1,200 स्वस्थ वयस्कों पर सात केंद्रों में किया गया अध्ययन, नौ संस्थानों के 45 शोधकर्ता रहे शामिल

नई दिल्ली : अश्वगंधा के लंबे समय तक सेवन से लिवर या किडनी पर असर पड़ने की आशंका को लेकर एक बड़े क्लिनिकल अध्ययन में महत्वपूर्ण नतीजे सामने आए हैं। 1,200 स्वस्थ वयस्कों पर किए गए अध्ययन में 24 सप्ताह तक रोजाना मानकीकृत अश्वगंधा मूल अर्क लेने से लिवर या किडनी को नुकसान पहुंचने का प्रमाण नहीं मिला। अध्ययन ‘फ्रंटियर्स इन मेडिसिन’ में प्रकाशित हुआ है।

नौ संस्थानों के 45 शोधकर्ताओं की बहु-विषयक टीम ने यह रैंडमाइज्ड, डबल-ब्लाइंड और प्लेसीबो-नियंत्रित अध्ययन किया। इसमें आयुर्वेद, क्लिनिकल मेडिसिन, रूमेटोलॉजी और इंटीग्रेटिव हेल्थ सहित विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञ शामिल थे। अध्ययन भारत के सात केंद्रों पर किया गया और इसे क्लिनिकल ट्रायल्स रजिस्ट्री-इंडिया में पंजीकृत किया गया था।

अध्ययन में 18 से 70 वर्ष की उम्र के ऐसे स्वस्थ लोगों को शामिल किया गया था, जिन्हें कोविडशील्ड की पहली, दूसरी या बूस्टर खुराक मिल चुकी थी। प्रतिभागियों को दो समूहों में बांटा गया। एक समूह को प्रतिदिन 500 मिलीग्राम मानकीकृत जलीय अश्वगंधा मूल अर्क दिया गया, जो करीब चार ग्राम कच्ची अश्वगंधा जड़ के चूर्ण के बराबर था। दूसरे समूह को अश्वगंधा के बजाय प्लेसीबो दिया गया।

प्रतिभागियों को 24 सप्ताह तक अश्वगंधा या प्लेसीबो दिया गया और 28वें सप्ताह तक उनकी निगरानी की गई। कुल 1,200 प्रतिभागियों में से 1,032 यानी 86 प्रतिशत ने अध्ययन पूरा किया।

शोधकर्ताओं ने इस दौरान लिवर एंजाइम, बिलीरुबिन, क्रिएटिनिन और ब्लड यूरिया सहित कई महत्वपूर्ण जांच कीं। ये मानक अध्ययन में बताई गई सामान्य सीमाओं के भीतर रहे। उपचार से संबंधित लिवर या किडनी की क्षति का कोई प्रमाण नहीं मिला। अध्ययन में सामने आई किसी गंभीर प्रतिकूल घटना को भी दिए गए हस्तक्षेप से संबंधित नहीं पाया गया। प्रतिकूल घटना के कारण किसी प्रतिभागी ने अध्ययन नहीं छोड़ा।

अध्ययन में यह भी जांचा गया कि अश्वगंधा का कोविडशील्ड से विकसित प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया पर कोई असर तो नहीं पड़ता। अश्वगंधा और प्लेसीबो दोनों समूहों में वायरस को निष्क्रिय करने वाली गतिविधि 85 प्रतिशत से अधिक रही। दोनों समूहों के बीच कोई महत्वपूर्ण सांख्यिकीय अंतर नहीं मिला।

आयुष मंत्रालय के सचिव वैद्य राजेश कोटेचा ने कहा कि इस तरह के उच्च गुणवत्ता वाले क्लिनिकल अध्ययन आयुर्वेद के वैज्ञानिक साक्ष्य को मजबूत करते हैं। अध्ययन के प्रमुख लेखक डॉ. अरविंद चोपड़ा के अनुसार, नतीजे 24 सप्ताह तक मानकीकृत अश्वगंधा की सुरक्षा और सहनशीलता के महत्वपूर्ण प्रमाण देते हैं। सह-लेखक प्रो. भूषण पाटवर्धन और केंद्रीय आयुर्वेदीय विज्ञान अनुसंधान परिषद के महानिदेशक प्रो. रबिनारायण आचार्य ने भी मानकीकृत आयुर्वेदिक तैयारियों के सुरक्षित और जिम्मेदार उपयोग के लिए ऐसे वैज्ञानिक अध्ययनों को महत्वपूर्ण बताया।

अध्ययन के नतीजे खास तौर पर 500 मिलीग्राम मानकीकृत जलीय अश्वगंधा मूल अर्क के 24 सप्ताह तक नियंत्रित परिस्थितियों में सेवन से संबंधित हैं। इसलिए निष्कर्षों को अश्वगंधा की हर मात्रा, हर उत्पाद या हर व्यक्ति पर समान रूप से लागू नहीं माना जाना चाहिए।