• संसद में बोले-ऐतिहासिक पल न गंवाएं, मंथन से निकलेगा अमृत जो तय करेगा देश की दिशा


नई दिल्ली : महिला आरक्षण विधेयक पर संसद में चर्चा के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे देश के संसदीय इतिहास का एक ऐतिहासिक और निर्णायक क्षण बताया। उन्होंने कहा कि राष्ट्र के जीवन में कुछ ऐसे पल आते हैं, जब समाज की सोच और नेतृत्व की क्षमता मिलकर भविष्य की मजबूत नींव तैयार करते हैं। यह वही समय है, जब हम सब मिलकर देश के लिए एक अमूल्य धरोहर बना सकते हैं और इस मौके को हाथ से नहीं जाने देना चाहिए।


प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में कहा कि यह केवल एक कानून बनाने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि देश की शासन व्यवस्था में संवेदनशीलता और समावेशिता लाने का प्रयास है। उन्होंने विश्वास जताया कि इस पूरे विमर्श और मंथन से जो अमृत निकलेगा, वह आने वाले समय में देश की राजनीति के स्वरूप के साथ-साथ उसकी दिशा और दशा भी तय करेगा।


उन्होंने स्पष्ट किया कि विकसित भारत का अर्थ केवल आर्थिक विकास या बुनियादी ढांचे के विस्तार तक सीमित नहीं है। सच्चे अर्थों में विकास तब होगा, जब देश की आधी आबादी यानी महिलाएं भी निर्णय लेने वाली संस्थाओं में बराबर की भागीदारी निभाएंगी। उन्होंने कहा कि यह समय की मांग है कि महिलाओं को संसद और विधानसभाओं में पर्याप्त प्रतिनिधित्व मिले।


प्रधानमंत्री ने यह भी याद दिलाया कि पिछले कई वर्षों से महिला आरक्षण को लेकर चर्चा होती रही है और हर चुनाव में यह एक बड़ा मुद्दा बनता रहा है। उन्होंने कहा कि जिन लोगों ने इस अधिकार का विरोध किया, उन्हें महिलाओं ने कभी पूरी तरह स्वीकार नहीं किया। लेकिन जब सभी दल एक साथ आते हैं तो यह मुद्दा किसी एक के राजनीतिक लाभ का विषय नहीं रह जाता, बल्कि राष्ट्रीय सहमति का प्रतीक बन जाता है।


अपने भाषण में प्रधानमंत्री ने यह भी साफ किया कि इस विधेयक का श्रेय किसी एक व्यक्ति या दल को नहीं मिलेगा। उन्होंने कहा कि यह देश के लोकतंत्र और सामूहिक निर्णय शक्ति के पक्ष में एक बड़ा कदम है और हम सभी इसके लिए बराबर के हकदार होंगे। उन्होंने यहां तक कहा कि न सरकार और न ही वे खुद इस उपलब्धि के अकेले हकदार होंगे।


प्रधानमंत्री ने विपक्ष पर तंज कसते हुए कहा कि कुछ लोगों को इसमें राजनीतिक स्वार्थ नजर आता है, लेकिन अगर कोई इसका विरोध करता है तो उससे उन्हें ही राजनीतिक लाभ मिल सकता है। उन्होंने हंसी-मजाक के बीच कहा कि उन्हें इस कानून का कोई क्रेडिट नहीं चाहिए और अगर विपक्ष चाहे तो वह पूरा श्रेय भी ले सकता है। उन्होंने यहां तक कहा कि वे सभी के लिए ‘ब्लैंक चेक’ देने को तैयार हैं, ताकि इस ऐतिहासिक फैसले का श्रेय सभी को मिल सके।


उन्होंने जमीनी हकीकत का जिक्र करते हुए कहा कि महिलाएं अब केवल घर या सीमित कार्यों तक नहीं रह गई हैं। वे खुद कहती हैं कि हमें सिर्फ छोटे-छोटे कामों में ही क्यों जोड़ा जाता है, अब हमें निर्णय लेने की प्रक्रिया का हिस्सा बनाया जाए। प्रधानमंत्री ने कहा कि पिछले 25-30 वर्षों में महिलाएं जमीनी स्तर पर मजबूत नेतृत्व के रूप में उभरी हैं और अब वे राजनीति के फैसलों को भी प्रभावित कर रही हैं।


परिसीमन को लेकर उठ रही आशंकाओं पर भी प्रधानमंत्री ने विस्तार से जवाब दिया। उन्होंने भरोसा दिलाया कि इस प्रक्रिया में किसी भी राज्य या क्षेत्र के साथ कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा। उन्होंने कहा कि संविधान हमें एक राष्ट्र के रूप में सोचने की प्रेरणा देता है और परिसीमन के दौरान उसी भावना का पालन किया जाएगा। चाहे उत्तर भारत हो या दक्षिण, छोटे राज्य हों या बड़े, सभी के साथ समान व्यवहार होगा।


प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि परिसीमन को लेकर जो विवाद खड़ा किया जा रहा है, वह केवल राजनीतिक लाभ के लिए है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि इस प्रक्रिया में किसी के साथ अन्याय नहीं होगा और पिछली परिसीमन प्रक्रिया में जो अनुपात तय किया गया था, उसमें भी कोई अनुचित बदलाव नहीं किया जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि जब नीयत साफ होती है तो शब्दों के खेल की जरूरत नहीं पड़ती।


अपने संबोधन के अंत में प्रधानमंत्री ने सांसदों से अपील की कि वे इस ऐतिहासिक अवसर को पहचानें और राजनीति से ऊपर उठकर देशहित में निर्णय लें। उन्होंने कहा कि यह फैसला न केवल आज की राजनीति को बदलेगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक नई दिशा तय करेगा।