश की चुनावी राजनीति में बड़ा बदलाव लाने की दिशा में सरकार ने एक अहम कदम उठाया है। संसद में पेश किए गए तीन विधेयकों के जरिए लोकसभा और राज्य विधानसभाओं की सीटों का पुनर्गठन, महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण लागू करने और परिसीमन की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की योजना सामने आई है। अगर ये प्रस्ताव लागू होते हैं तो आने वाले समय में लोकसभा सीटों की संख्या 543 से बढ़कर करीब 850 तक पहुंच सकती है, जिससे देश का पूरा चुनावी ढांचा बदल सकता है।
इन विधेयकों में सबसे महत्वपूर्ण परिसीमन विधेयक-2026 माना जा रहा है। इसके तहत एक नया परिसीमन आयोग गठित किया जाएगा, जो देश की नवीनतम जनसंख्या के आंकड़ों के आधार पर चुनावी क्षेत्रों की सीमाएं और सीटों का बंटवारा तय करेगा। इसका सीधा असर यह होगा कि राज्यों में लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ेगी और कई क्षेत्रों की राजनीतिक सीमाएं बदल जाएंगी।
परिसीमन का मतलब होता है चुनावी क्षेत्रों की सीमाओं और उनकी संख्या को तय करना या उसमें बदलाव करना। यह प्रक्रिया इस आधार पर की जाती है कि किसी क्षेत्र में कितनी जनसंख्या रहती है और वहां जनसंख्या घनत्व क्या है। समय के साथ जैसे-जैसे आबादी बढ़ती या घटती है, वैसे-वैसे क्षेत्रों की सीमाएं भी बदली जाती हैं। यही कारण है कि कई बार कोई इलाका जो पहले एक वार्ड या सीट में आता था, परिसीमन के बाद किसी दूसरी सीट का हिस्सा बन जाता है।
फिलहाल देश में लोकसभा सीटों का बंटवारा 1971 की जनगणना के आधार पर तय है। हालांकि, बीते कई दशकों में देश की आबादी और सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों में काफी बदलाव आया है। इसके बावजूद सीटों की संख्या में कोई बदलाव नहीं किया गया, क्योंकि 2001 और 2003 में किए गए संवैधानिक संशोधनों के जरिए सीटों के पुनर्निर्धारण पर 2026 तक रोक लगा दी गई थी। इस वजह से लंबे समय से नई जनसंख्या के आधार पर सीटों का बंटवारा नहीं हो पाया।
अब सरकार इस रोक को हटाकर नए सिरे से परिसीमन कराने की तैयारी में है। प्रस्तावित विधेयक में यह प्रावधान किया गया है कि “जनसंख्या” की परिभाषा संसद तय करेगी और वही यह भी निर्धारित करेगी कि किस जनगणना के आंकड़ों को आधार बनाया जाए, बशर्ते वे आंकड़े आधिकारिक रूप से प्रकाशित हो चुके हों। इससे भविष्य में परिसीमन की प्रक्रिया को अधिक लचीला बनाया जा सकेगा।
नए प्रस्ताव के मुताबिक, लोकसभा में सदस्यों की अधिकतम संख्या 815 तक हो सकती है, जबकि केंद्र शासित प्रदेशों के लिए लगभग 35 सीटों का प्रावधान किया गया है। इस तरह कुल संख्या 850 तक पहुंच सकती है। हालांकि, किस राज्य में कितनी सीटें बढ़ेंगी, इसका अंतिम फैसला परिसीमन आयोग करेगा, जो जनसंख्या और क्षेत्रीय संतुलन को ध्यान में रखकर निर्णय लेगा।
इस पूरी प्रक्रिया का एक अहम उद्देश्य महिलाओं को एक-तिहाई यानी 33 फीसदी आरक्षण जल्द लागू करना भी है। नई व्यवस्था के तहत महिलाओं के लिए आरक्षित सीटें हर चुनाव में बदलती रहेंगी, ताकि सभी क्षेत्रों में उन्हें प्रतिनिधित्व का मौका मिल सके। यह कदम महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
इतिहास की बात करें तो भारत में अब तक चार बार परिसीमन आयोग का गठन किया जा चुका है। पहला आयोग 1952 में बना था, इसके बाद 1963, 1973 और फिर 2002 में परिसीमन किया गया। हालांकि, 2002 के परिसीमन में केवल चुनावी क्षेत्रों की सीमाएं बदली गई थीं, सीटों की संख्या में कोई बदलाव नहीं किया गया था। 1971 की जनगणना के आधार पर तय की गई 543 लोकसभा सीटें आज तक बनी हुई हैं।
सरकार का मानना है कि बदलती जनसंख्या और नए सामाजिक समीकरणों के अनुरूप सीटों का पुनर्गठन जरूरी हो गया है। इसके जरिए हर क्षेत्र को उसकी आबादी के हिसाब से प्रतिनिधित्व मिल सकेगा और चुनावी व्यवस्था अधिक संतुलित बनेगी।
परिसीमन की प्रक्रिया भी एक तय ढांचे के तहत पूरी की जाएगी। प्रस्ताव के अनुसार, परिसीमन आयोग का अध्यक्ष सुप्रीम कोर्ट के वर्तमान या सेवानिवृत्त न्यायाधीश होंगे। इसके अलावा मुख्य चुनाव आयुक्त या उनके द्वारा नामित चुनाव आयुक्त और संबंधित राज्यों के राज्य चुनाव आयुक्त इसमें सदस्य के रूप में शामिल होंगे।
आयोग अपने प्रस्तावों को सार्वजनिक करेगा और जनता से सुझाव और आपत्तियां भी मांगेगा। इन सुझावों पर विचार करने के बाद अंतिम निर्णय गजट में प्रकाशित किया जाएगा, जिसके बाद नई सीमाएं लागू हो जाएंगी।
हालांकि, विपक्ष ने इस पूरी प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि इतने बड़े बदलाव को लागू करने में जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए और इस पर व्यापक चर्चा होनी चाहिए। उनका यह भी मानना है कि परिसीमन के जरिए राजनीतिक संतुलन प्रभावित हो सकता है, इसलिए सभी पक्षों की सहमति जरूरी है।
फिलहाल यह साफ है कि अगर यह विधेयक लागू होता है, तो देश की चुनावी राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा। लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ने, नई सीमाएं तय होने और महिला आरक्षण लागू होने से राजनीतिक समीकरण पूरी तरह बदल सकते हैं। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि यह प्रस्ताव किस दिशा में आगे बढ़ता है और देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था पर इसका क्या असर पड़ता है।